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उत्तर प्रदेश में 'जमींदोज' हुए वामदल, सभी प्रत्याशियों की जमानत जब्त

यूपी में एक भी सीट नहीं जीत पाए वामदल

FP Staff Updated On: Mar 15, 2017 11:25 PM IST

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उत्तर प्रदेश में 'जमींदोज' हुए वामदल, सभी प्रत्याशियों की जमानत जब्त

बिहार की तर्ज पर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के लिए भी वामदलों ने एकजुट होकर चुनाव मैदान में कूदने का फैसला किया. लेकिन यूपी की जनता ने इन्हें पूरी तरह से नकार दिया. वामदलों के सभी प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई हैं.

वामदलों का इस चुनाव में बुरा हश्र कुछ इस तरह से समझा जा सकता है कि प्रदेश की जनता ने वामदलों की तुलना में नोटा के लिए कई गुना ज्यादा वोट दिए.

यूपी चुनाव में पहली बार भाकपा, माकपा और भाकपा माले सहित छह वामदलों ने विधानसभा चुनावों के लिए साझा प्रत्याशी उतारे. उन्होंने सौ सीटों पर कम से कम 10 से 15 हजार वोट हासिल करने का लक्ष्य रखा.

यही नहीं इनके बेहतर प्रदर्शन करने के लिए वामदलों से सीताराम येचुरी, डी.राजा, वृंदा करात, दीपांकर भट्टाचार्य जैसे करीब 70 दिग्गज नेताओं को स्टार प्रचारक के तौर पर पेश किया. लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ.

बेहद कम वोट हासिल कर पाए हैं वाम दल

चुनाव आयोग के आंकड़े गवाह हैं कि करोड़ों की आबादी वाले उत्तर प्रदेश में वामदल कुल मिलाकर 1 लाख 38 हजार 763 वोट ही हासिल कर सके. यह कुल मतों को. 2 प्रतिशत होता है. वहीं नोटा के लिए प्रदेश की जनता ने 7 लाख 57 हजार 643 वोट दिए, यह करीब . 9 फीसदी बैठता है.

पश्चिम उत्तर प्रदेश से लेकर पूर्वी उत्तर प्रदेश तक वामदल चंद वोटों को ही जुटाने में तरस गए. राजनीतिक रूप से सबसे ज्यादा चर्चित अयोध्या की बात करें तो यहां सीपीआई के सूर्यकांत पांडेय काफी कोशिश के बाद भी महज 1353 लोगों का ही वोट हासिल कर सके.

दंगे की आग से झुलसे मुजफ्फरनगर में सीपीआई के मुर्तजा सलमानी को कुल मिलाकर 491 वोट ही मिले. आजमगढ़ में भी यही हाल रहा. यहां सीपीआई मार्कसवादी के राम बृक्ष 1040 वोट के साथ जमानत जब्त हुई, जबकि गाजियाबाद के साहिबाबाद में इसी पार्टी के जगदंबा प्रसाद 1087 वोट के साथ जमानत नहीं बचा सके.

साफ जाहिर है कि प्रदेश की तीसरी सबसे बड़ी ताकत माने जाने वाले वाम दल यूपी से साफ हो चुके हैं. 2007, 2012 के बाद अब 2017 में वह एक सीट जीतने को तरस गए, यही नहीं मत प्रतिशत भी शून्य के करीब पहुंच चुका है.

1969 में 81 सीट जीतकर बनाया था इतिहास.

वैसे 1957 से 2002 के बीच हुए विधानसभा चुनावों में वाम दल के उम्मीदवार जीत हासिल करते रहे. इनमें 1969 की भाकपा की 80 और माकपा की एक सीट पर जीत अब तक की वाम दलों की यूपी में सबसे बड़ी जीत मानी जाती है. लेकिन इसके बाद स्थिति खराब ही होती चली गई.

राजनीतिक विश्लेषक इसके पीछे यूपी में कई छोटी-बड़ी फैक्ट्रियों के बंद होने को अहम कारण मानते हैं. उनका कहना है कि फैक्ट्रियां बंद होने से ट्रेड यूनियन आंदोलन कमजोर हो गया और वाम नेता दूसरे किसी मुद्दे पर कोई विशेष छाप नहीं छोड़ सके.

संगठन के स्तर पर भी कोई काम नहीं किया गया, ज्यादातर वाम दलों का रुझान पश्चिम बंगाल और केरल की तरफ ही सिमट गया. नतीजा ये हुआ कि यूपी की जनता धीरे-धीरे उन्हें भुलाती चली गई.

सीपीआई और सीपीएम का यूपी में प्रदर्शन

1957 में 9 सीटें जीतीं

1962 में 14 सीटें जीतीं

1967 में 14 सीटें जीतीं

1969 में 81 सीटें जीतीं

1974 में 18 सीटें जीतीं

1977 में 10 सीटें जीतीं

1980 में 7 सीटें जीतीं

1985 में 8 सीटें जीतीं

1989 में 8 सीटें जीतीं

1991 में 5 सीटें जीतीं

1993 में 4 सीटें जीतीं

1996 में 5 सीटें जीतीं

2002 में 2 सीटें जीतीं

2007 में एक भी सीट नहीं जीती

2012 में एक भी सीट नहीं जीती

2017 में एक भी सीट नहीं जीती

(साभार: न्यूज18)

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