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हंग असेंबली के मौकों पर मनमानी करने वाले राज्यपालों से भरा है भारतीय राजनीति का इतिहास

राजनीति के हमाम में देश के सभी दल अपनी असलियत बखूबी दिखा चुके और जनता को भी शायद उनसे नैतिकता अथवा सैद्धांतिक राजनीति की कोई उम्मीद नहीं बची है

Anant Mittal Updated On: May 16, 2018 11:03 AM IST

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हंग असेंबली के मौकों पर मनमानी करने वाले राज्यपालों से भरा है भारतीय राजनीति का इतिहास

कर्नाटक में सबसे अधिक सीट जीतकर भी अल्पमत वाली बीजेपी और उसके मुकाबले जेडीएस-कांग्रेस गठबंधन के बहुमत की सरकार बनाने का मामला जैसे राज्यपाल के पाले में खड़ा है, उसने हरियाणा में ऐसी ही स्थिति आने पर चौधरी देवीलाल के हाथों राज्यपाल गणपति देव तपासे की पिटाई की याद करा दी.

1982 में हुआ था देवीलाल-तपासे वाकया

यह 1982 का वाकया है. हरियाणा में 90 सदस्यों की विधानसभा के चुनाव में 35 सीट जीत कर सबसे बड़ा विधायी दल बनी कांग्रेस को तपासे ने भजनलाल के नेतृत्व में सरकार की शपथ दिला दी थी. तपासे ने ऐसा चौधरी देवीलाल के नेतृत्व वाले गठबंधन के 37 सीट जीतने के बाद सरकार बनाने के दावे को नकार कर किया था. चुनाव नतीजे आने पर देवीलाल अपने गठबंधन सहयोगी बीजेपी के नेता डॉ मंगलसेन आदि नेताओं के साथ तपासे के सामने बहुमत वाले गठबंधन के रूप में सरकार बनाने का दावा कांग्रेस से पहले ही कर चुके थे.

उसके बावजूद भजनलाल को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाने की तपासे की हरकत का पता लगते ही तमतमाए देवीलाल सदल बल फिर राजभवन जा धमके. वहां देवीलाल ने जब तपासे की ठुड्डी पकड़ कर उनसे अपने प्रति किए गए कथित अन्याय के बाबत पूछा तो राज्यपाल ने उनका हाथ झटक दिया. इससे भन्नाए देवीलाल ने आव देखा न ताव और झन्नाटेदार झापड़ राज्यपाल तपासे के गाल पर रसीद कर दिया. औसत कदकाठी के तपासे तो सवा छह फुट के हट्टे कट्टे देवीलाल के झापड़ की ताब नहीं ले पाए और दूर जमीन पर जा गिरे.

चौधरी देवीलाल.

चौधरी देवीलाल.

जाहिर है कि राजभवन में इससे अफरा तफरी मच गई तथा देवीलाल और उनके साथियों को राजभवन का दरवाजा दिखा दिया गया. देवीलाल को गुस्सा दरअसल इसलिए आया कि बीजेपी से उनकी पार्टी लोकदल का गठबंधन चुनाव से पहले ही हो गया था. उसके तहत ही दोनों दल मिलकर, आपस में सीटें बांटकर चुनाव लड़े थे और सत्तारूढ़ कांग्रेस से अधिक सीट जीत गए थे. देवीलाल ने बहुमत का दावा बीजेपी के साथ ही साथ जगजीवन राम कांग्रेस के विधायकों और कुछ निर्दल विधायकों के समर्थन के बूते किया था. अपने समर्थक विधायकों की परेड भी उन्होंने तपासे के सामने कराई थी.

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इसलिए थी खुन्नस

यह बात दीगर है कि भजनलाल ने उन्हीं के खेमे से कुछ विधायकों को पटाकर अपना बहुमत साबित कर दिया था. भजनलाल से देवीलाल की खुन्नस इसलिए थी कि 1980 में उन्हीं की जनता सरकार को तोड़कर वह कांग्रेस के मुख्यमंत्री बन बैठे थे. देवीलाल को पूरे दो साल की मेहनत के बाद सफलता मिली थी लेकिन राज्यपाल ने सत्ता की रेवड़ियां भजनलाल और उनके साथियों को बांट दीं.

देवीलाल के जबरदस्त विरोध के बावजूद भजनलाल ने जोड़-तोड़ करके पूरे पांच साल सत्ता का मजा लूटा. अंतत: 1987 के विधानसभा चुनाव में जनता ने कांग्रेस का सूपड़ा साफ करके देवीलाल को जबरदस्त बहुमत से नवाजा. उन्होंने बीजेपी के साथ मिलकर राज्य में अपनी सरकार बनाई और 1989 में हरियाणा का ताज अपने बेटे ओमप्रकाश चौटाला के सिर पर रखकर खुद वे जनता दल की ओर से उपप्रधानमंत्री बने.

हमारे लोकतांत्रिक इतिहास में भरा पड़ा है ऐसे राज्यपालों का किस्सा

किसी भी दल को बहुमत न मिलने पर अथवा विधायक दल में फूट पड़ने पर राज्यपालों की मनमानी की ऐसी अनेक मिसालों से हमारा लोकतांत्रिक इतिहास भरा पड़ा है. इसकी पहली मिसाल 1959 में केरल में ईएमएस नंबूदिरीपाद के नेतृत्व वाली बहुमत की सरकार को कांग्रेस नीत केंद्र सरकार द्वारा राज्यपाल की सिफारिश पर भंग करने की है. उसके बाद तो 1967 में सात राज्यों की विपक्षी सरकारों फिर 1977 में जनता पार्टी की मोरारजी सरकार द्वारा कांग्रेस की राज्य सरकारों को राज्यपालों को मोहरा बनाकर भंग कराया जाना.

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फिर चुनी हुई जनता पार्टी की राज्य सरकारों को 1980 में कांग्रेस की इंदिरा सरकार द्वारा भंग करके चुनाव में अपनी सरकार बनाने का अंतहीन सिलसिला चला आ रहा है. हां इस बीच जनता पार्टी की एस आर बोम्मई सरकार की बर्खास्तगी के विरूद्ध सुप्रीम कोर्ट् ने जरूर यह निर्देश देकर स्थिति साफ की कि बहुमत साबित करने का एकमात्र मंच विधायी सदन ही है. उसके बावजूद केंद्र में सत्तारूढ़ दल समय-समय पर अपने समर्थक राज्यपालों के जरिए त्रिशंकु विधानसभा चुनी जाने पर राज्यों की सत्ता हथियाने से नहीं चूक रहे.

कांग्रेस ने ही शुरू की थी सत्ता की होड़ में जोड़-तोड़

कांग्रेस द्वारा शुरू की गई सत्ता की इस होड़ का बाकी दल भी बढ़-चढ़कर फायदा उठा रहे हैं. 1990 के दशक में आंध्र प्रदेश में तेलुगु फिल्मों के सुपरस्टार नंदमूरि तारक रामाराव की बहुमत वाली सरकार में तोड़फोड़ करवाकर नांदेला भास्कर राव की सदारत में राज्य सरकार बनाने के कांग्रेसी षड्यंत्र में तत्कालीन राज्यपाल ठाकुर रामलाल ने सक्रिय भूमिका निभाई थी. रामलाल उससे पहले हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे थे और जंगलों की अवैध कटाई में शामिल होने के कारण उनके नाम में 'लकड़ी चोर' जुड़ गया था.

रामाराव दिल की बीमारी का इलाज कराने विदेश गए थे और उनके पीछे से उनकी तेलुगु देशम पार्टी को अपदस्थ किया गया था. वे इलाज करवाकर जब लौटे तो अपने विधायकों की उन्होंने दिल्ली लाकर राष्ट्रपति के सामने परेड करवाई. राष्ट्रपति के दखल से ही वे आंध्र की सत्ता दोबारा हासिल कर पाए थे. यह बात दीगर है कि उनके दोबारा बीमार होने और अपनी परिचारिका लक्ष्मी पार्वती से शादी कर लेने पर उनके दामाद और आंध्र प्रदेश के मौजूदा मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने ही उनसे पार्टी और सत्ता दोनों हथिया ली थीं.

झारखंड और जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस तो गोवा-मणिपुर में बीजेपी की असलियत

कांग्रेस ने कुछ ऐसा ही कौतुक नब्बे के दशक में ही जम्मू-कश्मीर में फारूख अब्दुल्ला को मुख्यमंत्री पद से हटा कर और उनके बहनोई गुलाम मुहम्मद शाह को सत्ता दिलाकर किया था. तब भी फारूख की पार्टी नेशनल कांफ्रेंस में तोड़फोड़ कराई गई थी. प्रदेश के राज्यपाल की मिलीभगत से हुआ यह षडयंत्र भी नाकाम हुआ और फारूख को फिर राज्य की सत्ता सौंपनी पड़ी थी. ऐसा ही कांड इस सदी के पहले दशक में झारखंड में हुआ जब बीजेपी नीत गठबंधन के बहुमत के दावे को नकार कर राज्यपाल सिब्ते रजी ने आदिवासी गुरू जी शिबू सोरेन के नेतृत्व वाले गठबंधन की सरकार बनवा दी थी. उसके खिलाफ बीजेपी ने भी अपने समर्थक विधायकों को दिल्ली लाकर राष्ट्रपति भवन में उनकी परेड कराई और अंतत: राज्य की सत्ता पाने में कामयाब रही.

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पिछले साल गोवा, मणिपुर और मेघालय में भी विधानसभा चुनाव के बाद सबसे बड़े विधायी दल के दावे को नजरअंदाज करके केंद्र में सत्तारूढ़ दल के इशारे पर राजनीतिक जोड़तोड़ से सरकार बनवाने के आरोप इनके राज्यपालों पर लगे हैं. इसी तरह बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के आरजेडी और कांग्रेस से गठबंधन तोड़कर बीजेपी के साथ सरकार बना लेने को भी राजनीतिक अवसरवाद की पराकाष्ठा बताया जा रहा है. उससे पहले तक हरियाणा के आयाराम-गयाराम और फिर भजनलाल को अवसरवादी राजनीति की अव्वल मिसाल बताया जाता था. कुल मिलाकर देखें तो राजनीति के हमाम में देश के सभी दल अपनी असलियत बखूबी दिखा चुके और जनता को भी शायद उनसे नैतिकता अथवा सैद्धांतिक राजनीति की कोई उम्मीद नहीं बची है.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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