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दुनिया के गुंडे एक हों, तुम्हारे पास खोने के लिए कुछ नहीं है!

इतिहास और इसके प्रतीकों को मिटाने की मची होड़ कहीं और नहीं बल्कि अराजकता और अशांति की तरफ ले जाएगी

Sandipan Sharma Sandipan Sharma Updated On: Mar 08, 2018 03:03 PM IST

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दुनिया के गुंडे एक हों, तुम्हारे पास खोने के लिए कुछ नहीं है!

दुनिया के गुंडे और मवालियों एक हों! तुम्हारे पास खोने के लिए कुछ नहीं है, सिवाय अपने इतिहास के! त्रिपुरा में अपने हाथ मिलाओ, पश्चिम बंगाल में एका दिखाओ, यूपी पर छा जाओ, तमिलनाडु पर चढ़ दौड़ो और जब तुम्हारी तादाद खूब बढ़ जाए तो अयोध्या कूच करो! फिर जैसा कि ‘सद्भावना’ के संदेशवाहक रविशंकर ने कहा भारत को सीरिया बना डालो.

एका दिखाओ एका! क्योंकि, बहुमत के विजयोन्माद या विजयी लोगों की प्रतिशोध-भावना से ज्यादा ताकत विध्वंस की किसी आग में नहीं होती. जब तालिबानियों की तादाद बढ़ी तो उन्होंने बामियान में बुद्ध की मूर्ति गिराई. जब नादिरशाह को ताकत का नशा चढ़ा तो वह दिल्ली पर टूट पड़ा. जब कारसेवकों ने अपने हथौड़े थामे तो उन्होंने मस्जिद को मिसमार किया. और, अब वही ताकत तुम्हारे बाजुओं में दौड़ रही है. हे नीच, प्रेतपूजक, मध्यकाल के गुडों! तुम धन्य हो, तुम्हें धिक्कार है!

क्या खुशकिस्मती है?

और, अपनी खुशकिस्मती देखो कि हिन्दुस्तान में तुम्हारे विध्वंस तथा विनाशलीला के लिए बहुत कुछ शेष है. हम प्राचीन सभ्यता के लोग हैं, ऐसी सभ्यता जो बहुत सारी संस्कृतियों, उनके साझेपन और सहिष्णुता के मूल्य के सहारे जीती और जागती आयी है. इस सरजमीं पर हर विचारधारा, आस्था-विश्वास और इतिहास के हर दौर को सैकड़ों साल तक जीने-जागने का पर्याप्त जगह मिली.

हमारे पास बौद्ध धर्म, जैन धर्म, इस्लाम, साम्यवाद, पूंजीवाद, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता, उपनिवेशवाद, द्रविड़वाद, गांधीवाद, अंबेडकरवाद, नेहरुवाद... के स्मारक हैं. इतिहास का बहुत कुछ है, बहुत कुछ है जो तुम्हारी जुनूनी ताकत की राह में तोड़े और ढाहे जाने के लिए खड़ा है. तुम्हारी विध्वंस-लीला की राह देखती मूर्तियों की एक विशाल तादाद है. सो, अब एक हो जाओ और एकदम से टूट पड़ो, कुछ और मदद की दरकार हो तो साथ देने के लिए तालिबान को बुला लो!

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लेकिन जरा ठहरो! मूर्तियों और विचारधाराओं के नाम पर सनकी लोगों की भीड़ खून-खराबा करने को उतावली है. यह भीड़ इन मूर्तियों और विचारधाराओं के मायने तक नहीं समझतीं और इसी भीड़ के लिए तुम हिन्दुस्तान को जंग का एक मैदान बनाने पर तुले हो लेकिन ऐसा करने से पहले जरा ठहरो और सोचो कि कभी आप मूर्ति होते हैं तो कभी चिड़िया (और गिल्बर्ट का यह कहा एकदम सटीक है, है ना?) दिन बदलते देर नहीं लगती, दिन रात के अंधेरे में समा जाता है और रात आखिर को सुबह में तब्दील हो जाती है. तो आप भी किसी दिन मूर्ति में तब्दील होंगे और तब दूसरे विश्वास और आस्थाओं की चिड़िया आपके साथ अपनी मनमर्जी का बरताव करने के लिए पंख फड़फड़ा रही होंगी.

इतिहास किसी को नहीं बख्शता!

एक बात और! त्रिपुरा के चुनाव के असली सबक पर भी जरा विचार कीजिए: सूरज तो हर साम्राज्य का डूबता है. सबेरे का केसरिया सूरज हमेशा लाल या किसी और रंग में तब्दील होता है. इसलिए, सावधान रहिए क्योंकि इतिहास का चलता चक्र किसी को नहीं बख्शता!

इस गुंडागर्दी के साथ एक मुश्किल और भी है- उत्पातियों की जमात मानकर चल रही है कि उनके इस कारनामे से भारत का गौरव बढ़ता है. उत्पातियों की यह भीड़ मान सकती है कि लेनिन या पेरियार की मूर्ति गिराने से भारतमाता की जय का स्वर दुनिया में ज्यादा जोर से गूंजेगा.

लेकिन सच्चाई तो यह है कि उनके ये कारनामे भारतमाता को शर्मिन्दा करने वाले हैं. मूर्तियां किसी रोज फिर से बनायी जा सकती हैं लेकिन उत्पात का असल शिकार तो भारतमाता हो रही हैं और भारतमाता को होने वाला नुकसान कहीं ज्यादा बड़ा है.

यह कहना कि लेनिन के लिए भारत में कोई जगह नहीं दरअसल अपने मिजाज से एक तालिबानी तर्क है. तालिबानी तर्क कहता है कि धरती बामियान की है तो यहां महात्मा बुद्ध क्या कर रहे हैं? जिन देशों का दिल बड़ा है, जहां भाव-भूमि उदार है वहां अपने इतिहास को सम्मान की नजर से देखने का चलन रहा है, अपने आस-पास की दुनिया के लिए वहां कद्र और परवाह की रिवायत रही है. उदार भावभूमि वाले देश स्मारकों को संभालकर रखते हैं, इन स्मारकों से सीख लेते हैं और उनपर गर्व करते हैं.

मलेशिया से सीख लेना जरूरी

इसकी मिसाल देखनी हो तो मलेशिया जाएं और देखें कि कैसे एक मुस्लिम देश ने अपनी बौद्ध संस्कृति तथा उसकी हिन्दुस्तानी जड़ों को जगह देते हुए कुआलालंपुर के नजदीक पूंजीवाद के प्रतीक बन चले जेन्टिंग हाइलैंड (पहाड़ी) में मुजाहरे के लिए सजा रखा है. मौज-मजे और विषय-वासना के इस गढ़ में घुसकर जब आप पहाड़ियों पर चढ़ते हैं तो आपको ऊंचाइयों पर चीन स्वी केव्स के नाम से मशहूर मंदिर नजर आता हैं.

इस मंदिर में महात्मा बुद्ध की ही नहीं बल्कि उनके शिष्यों की भी पूजा-अर्चना होती है. बुद्ध के ऐसे ही एक शिष्य हैं ब्राह्म्ण कुल में उत्पन्न भारद्वाज जिनकी एक विशाल और रंगों के संयोजन के सहारे मन को मोहने वाली एक विशाल मूर्ति यहां लगी है. यहां से चंद किलोमीटर की दूरी पर बातू गुफा है जहां भगवान मुरुगन का एक हिन्दू मंदिर है. तो फिर पूछा जा सकता है कि मुस्लिम देश मलेशिया में बुद्ध, भारद्वाज तथा मुरुगन क्या कर रहे हैं? दक्षिण अफ्रीका समेत बाकी ढेर सारे देशों में महात्मा गांधी क्या कर रहे हैं? आखिर हमारे प्रधानमंत्री एक-दूसरे के साथ विदेशी निवेश के मामले में प्रतिस्पर्धा क्यों करते हैं?

लेनिन ने दुनिया के मजदूरों से एकजुट होने के लिए कहा था. उन्होंने अंग्रेज शासकों के खिलाफ भारत की आजादी के आंदोलन को अपना समर्थन दिया. भगत सिंह सरीखे क्रांतिकारियों को लेनिन से प्रेरणा मिली थी. लेकिन त्रिपुरा में उत्पात मचाने वाले गुंडों को शायद इन बातों का पता नहीं और इस उन्मादी जमात को जो लोग अपने इशारे से नचा रहे हैं वे भी शायद इन तथ्यों से अनजान हैं.

कहां ले जाएगी इतिहास मचाने की होड़

इतिहास और इसके प्रतीकों को मिटाने की मची होड़ कहीं और नहीं बल्कि अराजकता और अशांति की तरफ ले जाएगी. नफरत और बढ़ेगी, लोगों के दिलों में एक-दूसरे के लिए और ज्यादा वैर-भाव पनपेगा. और, यही हो रहा है, ऐसा होता हम अपनी आंखों से देख रहे हैं. पहले वे गौरक्षक बनकर आये, फिर वे कम्युनिज्म (साम्यवाद) के संहारक बनकर पहुंचे और इसके बाद द्रविड़वाद के दुश्मन बनकर. जल्दी ही वे उन सारी चीजों के खिलाफ जत्था बनाकर आएंगे जो उनकी विश्वदृष्टि से मेल नहीं खाता.

ना, गुंडों के नहीं बल्कि दुनिया में उदारता को पसंद करने वाले लोगों के लिए यह वक्त एकजुट होने का है- बदला लेने और नफरत फैलाने वाली इन विचारधाराओं के खिलाफ एकता कायम करने का है. भारतमाता को जो बातें हमेशा से अजीज रही हैं, नफरत में अंधी यह जमात तो उन सारी चीजों को मिटाने के लिए आमादा हैं!

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