S M L

जानिए क्या है विश्वास प्रस्ताव और अविश्वास प्रस्ताव में अंतर!

आखिरी बार 2008 में लेफ्ट पार्टियों द्वारा न्यूक्लियर डील पर समर्थन वापस लेने के बाद मनमोहन सिंह की सरकार ने विश्वास प्रस्ताव पेश किया था

Updated On: Jul 20, 2018 12:20 AM IST

FP Staff

0
जानिए क्या है विश्वास प्रस्ताव और अविश्वास प्रस्ताव में अंतर!

संसद में 27वीं बार अविश्वास प्रस्ताव पर बहस होने वाली है. इस बीच अविश्वास प्रस्ताव और विश्वास प्रस्ताव को लेकर मीडिया में कई ऐसी भ्रामक खबरें देखने को मिल रही हैं, जिनमें विश्वास प्रस्ताव और अविश्वास प्रस्ताव को लेकर घालमेल किया जा रहा है. कई जगह अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा 1996 और 1999 में विश्वास प्रस्ताव में असफल होने को अविश्वास प्रस्ताव लिखा जा रहा है. जबकि यह विश्वास प्रस्ताव था और हालांकि अटल बिहारी वाजपेयी को एक बार 2003 में अविश्वास प्रस्ताव का सामना करना पड़ा था लेकिन इसमें वे सफल हुए थे.

दरअसल अविश्वास प्रस्ताव और विश्वास प्रस्ताव में अंतर होता है. अविश्वास प्रस्ताव विपक्ष द्वारा लाया जाता है जबकि विश्वास प्रस्ताव सरकार द्वारा अपने बहुमत को साबित करने के लिए. यह दो स्थितियों में सरकार द्वारा लाया जाता है, पहली स्थिति में सरकार के गठन के वक्त और दूसरी स्थिति में राष्ट्रपति के कहने पर. अब तक राष्ट्रपति के दिशा-निर्देश पर 11 बार विश्वास प्रस्ताव पेश किए जा चुके हैं. जिसमें से 6 बार सरकारें सफल हुई हैं और 5 बार असफल. विश्वास प्रस्ताव को 'ट्रस्ट वोट' भी कहा जाता है.

इन प्रधानमंत्रियों की जा चुकी है विश्वास प्रस्ताव में कुर्सी

अब तक 6 प्रधानमंत्रियों ने विश्वास प्रस्ताव पेश किया है. दो बार तो प्रधानमंत्रियों ने बिना विश्वास प्रस्ताव का सामना किए बगैर ही इस्तीफा दे दिया था. मोररजी देसाई के इस्तीफा देने के बाद 1979 में केंद्र में चौधरी चरण सिंह की सरकार बनी थी. कांग्रेस ने चरण सिंह की सरकार को बाहर से समर्थन देने का ऐलान किया था लेकिन विश्वास प्रस्ताव से पहले समर्थन वापस लेने की घोषणा कर दी. इसकी वजह से चौधरी चरण ने विश्वास प्रस्ताव को पेश किए बगैर इस्तीफा दे दिया. इस तरह चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री रहते हुए संसद न जाने वाले पहले और अबतक के एकमात्र प्रधानमंत्री हुए.

7 नवंबर, 1990 को वीपी सिंह ने बीजेपी के समर्थन वापस लेने के बाद विश्वास प्रस्ताव पेश किया था. इस विश्वास प्रस्ताव में कांग्रेस, चंद्रशेखर गुट और बीजेपी के एक साथ आने की वजह से वीपी सिंह यह प्रस्ताव हार गए. वीपी सिंह के पक्ष में 152 वोट और खिलाफ में 356 वोट पड़े. वीपी सिंह के मामले में मजेदार तथ्य यह है कि लोकसभा के एक सदस्य ने वीपी सिंह की सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस लोकसभा अध्यक्ष को दिया था. लेकिन लोकसभा अध्यक्ष ने सरकार को विश्वास प्रस्ताव पेश करने को कहा.

28 मई, 1996 को अटल बिहारी वाजपेयी ने विश्वास मत को पास न होता देख 13 दिनों में ही इस्तीफा दे दिया. 11 अप्रैल, 1997 में एचडी देवेगौड़ा कांग्रेस के समर्थन वापस लेने के बाद विश्वास प्रस्ताव में हार गए. 17 अप्रैल, 1999 अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार जयललिता द्वारा समर्थन वापस लेने की बाद 1 वोट से गिर गई. विश्वास प्रस्ताव के पक्ष में 269 और खिलाफ में 270 वोट पड़े.

इसके बाद 2008 में लेफ्ट पार्टियों द्वारा न्यूक्लियर डील पर समर्थन वापस लेने के बाद मनमोहन सिंह की सरकार ने विश्वास प्रस्ताव पेश किया था. इसमें काफी नजदीकी अंतर से मनमोहन सिंह की सरकार को जीत मिली थी. सरकार के पक्ष में 275 वोट पड़े और विपक्ष में 256 वोट जबकि 10 सदस्य लोकसभा से अनुपस्थित रहे.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
Jab We Sat: ग्राउंड '0' से Rahul Kanwar की रिपोर्ट

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi