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केरल: रामायण के महीने में RSS से महाभारत करने की तैयारी में CPM

वामपंथियों की दलील थी कि वे ऐसा करके दरअसल एक धर्मनिरपेक्ष अभियान शुरू कर रहे हैं, जिसका काम संघ परिवार द्वारा बच्चों के मन में फैलाई जा रही साम्प्रदायिकता का विरोध करना है.

Updated On: Jul 12, 2018 10:07 PM IST

TK Devasia

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केरल: रामायण के महीने में RSS से महाभारत करने की तैयारी में CPM
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केरल में 2015 में कृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर जब सीपीएम ने बच्चों का एक सांस्कृतिक जुलूस निकाला, तो लोगों ने सोचा कि अब सीपीएम नई पीढ़ी के मन में पुनर्जागरण की भावना धीरे-धीरे भरने की योजना में भी लग गई है. लेकिन जब पार्टी हर साल इसका आयोजन करने लगी, वो भी उसी दिन जब आरएसएस की ओर से बच्चों की संस्था बालगोकुलम की शोभायात्रा निकाली जाती थी, तो मकसद साफ हो गया.

वामपंथियों की दलील थी कि वे ऐसा करके दरअसल एक धर्मनिरपेक्ष अभियान शुरू कर रहे हैं, जिसका काम संघ परिवार द्वारा बच्चों के मन में फैलाई जा रही साम्प्रदायिकता का विरोध करना है. जो भी हो, सीपीएम का 'रामायण मास' मनाने का हाल ही में लिया गया फैसला उनके बहानों की पोल खोल देता है. कृष्ण जन्माष्टमी तो सीपीएम की ओर से मनाई गई थी, लेकिन 'रामायण मासम' यानी रामायण के महीने के आयोजन में सीधे पार्टी का हाथ नहीं है. वामपंथी सांस्कृतिक संस्था 'संस्कृत संघम' ने इसकी जिम्मेदारी उठाई है.

हालांकि पार्टी के राज्य सचिव कोडिवेरी बालकृष्णन ने ऐसे किसी आयोजन में पार्टी का हाथ होने से साफ इंकार कर दिया. उनकी दलील है कि 'संस्कृत संघम', संस्कृत पढ़ने और पढ़ाने वालों की एक स्वतंत्र संस्था है और पार्टी से इसका कोई रिश्ता नहीं है. बालकृष्णन ने बताया, 'लेकिन सच ये है कि 'रामायण मासम' का आयोजन संस्कृत संघम कर ही नहीं रहा है, जैसा मीडिया की ओर से दावा किया जा रहा था. दरअसल ये आयोजन उस अभियान का हिस्सा है, जिसके तहत सांप्रदायिकता के रंग में रंगने और इसका राजनैतिक फायदा उठाने की संघ परिवार की कोशिशों को बेपर्दा किया जाना है.'

CPM के सहयोग की वजह से हो रहा रामायण मास का आयोजन

हालांकि सीपीएम के नजदीकी सूत्रों का दावा है कि रामायण मास का आयोजन पार्टी के ही सहयोग से किया जा रहा है. सीपीएम की राज्य की कमेटी के सदस्य वी सिवदासन को इस पूरे कार्यक्रम को अपने नेतृत्व में कराने के आदेश भी दिए गए हैं. 2015 में कृष्ण जयंती समारोह के आयोजन को लेकर जब बवाल हुआ था, तब भी पार्टी ने यही रणनीति अपनाई थी. हालांकि बाद के सालों में भी पार्टी की ओर से ये आयोजन होता रहा.

पिछले कुछ दिनों से सीपीएम नेताओं की ओर से रामायण की जम कर तारीफ की जा रही है. मंदिर मामलों के मंत्री कदाकमपल्ली सुरेंद्रन ने कहा कि रामायण दरअसल सच्चा पारिवारिक जीवन जीने की प्रेरणा देता है, तो पीडब्ल्यूडी मंत्री जी सुधाकरन ने इसे 'राजनीति का पथप्रदर्शक' बता दिया. उन्होंने कहा, 'रामायण जीवन जीना सिखाता है. पारिवारिक रिश्ते, उनमें आने वाली दिक्कतें, मातृ सदृश प्रेम, पिता के प्रति बच्चों का उत्तरदायित्व, भाई-बहन का प्रेम और महिला सशक्तिकरण के बारे में विशद वर्णन इस महाकाव्य में मिलता है. रामायण को अगर हम पूरे भक्तिभाव से पढ़ें तो हम जिंदगी की वास्तविकताओं की तीव्रता का अनुभव कर सकेंगे.'

उन्होंने आगे कहा, 'रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों में राजनीति और राजनैतिक दूरदर्शिता भरी पड़ी हैं. ये महाकाव्य हमें उन दुर्लभ राज नीतियों के बारे में सिखाते हैं जिनका उस वक्त खूब इस्तेमाल हुआ. आज हम राजनीति में जिन तरीकों का इस्तेमाल करते हैं, वे उनके सामने कहीं नहीं ठहरतीं. आज के राजनेताओं को उस वक्त की राजनीति से सीखना चाहिए.'

बहरहाल, संस्कृत संघम ने 17 जुलाई से शुरू होने वाले 'रामायण मास' के लिए पूरे महीने के कार्यक्रम की तैयारी कर रखी है. इसके तहत रामायण से जुड़ी कक्षाएं चलाने के अलावा सेमिनार, बहस-मुबाहिसे और दूसरे समारोह, गांव से लेकर राज्य स्तर तक आयोजित किए जाएंगे. राज्य स्तरीय सम्मेलन 25 जुलाई को होना तय है.

पहले सीपीएम मारती थी ताने, अब महाकाव्य में दिखने लगे गुण

Manjul-toon CPM 

सीपीएम का 'रामायण मासम' मनाना, दरअसल अपनी नीतियां दरकिनार कर देश की संस्कृति को प्रश्रय देना है, जो निस्संदेह प्रशंसनीय है. बीजेपी प्रवक्ता ने कहा, 'जब हम देश की सांस्कृतिक और पारंपरिक विरासत की बात करते थे, सीपीएम नेता हमें सांप्रदायिक कह कर हमें खूब ताने मारते थे, हमारी हंसी उड़ाते थे. ये बड़ी खुशी की बात है कि देर से ही सही, सीपीएम नेताओं को हमारे महाकाव्यों में कुछ गुण दिखने लगे हैं.'

बीजेपी प्रवक्ता ने कहा, 'बीते कई सालों से सीपीएम के नेता हिंदू देवी-देवताओं का अपमान और धार्मिक अनुष्ठानों का विरोध करते आ रहे हैं, उन्हें इसके लिए अब देश से माफी मांगनी चाहिए. रामायण का महीना मनाना दरअसल सीपीएम का राजनैतिक हथकंडा है जिसे वे बहुसंख्यक हिंदुओं को खुश कर केरल की राजनीति में बने रहने के लिए जरूरी मानते हैं. चूंकि सीपीएम के नेता ईसाई-मुस्लिम वोट बैंक को रिझाने में नाकाम हो रहे हैं, इसलिए बहुसंख्यक हिंदुओं को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं. हालांकि हिंदू उनके झांसे में आने वाले नहीं हैं.'

राजनीतिक पंडितों का मानना है कि दरअसल सीपीएम के कार्यकर्ताओं के लगातार आरएसएस में शामिल होने से पार्टी डरी हुई है और 'रामायण मासम' या कृष्ण जन्माष्टमी मना कर वे हिंदुओं के बीच अपनी पैठ बनाने की कोशिश कर रहे हैं. शायद कार्यकर्ताओं का पलायन इससे रुके और बहुसंख्यकों के बीच अपनी छवि भी सुधरे. आरएसएस की ओर जाने से रोकने के लिए सीपीएम ने बाहुबल का सहारा भी लिया है. लेकिन संघ का कहना है कि इससे उसकी ओर आने वाले सीपीएम काडरों की संख्या और बढ़ी ही है.

पिछले महीने संघ के एक सम्मेलन में जारी की गई जानकारी के मुताबिक पिछले साल केरल में आरएसएस ने 300 नई शाखाएं खोलीं. अब कुल मिलाकर पूरे केरल में संघ की करीब 5300 शाखाएं चल रही हैं. आरएसएस की इतनी शाखाएं देश के किसी भी सूबे में नहीं हैं. संघ बहुत चुपचाप हिंदुओं के मंदिरों और उनके त्योहारों के रास्ते हिंदुओं में अपनी पैठ बढ़ाता जा रहा है. संघ की कोशिश ये भी है कि केरल के हिंदुओं को देश भर के हिंदुओं से जोड़ कर रखा जाए. कोशिश है कि केरल में धीरे-धीरे वे त्योहार भी मनाए जाएं, जो यहां पहले कभी नहीं मनाए जाते थे-जैसे गणेश चतुर्थी और रक्षाबंधन. इससे केरल के हिंदुओं का जुड़ाव देश भर के हिंदुओं से होगा.

पहले सीपीएम कार्यकर्ताओं को नहीं थी मंदिर जाने की इजाजत

सीपीएम ने 2009 में रेक्टिफिकेशन डॉक्यूमेंट जारी कर धार्मिक मामलों में दखल देना शुरू किया था. इस दस्तावेज से उन्होंने अपने काडर को इस बात की इजाजत दी थी कि पार्टी के सदस्य रहते हुए वे किसी भी धर्म के रीति-रिवाजों और धार्मिक कृत्यों का पालन कर सकते हैं. तब तक सीपीएम के कार्यकर्ताओं को इस बात की इजाजत नहीं थी कि वे मंदिर जाएं और झार्मिक रीति-रिवाज़ों में हिस्सा लें.

इस छूट का फायदा उठाते हुए पार्टी कार्यकर्ताओं ने कई मंदिर समितियों पर अपना कब्जा जमा लिया और मंदिर के त्योहारों और अनुष्ठानों का आयोजन आए दिन करने लगे. 'रामायण मासम' मनाने के फैसले को भी राजनीति के जानकार इस बदलाव का नतीजा मानते हैं. वामपंथ के समर्थक एन एम पियर्सन का मानना है कि सीपीएम ने वही रणनीति अपनाई है, जो आरएसएस ने केरल के हिंदुओं में अपनी पैठ बनाने के लिए अपनाई थी.

पियर्सन का मानना है कि इन सबसे केरल में सिर्फ सांप्रदायिकता बढ़ेगी, 'केरल इस वक्त सांप्रदायिकता में डूबा हुआ है. वामपंथ केरल में इसलिए पला-बढ़ा क्योंकि उन्होंने धर्मनिरपेक्षता के लिए लड़ाई की. अब राज्य में अपनी हैसियत बचाने के लिए उन्होंने धर्म निरपेक्षता को दांव पर लगा दिया है.'

पियर्सन का मानना है कि सीपीएम अब हिंदू देवी-देवताओं का सहारा इसलिए ले रही है, क्योंकि उनके नेता विचारों के मामले में दीवालिया हो गए हैं. सत्ता के लिए पार्टी अपनी खास विचारधारा से ही भटक गई है. उनका मानना है, 'सत्ता में रहने के लिए सीपीएम अब सारी ताकतों के साथ हाथ मिलाने को तैयार हो गया है. अगर ऐसा ही आगे भी बना रहा, तो आने वाले सालों में केरल की राजनीति में सीपीएम का कोई वजूद नहीं रह जाएगा.'

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