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रुखसती के इंतजार में बैठी दुल्हन...

पेशावर में दो दुल्हनों को पिछले 8 दिनों से इंतजार है विदाई का

Nazim Naqvi Updated On: Feb 25, 2017 08:18 AM IST

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रुखसती के इंतजार में बैठी दुल्हन...

16 फरवरी की रात अचानक एक खबर आई की लाल शाहबाज कलंदर की मजार पर हुए हमले के बाद सुरक्षा-दृष्टि से पकिस्तान ने, अफगानिस्तान से यातायात के अपने दो मार्गों को सील कर दिया है.

अल-जजीरा के मुताबिक, दोनों बॉर्डर वाणिज्य और यातायात की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि फलों और दूसरी जरूरी चीजों के अलावा रोज, करीब 15 हजार अफगानी-मूल के लोग इन्हीं रास्तों से इधर-उधर आते जाते हैं.

'अफगानिस्तान की ओर खड़े ट्रकों की लम्बी लाईन में ज्यादातर फलों से लदे हुए हैं और ये ज्यादा इंतजार नहीं कर सकते, ड्राइवरों को चिंता है कि अगर सरहद जल्दी नहीं खुली तो भारी नुकसान हो सकता है.'

विदाई का इंतजार 

उधर पेशावर में दो दुल्हनों को पिछले 8 दिनों से इंतजार है विदाई का. कब दोनों मुल्कों के बीच बात-चीत हो और वो अपने पिया के घर जाएं. 16 फरवरी को ही उनकी शादी हुई थी. सुबह विदाई होनी थी, लेकिन देर रात आई इस खबर ने सबको बेचैन कर दिया. रस्म ये है कि निकाह के जोड़े में ही दुल्हनें विदा होती है.

कारी रिजवानुल्लाह अफगानिस्तान में एक मस्जिद के इमाम हैं. उन्होंने अपने दो भाइयों आबिद और इनाम की शादी पेशावर की दो लड़कियों से तय की और बारात लेकर 15 फरवरी को सरहद पार करके आ गए. निकाह हुआ, खाना हुआ, रस्में हुईं, और फिर ये खबर आई.

इंतहा हो गई इंतजार की 

रिजवानुल्लाह ने बीबीसी-उर्दू को बताया कि 'हम सब बहुत खुश थे, सब कुछ विधिपूर्वक हो चुका था, हम सुबह होने का इंतजार और रुखसती की तैयारियों में लगे हुए थे कि इस खबर से सन्नाटा छा गया. किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था की क्या करें. अब तो इस इंतजार में आठ दिन गुजर चुके हैं.'

'अगर सरहद की बंदिश का पहले एलान हो जाता तो हम पकिस्तान आने का रिस्क न लेते. हमें समझ नहीं आ रहा कि हमें कब तक यहां रुकना पड़ेगा.'

मुल्कों के बीच बड़ी-बड़ी समस्याओं के दरमियान ये एक बहुत छोटी सी खबर है. लेकिन बरबस हमें महशर रामपुरी का वो शेर याद आ गया-

न दरिया कर दे पुल मिस्मार (ढहना) मेरे I अभी कुछ लोग हैं उस पार मेरे II

और फिर विश्वास शिम्बोर्स्का की वो लाईनें याद आ गईं –

कहीं से भी तो पुख्ता नहीं हैं मनुष्य निर्मित राज्यों की सीमाएं. बादल रोज उनके पार आते-जाते हैं कोई सजा नहीं देता उन्हें मनों रेत इस देश से उड़कर उस देश चली जाती है कितने कंकड़-पत्थर हमारे पहाड़ों से लुढ़कते हुए उनके मैदानों में बस जाते हैं बिना किसी परमिट-परवाने के लेकिन मैं सिर्फ उस चींटी का जिक्र करुंगी जो सीमारक्षकों के जूतों के बीच से चली जा रही है ‘कहां से आई हो?’ और ‘कहां जाना है?’ जैसे सवालों से बेपरवाह कहीं, तभी दिमाग की एक खिड़की से झांकते हुए,

अग्रज केदारनाथ सिंह बोल पड़े-

अगर सरहद जरूरी है पड़ी रहने दो उसे जहां पड़ी है वो चलती रहे वार्ता होते रहे हस्ताक्षर ये सब सही ये सब ठीक पर हक को भी हक दो कि जिंदा रहे वो !

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