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सरकार बनाने के बाद कांग्रेस-JDS की सरकार के सामने होंगी ये 10 बड़ी चुनौतियां

जानिए उन 10 चुनौतियों के बारे में, जिनका सामना स्वामी और उनके दोस्तों को कर्नाटक में सरकार चलाने के दौरान छोटी अवधि में करना पड़ेगा

T S Sudhir Updated On: May 22, 2018 10:17 AM IST

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सरकार बनाने के बाद कांग्रेस-JDS की सरकार के सामने होंगी ये 10 बड़ी चुनौतियां

हनीमून पीरियड आमतौर पर जश्न और मौज-मस्ती का वक्त होता है, लेकिन एच. डी. कुमारस्वामी अब भी नंबरों के गुलाम हैं. कांग्रेस और जेडी(एस) के विधायक अभी भी रिजॉर्ट और होटलों में 'बंद' है और वफादारी को लेकर हर पल बदलते मिजाज की आशंका के कारण इन विधायकों के प्रबंधक किसी भी तरह का जोखिम लेना नहीं चाहते.

हालांकि, कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में शपथ लेने वाली राज्य की नई सरकार के लिए विश्वास मत हासिल करना ही एकमात्र बाधा नहीं है. यहां हम आपको उन 10 चुनौतियों के बारे में बता रहे हैं, जिनका सामना स्वामी और उनके दोस्तों को कर्नाटक में सरकार चलाने के दौरान छोटी अवधि में करना पड़ेगा-

बेंगलुरु में होने वाले दो चुनावः पहली चुनौती अगले दो हफ्ते में उस वक्त आएगी, जब जयनगर और आर. आर. नगर विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव होंगे. दोनों क्षेत्र बेंगलुरु में हैं. कांग्रेस ने साफ कर दिया है कि वह दोनों सीटों पर जीत हासिल करने की हर मुमकिन कोशिश करेगी. इसका मतलब यह है कि जेडी(एस) पर अपने उम्मीदवारों को झुकाने और अपना वोट पार्टनर उम्मीदवारों यानी कांग्रेस के दावेदार को ट्रांसफर करने का दबाव होगा. दरअसल, इन दोनों विधानसभा सीटों पर कांग्रेस-जेडी(एस) गठबंधन को जीत मिलने की सूरत में इस घटनाक्रम की व्याख्या इस तरह की जाएगी कि जनता ने बीजेपी को विधानसभा से बाहर रखने की खातिर अपना समर्थन पेश किया है.

इसी वजह से भारतीय जनता पार्टी इन दोनों आगामी चुनावों को बेहद गंभीरता के साथ ले रही है. यह बात इस तथ्य से भी जाहिर होती है कि कर्नाटक राज्य से ताल्लुक रखने वाले दो केंद्रीय मंत्रियों- अनंत कुमार और सदानंद गौड़ा को भारतीय जनता पार्टी की तरफ से इन दोनों सीटों का चुनाव प्रभारी बनाया गया है. ये दोनों नेता बेंगलुरु की लोकसभा सीटों से ही सांसद हैं. भारतीय जनता पार्टी की तरफ से इस चुनाव में आक्रामक चुनाव प्रचार अभियान चलाए जाने का अनुमान है और अगर पार्टी एक या दोनों सीटें जीतने में सफल रहती है, तो निश्चित तौर इससे सत्ताधारी कैंप में कुछ विधायकों का मामला भी उलट-पुलट होगा.

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अवसरवादी होने की धारणाः कुमारस्वामी को इस धारणा या छवि के खिलाफ संघर्ष करना होगा यह (कांग्रेस और जेडी(एस) वाला) अवसरवादी गठबंधन है, जिसे उन्होंने सत्ता हासिल करने की खातिर तैयार किया है. हालांकि, वह आधिकारिक तौर पर पहले ही यह कह चुके हैं कि यह उस तरह की आदर्श स्थिति नहीं है, जिसमें वह मुख्यमंत्री बनना पसंद करते. अगर राज्य सरकार की कैबिनेट में जगह और बाकी अहम पदों के लिए दोनों पार्टियों के बीच सौदेबाजी का विकृत रूप देखने को मिलता है, तो निश्चित तौर पर इससे गठबंधन की छवि को धक्का लगेगा. कुमारस्वामी राज्य में अच्छा शासन सुनिश्चित करते हुए कितने अच्छे तरीके से दबाव से निपटते हैं, उनके लिए यह एक अहम चुनौती की तरह होगी.

कावेरी: कावेरी जल बंटवारे के मामले में तमिलनाडु की तरफ से पहले ही दबाव बढ़ रहा है. अपनी जवानी के दिनों में बेंगलुरुवासी रहे रजनीकांत पहले ही अपनी उस उम्मीद को सार्वजनिक तौर पर घोषित कर चुके हैं कि कर्नाटक की नई सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश को पूरा करेगी. हालांकि, कुमारस्वामी ने राज्य के सूखे पड़े जलाशयों को दिखाने के लिए रजनीकांत को कर्नाटक आने का न्योता दिया है. अगर कुमारस्वामी दूरदर्शी राजनीतिज्ञ होने का नमूना नहीं पेश करते हैं, तो कावेरी की आग एक बार फिर से धधक उठेगी. इस मामले को खतरनाक स्तर पर ले जाने की नीति से दोनों राज्यों को किसी तरह का फायदा नहीं होगा.

कृषि संकटः कर्नाटक में कांग्रेस के शासनकाल में 5 वर्षों के दौरान 35,000 से भी ज्यादा किसानों के खुदकुशी करने की खबर है. जेडी(एस) खुद को किसानों की पार्टी कहती है और देवगौड़ा खुद को किसान समुदाय का नेता बताते हैं. कुमारस्वामी के नेतृत्व वाली कर्नाटक की सरकार से ऐसी कृषि नीति पेश करने की उम्मीद होगी, जो जमीनी स्तर पर खेती और किसानों से जुड़ी दिक्कतों और चुनौतियों का व्यावहारिक समाधान मुहैया कराती हो.

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भ्रष्टाचारः हैदराबाद-कर्नाटक क्षेत्र के जिलों में चुनाव को बल्लारी गैंग को आउटसोर्स करने के भारतीय जनता पार्टी के फैसले से चुनाव प्रचार अभियान के दौरान इस पार्टी के कई समर्थकों का मोहभंग हो गया. कांग्रेस पार्टी शहरों में लोगों के पास गई और उसने भ्रष्टचारी तत्वों को गले लगाने को लेकर भारतीय जनता पार्टी की जमकर आलोचना की. विडंबना यह है कि कांग्रेस पार्टी में भी माइनिंग और रियल एस्टेट सेक्टर के गोरखंधधे में शामिल विधायकों की कमी नहीं है. ऐसे में नई सरकार के भी इन माफियाओं के शिंकजे में होने को लेकर शंकाएं बढ़ गई हैं. ऐसी आशंका उस वक्त और प्रबल हो जाएगी, जब ऐसे कुछ विधायकों को कैबिनेट में जगह मिल जाए.

कर्नाटक चुनाव में पैसे की ताकत का पूरा जलवा दिखा और कई विधानसभा क्षेत्रों में वोटों के लिए पैसे का जमकर खेल खेला गया. इस विधानसभा चुनाव में निर्वाचन आयोग द्वारा जब्त की गई रकम में पिछले चुनाव के मुकाबले 400 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. विश्वास मत हासिल करने और संख्या बल के जुगाड़ के मकसद से भारतीय जनता पार्टी द्वारा पाला बदलने के लिए विधायकों को रिश्वत देने की कथित कोशिशों ने भी कर्नाटक की राजनीति के खराब पक्ष को दिखाया. चूंकि भ्रष्टाचार का मामला अभी पूरी तरह से केंद्र बिंदु बना हुआ है, लिहाजा कुमारस्वामी सरकार से भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्ती से निपटे जाने की उम्मीद है. जाहिर तौर पर यह भी उम्मीद की जाती है कि वह सूटकेस वाली सरकार नहीं चलाने की अनुमति नहीं देंगे.

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लिंगायत लॉबी: दोनों पार्टियों (जेडी(एस) और कांग्रेस) से ताल्लुक रखने वाले लिंगायत समुदाय के 20 विधायक बीजेपी से आक्रामक ऑफरों के बावजूद इस गठबंधन में बने रहने के एवज में जोरदार तरीके से अपना हिस्सा और कीमत मांगेंगे. कुमारस्वामी को इस लॉबी को संतुष्ट करना होगा, नहीं तो उनकी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर इन विधायकों की तलवार हमेशा लटकी रहेगी.

दक्षिण बनाम उत्तर कर्नाटकः जेडी(एस) को दक्षिणी कर्नाटक की पार्टी के तौर पर भी देखा जाता है. कुमारस्वामी की पार्टी की 38 में से 26 सीटें इसी क्षेत्र में हैं. यहां पर खतरा है, क्योंकि सत्ताधारी पार्टी के गढ़ में राज्य सरकार की जरूरत से ज्यादा दिलचस्पी कर्नाटक के बाकी हिस्सों में लोगों और वाटरों के बीच अंसतोष का बीज बो सकती है. राज्य के इन हिस्सों में लोगों को यह भी महसूस हो सकता है कि वे शासन प्रणाली के मैट्रिक्स के दायरे से बाहर हैं.

सिद्धारमैया और देवगौड़ाः सिद्धारमैया की शख्सियत का इस सरकार पर बड़े पैमाने पर असर दिखेगा. हालांकि, जाहिर तौर पर वह इसका हिस्सा नहीं होंगे. कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया अभी कांग्रेस विधायक दल के नेता चुने गए हैं. नए निजाम की सफलता या नाकामी कुमारस्वामी-सिद्धारमैया की केमिस्ट्री या इसकी कमी भी निर्भर करेगी.

इसमें एक और मामला एच. डी. देवगौड़ा का जुड़ सकता है, जो गठबंधन से जुड़े रिमोट कंट्रोल का मामला अपने पास रख सकते हैं. सरकार चलाने में तुनकमिजाज गौड़ा का कितना दखल होगा, यह पहलू भी इस राज्य सरकार के टिकाऊपन को प्रभावित कर सकता है.

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बीजेपी का खतरा भी मुमकिनः गठबंधन के राजनीतिक खतरे से भी इनकार नहीं किया जा सकता. आखिरकार 117 विधायकों के साथ इस सरकार के पास विधानसभा में विधायकों की कुल संख्या के आधे से महज 5 विधायक ज्यादा हैं. अपने जख्म सहला रही भारतीय जनता पार्टी द्वारा गठबंधन के मतभेद का फायदा उठाकर सक्रिय होने की संभावना बन सकती है. जाहिर तौर पर वक्त बीतने के साथ मतभेद उभरकर सामने आएंगे.

भरोसे का संकटः कांग्रेस-जेडी(एस) वोट बैंक में घालमेल होने के साथ ही दोनों पार्टियों के बीच भरोसे के संकट का मामला तय है. खास तौर पर जूनियर पार्टनर में. जेडी(एस) निश्चित तौर पर एक निश्चित समय में अपने क्षेत्र में कांग्रेस द्वारा वोटों की सेंधमारी को लेकर सावधान होगी. साथ ही, जेडी(एस) गठबंधन में कांग्रेस द्वारा वरिष्ठ पार्टनर की भूमिका निभाए जाने संबंधी किसी भी कदम का विरोध करेगी.

कुमारस्वामी पुराने मैसूर रीजन से आते हैं, जो मशहूर लेखक आर. के. नारायणन का घर था. हालांकि, वास्तविक जीवन के इस राजनीतिक 'स्वामी और उनके दोस्तों' में शायद मूल साहित्यिक रचना की तरह भोलापन नहीं है.

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