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दलाई लामा की यात्रा को राजनीतिक रंग देना गलत: किरन रिजिजू

दलाई लामा की अरुणाचल यात्रा पर क्या है गृह राज्य मंत्री किरन रिजिजू का कहना

FP Staff Updated On: Apr 04, 2017 11:34 PM IST

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दलाई लामा की यात्रा को राजनीतिक रंग देना गलत: किरन रिजिजू

अरुणाचल प्रदेश में हम सभी दलाई लामा के 1959 में तिब्बत से भारत तक की यात्रा की कहानियां सुनकर बड़े हुए हैं. ये वहां की लोककथाओं का हिस्सा हैं.

हमारे बड़ों ने हमें उस जमाने की कहानियां सुनाईं, लेकिन 1983 तक मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि एक दिन मैं उनसे साक्षात मिल पाउंगा.

1959 के बाद पहली बार 1983 में दलाई लामा ने अरुणाचल प्रदेश का दौरा किया. मुझे आज भी याद है कि कैसे मैं अपने पिता और बाकी परिवार वालों के साथ उनके दर्शन करने के लिए गया था.

उस वक्त मेरी उम्र 14 साल थी. हम गृह-शहर बोमडिला से पड़ोस के दुरांग शहर पहुंचे, जहां वो उपदेश दे रहे थे.

उनका आभामण्डल, उनकी महज़ मौजूदगी मेरे दिलो-दिमाग पर असर छोड़ गई. ऐसा लगा मानों मैंने साक्षात भगवान को देख लिया.

उनसे मेरी कोई पारस्परिक वार्ता नहीं हुई, लेकिन उन्हें देखकर जो अनुभूति हुई उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता.

1996 में मैं जब दिल्ली में पढ़ता था तो दूसरी बार उनसे मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ. लेकिन इस बार भी उनके साथ मेरी कोई बातचीत नहीं हुई.

पहली बार उनसे मेरी पारस्परिक बातचीत तब हुई जब मैं सांसद बना. 2005 में तिब्बत पर विश्व सांसद सम्मेलन के लिए मैंंने एडिनबर्ग में संसदीय प्रतिनिधि मंडल की अगुवाई की.

2007-2008 में मैंने एक बार फिर धर्मशाला जाने वाली सांसद प्रतिनिधिमंडल की अगुवाई की. फिर 2007 में उनके जन्मदिन पर भारतीय सांसदों से उनकी मुलाकात में मैं भी शामिल था. और फिर पिछले साल मुझे अब तक का सबसे कीमती तोहफा गुरुजी से मिला.

महज़ 3 महीनों के अंतराल में मैंने अपने दोनों भाइयों को खो दिया था. ऐसे मुश्किल समय में उन्होंने मुझे एक ऐसा संदेश दिया जो मेरे लिए अनमोल है.

एक श्रद्धालु के लिए उनसे निजी तौर पर कुछ पाने से बढ़कर कोई आशीर्वाद नहीं हो सकता.

मैं उनका स्वागत करने के लिए अरुणाचल जा रहा हूं एक मंत्री के तौर पर नहीं बल्कि इसलिए क्योंकि मैं एक अरुणाचली हूं. उस राज्य का बेटा होने के नाते ये मेरा कर्तव्य है.

अगर मैं नहीं जाता हूं तो लोग मुझसे उम्मीद के अनुरूप काम नहीं करने से नाराज़ हो जाएंगे.

मुझे इस बात का इल्म है कि चीन ने दलाई लामा की यात्रा का विरोध किया है लेकिन उनकी यात्रा को केवल धार्मिक यात्रा के तौर पर देखना चाहिए.

वो बौध धर्मियों के आध्यात्मिक और धार्मिक गुरु हैं. अरुणाचल में उनके साक्षात दर्शन के लिए लोग इतने आतुर हैं कि राज्य सरकार ने समय-समय पर उनसे जनता के समक्ष आने का आग्रह किया.

उन्हें अब जाकर समय मिला है. छठे दलाई लामा तवांग से हैं जिससे उनकी यात्रा और महत्वपूर्ण हो जाती है. तिब्बत से पलायन के बाद वो तवांग के मठ में ही रहे थे.

ये जगह उनके दिल के बेहद करीब है. और वो अरुणाचल के लोगों के लिए बेहद ख़ास हैं. दलाई लामा उम्रदराज हो रहे हैं.

ज्यादातर लोगों के लिए उनसे मिलने, उनसे आशीर्वाद प्राप्त करने और ज्ञान पाने का आखिरी मौका हो सकता है. हम क्यों उन लोगों को इस मौके से वंचित रखें?

अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न अंग है, ये विवादित नहीं है, जैसा कुछ लोग कहते हैं. हां, मैक मोहन रेखा को लेकर कुछ दिक्कतें हैं, लेकिन ये राज्य उतना ही भारत का हिस्सा है जितना कि उत्तर प्रदेश, बिहार या बंगाल.

कैसे सरकार किसी धार्मिक नेता के भारत में आवाजाही पर रोक लगा सकती है? दलाई लामा की यात्रा हमेशा ही धार्मिक है. चीन उन्हें राजनीतिक व्यक्ति के तौर पर दर्शाने की कोशिश कर रहा है.

चीन उन्हें चरमपंथी मानता है लेकिन हमारे लिए वो हमारे धार्मिक नेता हैं.

2009 में जब उन्होंने अरुणाचल प्रदेश का दौरा किया तो चीन ने मुद्दे को काफी उछाला था. लेकिन तब भी मैंने कहा था कि ये दौरा पूरी तरह से धार्मिक है और इसे राजनीतिक दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए.

मैं 2009 में सरकार का हिस्सा नहीं था, मैं एक सांसद भी नहीं था फिर भी मेरी राय वही थी. इस यात्रा को राजनीति का रंग ना दें.

आपको खुद उस भीड़ को देखना चाहिए जिससे आप एहसास कर पाएं कि लोगों की उनके लिए इज्जत और भावनाएं किस प्रकार जुड़ी हुई हैं.

खराब मौसम के कारण उनकी यात्रा में बदलाव किया गया है. अब वो सड़क के रास्ते बोमडिला से दिरांग और फिर इटानगर जाएंगे.

लोग सड़कों पर उमड़ पड़ेंगे, उनके काफिले को रुकना पड़ सकता है. नफ्रा स्थित मेरे गांव गोंपा को प्रतिष्ठित करने का भी कार्यक्रम है.

लेकिन वो भी नहीं हो पाएगा अगर समय का अभाव रहा. अहम बात ये है कि दलाई लामा अरुणाचल प्रदेश का दौरा कर रहे हैं वहां के लोगों के प्रेम और स्नेह के कारण.

किरण रिजिजू

न्यूज 18 से साभार

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