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जम्मू कश्मीर में 'अंतिम सांस' गिन रहा है पीडीपी-बीजेपी गठबंधन

साल 2014 में जब से दोनों पार्टियों की सरकार बनी तब से प्रदेश में कोई न कोई विवाद जरूर है

Updated On: Apr 13, 2018 05:24 PM IST

Sameer Yasir

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जम्मू कश्मीर में 'अंतिम सांस' गिन रहा है पीडीपी-बीजेपी गठबंधन

जम्मू-कश्मीर में क्या पीडीपी-बीजेपी गठबंधन के दिन लद गए हैं? यह सवाल राज्य के सियासी पंडितों को सोचने पर मजबूर कर गया है जिन्होंने 2014 में इन दोनों पार्टियों के गठजोड़ को 'अपवित्र रिश्ता' बताया. आज हालत यह है कि दोनों पार्टियों के नेता शायद ही एक-दूसरे के बारे में कुछ बात करना चाहते हैं.

एक वरिष्ठ पीडीपी नेता और जम्मू-कश्मीर विधान परिषद के सदस्य ने फर्स्टपोस्ट से बातचीत में कहा, हम उनके (बीजेपी) धोखे से तंग आ गए हैं. हम उनके झूठ के कारण लोगों को दिए अपने वचन नहीं निभा पा रहे. हम अपने वोटरों को क्या मुंह दिखाएंगे? जहां तक मैं समझ पा रहा हूं, अब वक्त ही बताएगा कि यह गठजोड़ कितना दिन चलेगा.

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विधायक ने कहा, 'ऑपरेशन ऑल आउट' के चलते कश्मीर आज उस हालत में पहुंच गया है जहां लोग अब मौत के लिए फरियाद करते हैं और युवा दहशतगर्दी का दामन थाम रहे हैं. यह सारा कुछ बीजेपी की आक्रामक राजनीति के कारण हुआ है. विधायक ने आगे कहा, कश्मीर में चिंगारी तो लगा दी गई लेकिन यह बुझेगी कब, कोई नहीं जानता.

नहीं चलेगा गठबंधन?

अब तो मुख्यमंत्री के भाई तसादुक मुफ्ती ने भी गठबंधन तोड़ने की बात कर दी है. इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक इंटरव्यू में तसादुक ने कहा, केंद्र सरकार ने कश्मीर को ऐसी हालत में धकेल दिया है जहां अबतक 'इतनी बड़ी हिंसा कभी नहीं हुई'.

तसादुक ने कहा, केंद्र को अपनी ढीठाई छोड़ समस्या समझनी चाहिए. प्रदेश में फैले तनाव को कम कर सियासी प्रक्रिया तेज करनी चाहिए ताकि 'एजेंडा ऑफ अलायंस' के वादे पूरे किए जा सकें. तसादुक ने कहा, अगर केंद्र अपने पुराने एजेंडे पर चलता रहा तो हम अंतिम फैसला यही लेंगे कि लोगों से माफी मांग लेंगे कि हम उनकी आशाओं पर खरे नहीं उतरे.

फोटो रॉयटर से

फोटो रॉयटर से

दूसरी ओर, पीडीपी के प्रवक्ता रफी मीर ने कहा, लोगों के अपने विचार होते हैं और होने भी चाहिए. लोकतंत्र की यही खूबसूरती है. हालांकि बीजेपी-पीडीपी में कई मुद्दों पर मतभेद हैं लेकिन अब दोनों पार्टियां एक साथ आ गई हैं.

जम्मू और कश्मीर में खाई गहराई

साल 2014 में जब से दोनों पार्टियों की सरकार बनी तब से प्रदेश में कोई न कोई विवाद जरूर है. ज्यादातर बीजेपी की ओर से है जिसने उसे अपना रास्ता बदलने की चुनौती पेश की है. जहां दो अलग ध्रुवों के एक साथ आने की उम्मीद बनी थी, अब वहां दोनों पार्टियों में बिखराव की आशंकाएं प्रबल हो गई हैं. हिंदू बहुल जम्मू और मुस्लिम बहुल कश्मीर में खाई दिनोंदिन गहराती जा रही है.

इसका एक कारण यह भी है कि दोनों पार्टियों के बीच जिस शख्स ने मेलजोल कराया, वह अब पीडीपी में नहीं है. बात हसीब द्राबू की हो रही है. ताज्जुब की बात है कि 2014 में जिस सम्मिलित एजेंडे पर चुनाव लड़ा गया, शासन-प्रशासन में आने के बाद उसपर कोई बात नहीं हुई. कई वर्षों तक तो गठबंधन सियासत का प्रयोग चलता रहा जिसका अंत परिणाम काफी बुरा जान पड़ रहा है.

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प्रदेश में जारी सियासी उठापटक पर सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ कश्मीर के डीन और राजनीतिक वैज्ञानिक नूर एम बाबा ने कहा, पीडीपी और बीजेपी के लिए गठबंधन स्वार्थों का गठजोड़ है. अर्थात सत्ता हथियाने की चाबी. आज हालत यह है कि पंचायत चुनाव तक इस डर से नहीं कराए जा रहे कि कहीं बड़े स्तर पर हिंसा न हो जाए. हालिया हिंसा की घटनाएं आग में घी डालने का काम किया है.

हाल की कई घटनाएं जैसे कि जम्मू कश्मीर के विशेष दर्जे पर सवाल उठाना या पीएम डेवलपमेंट पैकेज के तहत दी जाने वाली राशि रोक देना, प्रदेश की जनता के साथ धोखा है जिससे गठबंधन सरकार के नाम पर वोट मांगा गया.

कठुआ मामले से बढ़ी कड़ुवाहट

हाल का कठुआ मामला इसी कड़ी में एक है. जम्मू क्षेत्र में बीजेपी ने सांप्रदायिक हवा चलानी शुरू कर दी है. महबूबा मुफ्ती सरकार में बीजेपी के दो नेता-लाल सिंह और चंद्र प्रकाश गंगा का हिंदू एकता मंच के बैनर तले कठुआ के आरोपियों के पक्ष में निकाली गई रैली में शामिल होना, इस ओर इशारा करता है.

कठुआ मामले में जिस प्रकार से बीजेपी नेता आरोपियों के बचाव में उतर रहे हैं, उसने मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती को सोचने पर मजबूर कर दिया है. हालांकि पार्टी ने फिलहाल चुप्पी साध रखी है और बीजेपी प्रवक्ता सुनील शर्मा दबी जुबान सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं.

शर्मा ने कहा, लोगों का क्राइम ब्रांच से भरोसा उठ गया है, हमारी पार्टी किसी आरोपी का बचाव नहीं कर रही. हमलोग इस मामले में सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं. बीजेपी प्रवक्ता ने आगे कहा, बीजेपी हमेशा पारदर्शी जांच की मांग करती रहेगी, वह भले जहां से आए.

एक वरिष्ठ पीडीपी नेता ने नाम न बताने की शर्त पर फर्स्टपोस्ट से कहा, 2014 में द्राबू और राममाधव के बीच जिस 'एजेंडा ऑफ अलायंस' की बात हुई थी, उसे लागू न करने के कारण दोनों पार्टियों में भतभेद गहराते जा रहे हैं.

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