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लालू की रैली: विपक्षी एकता की कोशिश कितनी रंग लाएगी?

जेडीयू सांसद शरद यादव और जेडीयू से निलंबित सांसद अली अनवर की मंच पर मौजूदगी ने लालू यादव को गदगद कर दिया

Updated On: Aug 27, 2017 07:51 PM IST

Amitesh Amitesh
विशेष संवाददाता, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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लालू की रैली: विपक्षी एकता की कोशिश कितनी रंग लाएगी?

आरजेडी सुप्रीमो लालू यादव ने पटना के गांधी मैदान में लड़ाई का शंखनाद कर दिया. अपने समर्थकों की मौजूदगी में लालू यादव के इशारे पर बड़े बेटे तेजप्रताप ने शंख बजाकर बीजेपी और नीतीश कुमार को उखाड़ फेंकने का आह्वान कर दिया.

महागठबंधन टूटने का दर्द तो सभी नेताओं के भाषणों से झलका, गुस्सा भी दिखा. सबने मोदी और नीतीश कुमार के गठबंधन को बिहार ही नहीं देश से उखाड़ फेंकने का संकल्प भी लिया. लेकिन, ऐसा करते वक्त लालू परिवार के भीतर का डर भी बीच-बीच में बाहर आ गया.

भाषणों में दिखा छापेमारी का दर्द

जब लालू के बड़े बेटे तेजप्रताप लड़ाई का बिगुल बजा रहे थे तो छोटे बेटे और लालू के असली राजनैतिक वारिस तेजस्वी यादव बेनामी संपत्ति मामले में सीबीआई की तरफ से की जा रही छापेमारी का रोना रो रहे थे.

पूर्व डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव की बातों से परिवार के भीतर का वो डर झलक रहा था, जिसमें लालू का लगभग पूरा कुनबा फंसता नजर आ रहा है. तेजस्वी यादव को इस बात का डर सता रहा है कि बेनामी संपत्ति के मामले में अभी तो उनपर सिर्फ एफआईआर ही दर्ज की गई है. आगे चार्जशीट भी दाखिल हो सकती है. शिकंजा कसा तो फिर गिरफ्तारी भी संभव है.

तेजस्वी ने रैली के दौरान इसका जिक्र करते हुए कहा कि ऐसा शायद ही कोई परिवार होगा, जिसकी तीन-तीन पीढ़ियों ने सीबीआई का छापा देखने का काम किया है. तेजस्वी ने अपने समर्थकों को समझाने की कोशिश की. कहा ‘पिता लालू के घर पर छापा पड़ा, अब जब छापा पड़ा है तो उनके बेटे-बेटियां यानी दूसरी पीढ़ी के लोग इसे देख रहे हैं और परिवार के जो छोटे बच्चे हैं वो भी इसे देख रहे हैं.’ यानी तीन पीढ़ी ने इन छापों को देखा है.

निश्चित रूप से तेजस्वी भी इस बात को समझ रहे होंगे कि सीबीआई की तरफ से की जा रही छापेमारी कोई प्रतिष्ठा का विषय नहीं है और ना ही इस पर फक्र किया जा सकता है. फिर भी इस तरह सीबीआई की छापेमारी का अपने समर्थकों के सामने जिक्र कर उनकी कोशिश यह दिखाने की है कि जानबूझकर उन्हें परेशान किया जा रहा है. आगे सीबीआई और परेशान कर सकती है.

मतलब सीबीआई अगर बेनामी संपत्ति के मामले में शिकंजा कसी तो उसके पहले ही अपने समर्थकों से सहानुभूति की अपील की जा रही है. दिखाने का प्रयास है कि किसी के बरगलाने में आने की जरूरत नहीं. हम बिल्कुल सही और सच्चे हैं. गलत तो वो हैं जो एक नौजवान के उभार को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे. तेजस्वी की ही बात को लालू और राबड़ी ने भी आगे बढ़ाया.

तेजस्वी को स्थापित करने की कोशिश

बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बने तेजस्वी यादव ने भ्रष्टाचार के मसले पर सीधे नीतीश कुमार पर निशाना साधा.

सृजन घोटाले को लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से लेकर उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी पूरे लालू परिवार के निशाने पर रहे. लेकिन, तेजस्वी ने जिस आक्रामक अंदाज में नीतीश कुमार पर दनादन वार किए उससे लालू की सोंची-समझी रणनीति का पता चलता है.

तेजस्वी ने नीतीश कुमार पर कटाक्ष करते हुए कहा ‘ऐसा कोई सगा नहीं, जिसे नीतीश ने ठगा नहीं.’ रैली की भीड़ से गदगद लालू और तेजस्वी ने नीतीश कुमार के जनाधार पर सवाल खड़ा किया. एक बार फिर से दूसरों की वैशाखी पर चलने वाला राजनेता बता दिया.

तेजस्वी ने नीतीश कुमार को चुनौती देते हुए कहा ‘लालू यादव का खून है मेरे अंदर, मुझे क्या उखाड़ फेंकेगे.’

बिहार की जनता के सामने विपक्षी नेताओं की मौजूदगी में लालू की कोशिश तेजस्वी को अपने वारिस के तौर पर स्थापित करने की थी. लालू इस कोशिश में तो कामयाब होते दिखे.

भाजपा भगाओ रैली में निशाने पर नीतीश

‘ए गो छवंड़ी बुलुकी, जेने देखे दही चूड़ा, ओने जाके हुलुकी.’ कुछ इस तरह से लालू ने अपने ठेंठ-गवहीं अंदाज में नीतीश कुमार पर भोजपुरी में कटाक्ष किया. लालू ने नीतीश को पल्टूराम कहते हुए ताना मारा और उन्हें किसी के भी भरोसे के काबिल नहीं बताया.

एक महीने पहले ही नीतीश कुमार के महागठबंधन से अलग होने का दर्द अभी भी लालू यादव को महसूस हो रहा है. लालू के भीतर की टीस रह-रह कर उजागर हो रही है. लालू ने रैली में भी नीतीश कुमार पर जनादेश का अपमान करने और उन्हें धोखा देने का आरोप लगाया. इस बार भी लालू यह बताने से नहीं चूके कि नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने तो उनके ही रहमोकरम पर.

आरजेडी की इस रैली का नाम ‘भाजपा भगाओ देश बचाओ रैली’ था. मकसद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र की बीजेपी सरकार के खिलाफ बड़ी लड़ाई का आगाज करना था. लेकिन, इस रैली में बीजेपी और मोदी से ज्यादा निशाने पर नीतीश कुमार ही रहे.

कितनी सफल रही विपक्षी एकता की कोशिश

पटना की इस रैली में सभी विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने की तैयारी थी. लेकिन, इस रैली में सभी दल एक साथ नहीं आ सके. ममता बनर्जी और अखिलेश यादव को छोड़कर बाकी दलों के शीर्ष नेता भी नदारद दिखे.

बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने तो पहले ही इस रैली से किनारा कर लिया था. वो भी तब जबकि लालू ने बिन मांगे पहले ही मायावती को बिहार से राज्यसभा भेजने का ऑफर तक दे दिया है.

उधर, लालू की सोनिया-राहुल के प्रति भक्ति भाव के बावजूद दोनों इस रैली में नहीं पहुंचे. उनकी तरफ से गुलाम नबी आजाद और सी पी जोशी ने शिरकत की. हालाकि, सोनिया और राहुल के संदेश को रैली में सुनाया गया.

ममता बनर्जी और अखिलेश यादव की मौजूदगी के अलावा जेडी एस, लेफ्ट, नेशनल कॉंफ्रेंस, आरएलडी, डीएमके, जेवीएम, जेएमएम और एनसीपी ने अपने-अपने प्रतिनिधियों को इस रैली में भेजा था.

शरद यादव की मंच पर मौजूदगी     

जेडीयू सांसद शरद यादव और जेडीयू से निलंबित सांसद अली अनवर की मंच पर मौजूदगी ने लालू यादव को गदगद कर दिया. महागठबंधन से अलग होने के फैसले पर नीतीश कुमार से नाराज चल रहे शरद यादव ने पूरे देश में बड़े आंदोलन की तैयारी की बात की है.

शरद ने खुलकर महागठबंधन तोड़ने के फैसले की आलोचना की. इंकलाब का नारा लगाया और पूरे देश में बिहार की तर्ज पर महागठबंधन बनाने का ऐलान किया.

विपक्षी दलों को भी लगता है कि जबतक सभी एक साथ एकजुट होकर एक मंच पर नहीं आते तबतक मोदी के रथ को रोक पाना मुश्किल होगा. विपक्ष के डर का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है जब राबड़ी देवी ने विपक्षी नेताओं से हाथ जोड़कर एकजुटता की अपील की. राबड़ी ने कहा कि ‘आपसे हाथजोड़कर कह रही हूं आप एकजुट हो जाइए. वो ना घर के रहेंगे, ना घाट के.’

लालू की रैली में भीड़ पहले भी जुटती रही है. जब लालू सत्ता में थे तब भी और जब लालू सत्ता से बाहर हो चुके थो तब भी. लालू ने इसके पहले भी बड़ी रैली कर अपना जनाधार दिखाने की कोशिश की है. लेकिन, उसके बावजूद भी 2010 में पार्टी का प्रदर्शन बेहद खराब रहा.

ऐसे में लालू की रैली से कार्यकर्ताओं और नेताओं में उत्साह तो भर देगा. लेकिन, इसे चुनावों में सफलता की गारंटी के तौर पर नहीं देखा जा सकता.

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