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'दिल्ली चलो अभियान' में बदल गया नोटबंदी विरोध

विपक्ष के नेता इसे दिल्ली में अपनी दावेदारी के एक अवसर के रूप में देख रहे है.

Updated On: Dec 02, 2016 08:14 AM IST

Sitesh Dwivedi

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'दिल्ली चलो अभियान' में बदल गया नोटबंदी विरोध

नोटबंदी पर शुरू हुई विपक्ष की जंग अब दिल्ली चलो की जंग में तब्दील हो गयी है. जहां केंद्र में भाजपा सरकार के मुकाबले राज्यसभा में थोड़ी बढ़त वाली कांग्रेस इसे राहुल के लांचिंग के अवसर में देख रही है, वहीं विपक्ष के नेता इसे दिल्ली में अपनी दावेदारी के एक अवसर के रूप में.
नतीजा, नोटबंदी की लड़ाई 'सड़क पर बिखर के संसद तक सिमट' गई  है. जबकि 2019 में प्रधानमंत्री पद के चेहरे की लड़ाई को लेकर विपक्ष अब सड़क की लड़ाई में उतर गया है.
विपक्षी नेता देख रहे हैं सपने
कुछ समय पहले तक विपक्ष के लगभग स्वीकार्य चेहरे के तौर पर देखे जा रहे जदयू नेता और बिहार के मुखिया नीतीश कुमार को दोहरी चुनौती मिल रही है. एक तरफ 'महागठबंधन' के भरोसे दिल्ली विजय का सपना देख रहे सपा सुप्रीमो मुलायम की महत्वाकांक्षा फिर करवटें ले रही है.
Photos. PTI
दूसरी तरफ बंगाल से दिल्ली का सफर तय करने का सपना संजोए तृणमूल की ममता बनर्जी अप्रत्याशित तरीके से इस लड़ाई की शुरुआत कर चुकी हैं. अपने आक्रामक तेवरों से लैस ममता इस लड़ाई में फिलहाल काफी आगे दिख रही हैं. वे हिंदी में ट्वीट कर रही हैं, हिंदी में भाषण दे रही हैं, हिंदी भाषी राज्यो का दौरा कर रही है साथ ही अपने भाषण में शब्दों का ऐसा प्रयोग कर रही हैं, मानो मोदी विरोध की मशाल वे ही लिए हैं.
दिल्ली में वे आर-पार की लड़ाई का एलान करती हैं, तो उत्तर प्रदेश में वे समाजवादी मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को आशीर्वाद दे खुद को बड़ा दिखाती हैं. सबसे महत्वपूर्ण बिहार में जाकर नोटबंदी में अपने साथ (इसे अपने पीछे खड़े भी पढ़ सकतें हैं) खड़े दलों को धन्यवाद देने के साथ विरोधियों को गद्दार बताती हैं.
'जो पार्टियां नोटबंदी के मुद्दे हमारा समर्थन कर रही हैं, मैं उन्हें शुक्रिया अदा करती हूं और जो समर्थन नहीं कर रहे हैं वे गद्दार हैं.'
बिहार में इस गद्दार शब्द का इशारा किसकी तरफ है, इसे समझना बहुत कठिन नहीं है. लेकिन राज्य में शराबबंदी को लेकर सहयोगियों से सहयोग पाने की जद्दोजहद कर रहे नीतीश कुमार के लिए ममता की राजद से निकटता कठिन चुनौती जरूर है.
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ममता का लालू-राबड़ी से मिलन का दांव
गौरतलब है कि पटना के गर्दनीबाग में नोटबंदी के खिलाफ धरना देने पहुंचीं ममता के साथ मंच पर न सिर्फ राजद के नेता मौजूद थे, बल्कि राजद प्रदेश अध्यक्ष रामचंद्र पूर्वे और वरिष्ठ नेता रघुवंश प्रसाद सिंह धरने में भी शामिल हुए.
इससे पहले ममता राजद मुखिया लालू से उनके घर गई तो लालू और उनकी पत्नी राबड़ी देवी ने गर्मजोशी से उनका स्वागत किया. जाहिर है, दिल्ली की बड़ी लड़ाई से पहले पेशबंदी और पाले खींचने का काम शुरू हो गया है.
इस लड़ाई को आंकड़ों से समझे तो वर्तमान लोकसभा में क्षेत्रीय दलों की स्थिति को समझना जरूरी है. विपक्ष में कांग्रेस के पास 44 सदस्य हैं तो तृणमूल कांग्रेस के पास 34 सदस्य हैं. जबकि, जदयू के पास दो तो सपा के पास महज 5 सीटें हैं. जाहिर है, एएआईडीएमके के बाद सबसे बड़ी संख्या तृणमूल के पास है, एआईडीएमके की कोई राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा नहीं हैं, जबकि उपचुनावों से स्पष्ट है कि तृणमूल अभी भी लोकप्रियता की लहर पर है.
बाकी विपक्ष में बीजद के आलावा कोई दहाई पर खड़ा दल ऐसा नहीं है जो दिल्ली में सीधी लड़ाई की महत्वाकांक्षा रखता हो. साफ है, ममता मौके की नजाकत को समझ रही हैं, उन्होंने एक लंबी लेकिन औचित्यपूर्ण लड़ाई की शुरुआत कर दी है.
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नोटबंदी के बाद सामने आ गई विपक्ष की रणनीति
दरअसल, नोटबंदी के विरोध ने दिल्ली की लड़ाई को लेकर विपक्ष की रणनीति को समय से पहले उजागर कर दिया है. इस मामले में विरोध की रणनीति पहले श्रेय की लड़ाई में उलझी, सत्ता से कुछ राहत की उम्मीद में कांग्रेस के साथ जुटे क्षेत्रीय दलों को लगा कि कांग्रेस उनकी ताकत पर प्रचार पा रही है.
लेकिन भारत बंद को लेकर इसमें राज्यों की लड़ाई आड़े आ गई. भारत बंद की स्थिति में उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा कहाँ खड़े होते, जीत किसकी होती? यही सवाल पश्चिम बंगाल, बिहार जैसे राज्यों में भी सामान रूप से प्रासंगिक होता.
नतीजा यह हुआ कि संसद की चहारदीवारी के भीतर मानवश्रृंखला बनाये खड़ा विपक्ष सड़क पर उतर ही नहीं सका. जबकि दिल्ली पर निशाना लगाए क्षत्रप तब और चौकन्ने हो गए, जब बेहद अप्रत्याशित रूप से नीतीश कुमार ने नोटबंदी का मुखर समर्थन कर दिया. नीतीश के दांव से दिल्ली के सपने देख रहे बाकी दल भी अपने पत्ते खोलने और फेंटने को मजबूर हो गए.
कांग्रेस ने पहल करते हुए अपने युवराज की दावेदारी सुरक्षित करने की कोशिश में कहा 'विपक्ष का प्रधानमंत्री पद का एक ही दावेदार होगा'. स्वाभाविक है वो पार्टी नेता राहुल गांधी ही होंगे. इसके बाद मुलायम ने नोटबंदी के विरोध के बीच कांग्रेस से किनारा किया तो विरोध की राजनीति में कांग्रेस से आगे निकलती दिख रही ममता को यूपी में मंच देकर कांग्रेस को सन्देश भी दे दिया.
इस सबके बीच नोटबंदी से परिणाम के आकलन में जुटी भाजपा फिलहाल 'कंफर्ट जोन' में है. राज्यों में मिली जीत उसे उत्साहित कर रही है तो बिखरा विपक्ष उसे नोटबंदी से उपजे हालात से निपटने का मौका दे रहा है.

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