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कर्नाटक चुनाव: त्रिशंकु असेंबली के आसार कम, जमीनी हालात कर रहे हैं कमल खिलने का इशारा

इस बात की मजबूत संभावना है कि सारे समीकरण धरे के धरे रह जाएं और मतदाता जाति के परंपरागत समीकरण को किनारे लगाकर किसी एक पार्टी को बहुमत देने वाला जनादेश दें

Ajay Singh Ajay Singh Updated On: May 05, 2018 09:47 AM IST

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कर्नाटक चुनाव: त्रिशंकु असेंबली के आसार कम, जमीनी हालात कर रहे हैं कमल खिलने का इशारा

अगर हम सियासी पंडितों की मानें, तो कर्नाटक के विधानसभा चुनाव का नतीजा त्रिशंकु असेंबली के रूप में आएगा. इस भविष्यवाणी के पीछे ठोस तर्क है. जिसे भी चुनाव के नतीजों की भविष्यवाणी की जरा भी समझ है, उसके लिए ये अनुमान भरोसे के लायक लग रहा है.

अगर आपको इस पर जरा भी शक है, तो तथ्यों पर गौर फरमाएं. चलिए हम कर्नाटक को चार हिस्सों में बांटकर मतदाताओं के बर्ताव की समीक्षा करते हैं. मसलन, उत्तर कर्नाटक, जहां राज्य के कुल 30 में से 14 जिले हैं और 224 में से 104 विधानसभा सीटें हैं, उसे लिंगायत बहुल इलाका माना जाता है. उत्तर कर्नाटक को बीजेपी का मजबूत गढ़ कहा जाता है. इस इलाके की कई सीटों पर लिंगायतों की आबादी काफी ज्यादा है. इसी वजह से ये इलाका बीजेपी का अभेद्य गढ़ लगता है.

वहीं तटीय कर्नाटक, जहां 33 सीटें हैं और लिंगायतों की आबादी कम है, वहां बीजेपी और कांग्रेस के बीच कड़ा मुकाबला दिखता है. बेंगलुरु, जो राज्य का कॉस्मोपॉलिटन शहर माना जाता है, वहां पर 28 सीटें हैं. इनमें से 18 शहरी विधानसभा क्षेत्र हैं. यहां पर गैर कन्नड़ मतदाता ज्यादा तादाद में हैं. इसी वजह से इसे हिंदुत्व का गढ़ कहा जाता है. वहीं मैसूर इलाके में 59 सीटें हैं. यहां पर कर्नाटक के दूसरे मजबूत सियासी समुदाय वोक्कालिगा की संख्या काफी है. वोक्कालिगा समुदाय आम तौर पर जनता दल सेक्यूलर के साथ खड़ा होता आया है. इसकी वजह हैं पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवेगौड़ा और उनके बेटे एच डी कुमारस्वामी. हालांकि कांग्रेस और बीजेपी में भी कई कद्दावर वोक्कालिगा नेता हैं.

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साफ है कि चुनाव के नतीजों का आकलन जातियों के पिछले वोटिंग पैटर्न के आधार पर किया जा रहा है. जो समुदाय पिछले लंबे वक्त से लगातार एक पार्टी को वोट दे रहे हैं, उसी स्टीरियोटाइप को आधार बनाकर, सियासी पंडित इस बार के चुनाव के नतीजों का अनुमान लगा रहे हैं. जबकि ऐसे अनुमान कई बार गलत साबित हो चुके है. लेकिन इसी तरीके से चुनाव की पेचीदगियों को आसान तरीके से पेश किया जाता रहा है. इसका ये नतीजा होता है कि मामला और भी पेचीदा हो जाता है.

क्या मतदाता ठीक उसी तरह सोचता है, जिस पेचीदगी से हम उसके बर्ताव की समीक्षा करते हैं? हकीकत ये है कि भले ही इस चुनाव के नतीजों को लेकर सियासी समीक्षक जो भी अनुमान लगा रहे हों, नतीजे उतने पेचीदा नहीं होंगे. ऐसा लग रहा है कि इस बार वोटर किसी एक दल को बहुमत देंगे. ये ऐसा नतीजा होगा, जो देशव्यापी ट्रेंड के हिसाब से ही होगा.

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इस चुनाव में किसी एक दल को बहुमत मिलेगा, इस अनुमान की वजह तलाशने के लिए ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है. सिद्धारमैया पिछले पांच साल से राज्य के मुख्यमंत्री हैं. सिद्धारमैया को ध्रुवीकरण करने वाला नेता माना जाता है. वो वोटरों के बीच बहुत जज्बाती माहौल बनाते रहे हैं. अपनी जाति कुरुबा के बीच, जिसकी संख्या करीब 9 फीसद है, सिद्धारमैया की बेहद मजबूत पकड़ है. लेकिन इस वजह से वो दूसरी अहम जातियों से दूर हो जाते हैं.

सबसे अहम बात है सिद्धारमैया की सियासी पृष्ठभूमि समाजवादी है, जो अक्सर कांग्रेस की परंपरागत राजनीति से टकराव पैदा करती है. जैसे कि नीतीश कुमार की तरह सिद्धारमैया ने कन्नड़ गौरव के जज्बात को बढ़ावा देने की कोशिश की. सिद्धारमैया इस चुनाव को बाहरवाले बनाम घरेलू का मुकाबला बनाना चाहते थे.

सिद्धारमैया की मोदी-अमित शाह को बाहरी साबित करने की कोशिश तब नाकाम हो गई, जब वो खुद राहुल गांधी के साथ चुनाव मैदान में प्रचार करने उतरे. साफ है कि सिद्धारमैया की कांग्रेस को क्षेत्रीय ताकत बनाने की कोशिश कामयाब नहीं हो सकी. सिद्धारमैया ने ओबीसी, दलित और अल्पसंख्यकों को मिलाकर इंद्रधनुषी वोटबैंक बनाने की कोशिश की. इसे अहिंदा यानी अल्पसंख्यतरु, हिंदुलिदावारु और दलितारु का नाम दिया गया. लेकिन ऐसे प्रयोग किताबी तौर पर तो बहुत आकर्षक लगते हैं. ये जमीनी तौर पर उतने कामयाब नहीं होते. एंटी-इन्कंबेंसी की वजह से सिद्धारमैया की सियासी चुनौती और बढ़ गई है. खास तौर से उन मौजूदा विधायकों की वजह से जो दोबारा उम्मीदवार बनाए गए हैं.

हालांकि तीन महीने पहले जहां एंटी-इन्कंबेंसी साफ तौर पर मजबूत दिख रही थी, वहीं आज चुनाव प्रचार के शोर में वो इतनी मजबूत नहीं दिखती. आज चुनाव प्रचार में जाति, समुदाय और कन्नड़ गौरव जैसे मुद्दे हावी हो गए हैं. सिद्धारमैया एक चतुर चुनावी प्रचारक हैं. वो मोदी और अमित शाह को बीजेपी के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार येदियुरप्पा के मुकाबले ज्यादा निशाना बना रहे हैं. वजह ये है कि येदियुरप्पा की अपनी जाति लिंगायतों पर मजबूत पकड़ है. कांग्रेस की पूरे कर्नाटक में जमीनी पकड़ रही है. ये बात उसके हक में जा रही है, जबकि उसके सामने कई चुनौतियां भी हैं.

इसके उलट बीजेपी की पैठ बहुत सीमित इलाकों में है. लेकिन पार्टी के पास मजबूत संगठन और ताकतवर चुनावी मशीनरी है. पिछले तीन महीनों में ही बीजेपी ने 5.5 लाख कार्यकर्ताओं का काडर खड़ा कर लिया है, जो राज्य के 55 हजार बूथों की निगरानी करेंगे. इन सभी बूथ कार्यकर्ताओं से कॉल सेंटर के जरिए संपर्क किया जा सकता है, और इन्हें चुटकियों में काम पर लगाया जा सका है. इन सभी को फौरी नोटिस के आधार पर तुरंत एक्टिव होने की ट्रेनिंग दी गई है.

Modi in Karnataka

लेकिन ये सोचना गलत होगा कि ताकतवर सियासी मशीनरी के बूते ही बीजेपी कर्नाटक में चुनाव जीत लेगी. राज्य का बीजेपी नेतृत्व बुरी तरह बंटा हुआ है, ठीक उसी तरह जैसे किसी और पार्टी का हाल होता है. हालांकि बीजेपी ने येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया हुआ है, लेकिन उनके विरोधी टिकट बंटवारे को लेकर उन्हें लगातार किनारे लगाते रहे, ताकि येदियुरप्पा के समर्थकों को टिकट न मिल सके. येदियुरप्पा के बेटे को टिकट देने के बजाय विरोधी खेमे के नेता को टिकट दिए जाने को येदियुरप्पा कैंप बेहद शंका की नजर से देख रहा है, क्योंकि पार्टी के कई सीनियर नेताओं से येदियुरप्पा की ठनी हुई है. हालांकि पिछले कुछ समय से बीजेपी नेतृ्त्व, येदियुरप्पा समर्थकों की आशंकाएं दूर करने में लगा हुआ है और उन्हें राज्य का सबसे बड़ा बीजेपी नेता घोषित किया जा चुका है.

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वहीं जनता दल सेक्यूलर को फिलहाल कांग्रेस और बीजेपी का खेल बिगाड़ने वाली पार्टी के तौर पर देखा जा रहा है. हो सकता है कि जेडी एस वोक्कालिगा और अल्पसंख्यकों (ईसाईयों-मुसलमानों) के अलावा कुछ दूसरी जातियों के वोट हासिल कर ले. ये सभी समुदाय कुल मिलाकर दस फीसद वोट बनते हैं. जिस तरह मोदी ने अपनी पहली रैली में एचडी देवेगौड़ा की जमकर तारीफ की, उससे लगता है कि बीजेपी त्रिशंकु विधानसभा होने की सूरत में जेडी एस से गठजोड़ का विकल्प खुला रखना चाहती है. त्रिशंकु विधानसभा होने की सूरत में सत्ता के लिए जरूरी तुरुप का इक्का कुमारस्वामी के पास होगा.

लेकिन इस बात की मजबूत संभावना है कि ये सारे समीकरण धरे के धरे रह जाएं और मतदाता जाति के परंपरागत समीकरण को किनारे लगाकर किसी एक पार्टी को बहुमत देने वाला जनादेश दें. पिछले पांच सालों में सिद्धारमैया सरकार का खराब कामकाज और कांग्रेस संगठन की कमजोरियों को देखते हुए बीजेपी और इसके नेता येदियुरप्पा के मतदाताओं का दिल जीतने की उम्मीद ज्यादा दिखती है. इसमें हम अगर मोदी की अपनी लोकप्रियता को जोड़ दें, तो तस्वीर सोने पे सुहागा वाली बनती है. हालांकि मतदाता अपने तरीके से चौंकाने वाले जनादेश देते रहे हैं. लेकिन इस बात की संभावना कम ही है कि लोग वैसा जनादेश दें, जिसका अनुमान सियासी पंडित लगा रहे हैं.

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