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कर्नाटक चुनाव: राहुल का 'गब्बर सिंह' फॉर्मूला घिस चुका है, क्या वो कुछ नया करेंगे?

राहुल गांधी को समझना चाहिए कि उनकी फिल्मी उपमाएं उनके फेवर में काम नहीं कर रही हैं

Updated On: May 04, 2018 02:27 PM IST

Sanjay Singh

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कर्नाटक चुनाव: राहुल का 'गब्बर सिंह' फॉर्मूला घिस चुका है, क्या वो कुछ नया करेंगे?
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सन् 1970 के दशक की ब्लॉकबस्टर फिल्म शोले के निर्माण से जुड़े प्रोड्यूसर, निर्देशक, पटकथा-लेखक और एक्टर सहित तमाम लोगों ने शायद ही कल्पना की होगी कि रिलीज होने के 43 सालों बाद इस फिल्म के खलनायक गब्बरसिंह, जिसे अमजद खान ने अपनी भूमिका में जीवंत कर दिखाया, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल के लिए उत्तर से पश्चिम और पूर्वोत्तर से दक्षिण तक फैले 10 राज्यों यानी यूपी से लेकर कर्नाटक तक एक के बाद एक होने वाले चुनावों में लोगों के सामने अपनी बात गढ़ने और रखने का सहारा साबित होंगे.

शोले फिल्म पूरे देश में सदाबहार हिट फिल्म साबित हुई. फिल्म से जुड़े तमाम लोगों को तुरत-फुरत नाम, इज्जत, शोहरत और दौलत हासिल हुई- इस फिल्म के जरिए अपने करियर में पहली बार खलनायक की भूमिका निभाने वाले अमजद खान तो खैर ‘गब्बर’ के नाम से ही पहचाने जाने लगे. लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि चुनावी हार ने राहुल का कभी पीछा नहीं छोड़ा है और इससे भी ज्यादा खराब बात ये हुई कि नियम के अपवाद की तरह पंजाब में एक दफे जीत हासिल हुई तो उस जीत के श्रेय का सेहरा भी राहुल गांधी नहीं बल्कि कैप्टन अमरिन्दर सिंह के सिर पर बंधा. कर्नाटक में मौजूदा मुख्यमंत्री सिद्धारमैया वैसे ही पेश आ रहे हैं जैसे कि पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह ने किया था. सो अगर जीत हुई तो इसका श्रेय उन्हें जाएगा और अगर हार हुई तो फिर इसका दोष लेने के लिए कोई नहीं होगा.

राहुल को लगता है कि लोग गब्बरसिंह की कहानी पर भरोसा करने लगेंगे

लेकिन लगता है कि उम्र के 48वें पड़ाव पर पहुंच चुके राहुल गांधी ऐसी बातों को दिल से नहीं लगाते. जान पड़ता है कि छुटपन के दिनों में अंग्रेजी की क्लास में पढ़ाई गई ‘राजा और मकड़ी’ की कहानी का नैतिक सबक उन्हें अभी तक याद है. राहुल गांधी अपना मकड़जाल बुनने में लगे हुए हैं, उन्हें भरोसा है कि आगे के किसी वक्त में लोग नरेंद्र मोदी के खिलाफ बनायी जा रही उनकी इस गब्बरसिंह वाली कहानी पर भरोसा करने लगेंगे.

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शोले 1975 में रिलीज हुई, तब राहुल गांधी की उम्र पांच साल की थी. कोई नहीं जानता कि राहुल गांधी ने ये फिल्म कब पहली दफे देखी और कब आखिरी दफे लेकिन एक बात बड़ी जाहिर है कि खौफनाक डकैत गब्बर सिंह के किरदार को लेकर उनका मोह 2017 के साल की शुरुआत से जागा. उस वक्त यूपी में विधानसभा के चुनाव थे और तब से राहुल का यह गब्बर-प्रेम आज तक जारी है.

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राहुल गांधी को नरेंद्र मोदी में डाकू गब्बर सिंह की छवि दिखती है. अगर मोदी गब्बर सिंह है तो फिर राहुल गांधी ठाकुर बलदेव सिंह हुए. अब एक खुलता हुआ सा सवाल यह बचा रहता है कि आखिर उनका जय और वीरू कौन होने जा रहा है.

जरा गौर कीजिए कि कर्नाटक की कल की चुनावी रैली में राहुल गांधी ने क्या कहा, 'शोले फिल्म में डाकू गब्बर सिंह था. आप (मोदी) पहले गब्बर सिंह टैक्स लेकर आए लेकिन इस बार आपने कर्नाटक के चुनाव में गब्बर सिंह की पूरी टीम ही उतार दी है, गब्बर सिंह तो है ही, उसके साथ सांभा है, कालिया है, मतलब पूरा का पूरा गैंग.'

शायद राहुल नहीं जानते कि कर्नाटक के लोगों के मन में गब्बर सिंह और फिल्म शोले की बड़ी प्यारी यादें हैं. फिल्म की शूटिंग (रामगढ़) पूरे ढाई साल तक मैसूर और बंगलुरु के बीच पड़ने वाले पथरीले इलाके रामनगर में हुई थी. रामनगर अब एक जिले में तब्दील हो गया है और सैलानियों की पसंदीदा जगहों में शुमार है. सरकार और कुछ निजी व्यक्तियों की कोशिशों से अब इस जगह के लोग आने वाले सैलानियों के लिए शोले के दृश्य खड़े करने के लिए गब्बर सिंह, ठाकुर, वीरू और जय के किरदार निभाते हैं. यह उनके जीवन का हिस्सा बन चला है और जीविका का साधन भी.

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शाहरूख खान से गब्बर सिंह तक

एक-सवा साल पहले यूपी के चुनावों में राहुल गांधी 2014 के लोकसभा चुनावों से पहले के नरेंद्र मोदी की तुलना दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे के शाहरूख खान से किया करते थे और कहते थे कि लोकसभा के चुनाव जीतने के बाद नरेंद्र मोदी खलनायक गब्बर सिंह में तब्दील हो गए. अब राहुल की बदकिस्मती कहिए कि यूपी, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर के मतदाता नरेंद्र गांधी में शाहरूख खान और गब्बर सिंह की छवि देखने की उनकी बातों के असर में ना आ सके. गुजरात, त्रिपुरा, मेघालय और नगालैंड में भी मतदाताओं पर राहुल की बातों का असर ना हुआ.

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गुजरात में राहुल गांधी ने कहा था कि 'मैंने उसको (जीएसटी) नया नाम दिया है- गब्बर सिंह टैक्स.' राहुल ने अपने ऑफिशियल ट्विटर हैंडल से ट्वीट किया- 'कांग्रेस जीएसटी=जेनुइन सिम्पल टैक्स, मोदी जी जीएसटी=गब्बर सिंह टैक्स =ये कमाई मुझे दे दे.'

लोगों ने ये फिल्मी कहानी सुनी और सुनकर जहां के तहां छोड़ दी. लोग इस बात को वैसे ही भूल गए जैसे टीवी सेट्स से किसी मूवी चैनल को बंद करने या सिनेमाघर से निकलने के बाद भूल जाया करते हैं. आखिर को हुआ यह कि जीत नरेंद्र मोदी की हुई और राहुल गांधी को 'नैतिक जीत' से ही संतोष करना पड़ा.

शायद राहुल गांधी ने फिल्मी कहानी को ज्यादा संजीदगी से ले लिया है, लोग किसी फिल्मी कहानी को इतनी संजीदगी से नहीं लेते. फिल्म की कहानी लिखने वाले सलीम-जावेद तो यही कहेंगे कि शोले को लेकर ज्यादा संजीदा होने की जरुरत नहीं, वे शायद फिल्म में दिखाए जाने वाले उस डिस्क्लेमर की भी याद दिलाएं जिसमें बताया जाता है कि 'यह एक काल्पनिक रचना है. कहानी में आए नाम, किरदार, व्यवसाय, स्थान, घटनाएं, परिवेश और वाकए या तो लेखक की कल्पना की ऊपज हैं या फिर उनका इस्तेमाल काल्पनिक तरीके से किया गया है.'

राहुल गांधी ने अगर डिस्क्लेमर पढ़ा होता तो उन्हें समझ में आ जाता कि पूरे देश में हजारों हजार की तादाद में लोग गब्बर सिंह (मोदीजी) को देखने-सुनने के लिए क्यों जमा होते हैं.

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