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चारा घोटाला: बिहार के राजा रहे लालू प्रसाद यादव की मुश्किलें बढ़ने वाली हैं

लालू यादव के पास एक समय पर बेजोड़ ताकत थी, मगर वक्त हमेशा एक सा नहीं रहता

Sanjay Singh Updated On: Dec 24, 2017 10:39 AM IST

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चारा घोटाला: बिहार के राजा रहे लालू प्रसाद यादव की मुश्किलें बढ़ने वाली हैं

लालू यादव चारा घोटाले के एक और मामले में दोषी पाये गये हैं और उन्हें फिर से जेल भेज दिया गया है. लालू यादव कभी बिहार के अपराजेय “राजा” कहलाये तो कभी मंडल के मसीहा. उन्हें बिहार के पिछड़ेपन और जंगलराज से जोड़कर देखा गया. केंद्र की सियासत का स्वघोषित किंगमेकर होने, सूबे बिहार में सत्ता का समानान्तर केंद्र चलाने और फिर जेल में बंद एक ऐसे व्यक्ति के रुप में जिसे चुनाव लड़ने की मनाही है, बिहार के इस पूर्व मुख्यमंत्री और आरजेडी के मुखिया ने वक्त के कई उतार-चढ़ाव देखे हैं.

बीते तीन दशकों में लालू यादव ने जो कुछ हासिल किया और गंवाया है उसे देखते हुए समकालीन भारतीय राजनीति के इतिहास में उनका कोई जोड़ नहीं है. लालू यादव को कम से कम फिलहाल और निकट भविष्य में इस बात के लिए याद किया जायेगा कि वे बार-बार दोषी सिद्ध हुए और बार-बार जेल गये. शायद ही कोई और राजनेता होगा जिसने मुख्यमंत्री के पद, केंद्र में मंत्री पद, दो राज्यों बिहार और झारखंड की अदालतों और फिर इन्हीं दो राज्यों की जेलों में इतनी जल्दी आवा-जाही की हो.

कोर्ट ने अभी दोषी करार दिया है, अपराध की सजा अदालत 3 जनवरी को सुनायेगी. इसका मतलब हुआ लालू यादव को अभी दस तीन और इंतजार करना पड़ेगा. इसके बाद ही उन्हें पता चलेगा कि इस मामले में उन्हें कितना वक्त जेल में बिताना होगा. नये साल का आगमन, जाहिर है, लालू यादव के लिए बहुत मुश्किल साबित होने जा रहा है. उन्हें अधिकतम सात साल की सजा हो सकती है.

अभी बढ़ सकती हैं मुसीबतें

Lalu Yadav Residence in Patna

लालू यादव के घर सीबीआई का छापा फोटो सोर्स- पीटीआई

चारा घोटाले के एक अन्य मामले में उन्हें 2013 के अक्तूबर में दोषी करार दिया गया और पांच साल के जेल की सजा हुई. अभी वे जमानत पर चल रहे थे. चारा घोटाले से जुड़े तीन और मामलों में वे अभियुक्त हैं और इन मामलों में सुनवाई जारी है.

गौरतलब है कि 2014 में लालू यादव चारा घोटाले से जुड़े एक मामले में दोषी करार दिए गए. इसके बाद झारखंड हाइकोर्ट ने उन्हें राहत देते हुए घोटाला से जुड़े अन्य मामलों की सुनवाई पर रोक लगा दी थी. लेकिन मई 2017 में उन्हें कानून के मैदान में जोर का धक्का लगा. सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड के हाइकोर्ट का आदेश उलटते हुए आदेश दिया कि सीबीआई की स्पेशल कोर्ट में लालू यादव के खिलाफ चारा घोटाले से जुड़े धोखाघड़ी, फर्जीवाड़ा और साजिश के मामलों में सुनवाई जारी रखी जाये और इसे नौ महीने के भीतर पूरा करते हुए फैसला सुनाया जाए.

विडंबना ये है कि लालू यादव 900 करोड़ के चारा घोटाले में अब दो अलग-अलग मामलों में दोषी सिद्ध हुए हैं और हेराफेरी की कारगुजारियों की वजह से उन्हें जेल जाना पड़ा है. ऐसा पहली बार हुआ जब वे बिहार के मुख्यमंत्री(1990-97 का समय जब वे खुद को बिहार का राजा कहा करते थे) थे. फिर केंद्र में किंगमेकर और फिर केंद्रीय मंत्री की भूमिका निभाने के दौरान उनकी कारगुजारियों और भ्रष्ट आचरण से पूरा परिवार—पत्नी, पुत्र, बेटी और दामाद कानून के शिकंजे में आये, इस वक्त उन्होंने शेल कंपनियां खड़ी की और दिल्ली-एनसीआर, पटना तथा अन्य जगहों पर ऊंची कीमत की संपत्ति बनायी. जान पड़ता है कि लालू यादव के भीतर धन कमाने की अबुझ प्यास है. उन्होंने अपने नौ बेटे बेटियों, पत्नी तथा खुद के लिए महंगी जगहों पर बड़ी ऊंची कीमत की जायदाद खड़ी की है.

आयकर और प्रवर्तन निदेशालय मनी लॉन्ड्रिंग, शेल कंपनी तथा भ्रष्ट तरीके से संपत्ति हासिल करने के मामले में उनकी पत्नी(पूर्व मुख्यमंत्री) राबड़ी देवी, बेटे(पूर्व उपमुख्यमंत्री तथा मंत्री) तेजस्वी और तेजप्रताप, बेटी(राज्यसभा की सांसद) मीसा भारती, दामाद शैलेश तथा दो अन्य बेटियों के खिलाफ जांच कर रहे हैं.

बेजोड़ ताकतवर रहे हैं लालू

लालू ने अडवाणी का राम रथ रुकवा दिया था. फोटो सोर्स- विकीपीडिया

लालू ने अडवाणी का राम रथ रुकवा दिया था. फोटो सोर्स- विकीपीडिया

लालू यादव के उत्थान और पतन की कहानी बड़ी दिलचस्प है— यह एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जो अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति के सहारे साधारण पृष्ठभूमि से ऊपर उठकर खूब ऊंचाई पर पहुंचा और फिर अपने लालच के कारण उस ऊंचाई से नीचे गिर पड़ा.

लालू यादव कभी इतने ताकतवर हुआ करते थे कि उन्होंने बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी की गिरफ्तारी तथा राम रथयात्रा रोकने के आदेश जारी किए थे. केंद्र में वीपी सिंह की सरकार इसी वजह से गिरी. तब उनकी ताकत इतनी हुआ करती थी कि 1997 में जेल जाने के बाद उन्होंने अपनी गृहिणी राबड़ी देवी को सूबे का मुख्यमंत्री बनाया. राबड़ी देवी का शासन आठ सालों यानी 2005 तक चलता रहा(हां, इस अवधि में बीच-बीच में कुछ अवरोध भी आये)

वे इतने ताकतवर थे कि सन् 2000 की फरवरी में उनकी पार्टी चुनाव हार गई तो उन्होंने मनमोहन सिंह सरकार से सूबे में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश की और राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के हस्ताक्षर लेने के लिए फाइल विदेश पहुंचायी गई क्योंकि राष्ट्रपति उस वक्त विदेश के दौरे पर थे.

लालू यादव इतने ताकतवर थे कि अदालत में दोषी करार दिए जाने के बाद भी उनकी संसद की सीट बचाने के लिए यूपीए सरकार को अध्यादेश लाना पड़ा हालांकि इसे राहुल गांधी ने एकदम आखिरी लम्हे में फाड़ दिया था.

लालू यादव की ताकत ऐसी थी कि वे जमानत पर जेल से बाहर रहते हुए 2015 के चुनावों में अपनी पार्टी आरजेडी को बिहार विधानसभा के लिए सबसे ज्यादा सीटें दिलवा सके और फिर नौवीं क्लास तक की पढ़ाई पूरी करने वाले बेटे तेजस्वी को उप-मुख्यमंत्री बनाया तथा 12 वीं पास करने वाले बेटे को सरकार में मंत्री के पद पर बैठाया. लालू यादव इस दौर में किसी पद पर ना होते हुए भी किसी मुख्यमंत्री की तरह की तरह बरताव कर रहे थे.

वे और उनकी पत्नी राबड़ी देवी सबसे एलीट सुरक्षा दस्ता कहलाने वाले एनजीसी के ब्लैक कैट कमांडों की हिफाजत में रहा और चला करते थे. उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व रेलमंत्री के नाते मिली सारी सुविधाएं हासिल थीं.

लेकिन अच्छी चीजें ज्यादा दिन तक नहीं टिकतीं. बीते छह महीनों से लालू यादव की कहानी में मोड़ आया है और अब ऊंचाई से उनका गिरना लगातार जारी है. उनकी पार्टी और बेटे बिहार सरकार से बाहर निकाल दिए गए हैं, पूरा परिवार अपराध और भ्रष्टाचार के अलग-अलग मामलों में कानून के घेरे में है और लालू यादव खुद चारा घोटाले से जुड़े दूसरे मामले में दोषी सिद्ध होकर जेल में हैं. बड़ा सवाल यह है कि क्या लालू यादव खुद को, अपने परिवार और पार्टी को फिर से ताकत के पुराने दिन लौटा पायेंगे?

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