S M L

कर्नाटक चुनाव: आखिरी दिन का आखिरी संदेश ही चुनावी रणनीति की असली तस्वीर है

नरेंद्र मोदी-अमित शाह के नेतृत्व वाली बीजेपी और राहुल गांधी-सोनिया गांधी की अगुआई वाली कांग्रेस की विचार प्रक्रिया और चुनाव तैयारियों के बीच के अंतर को देखना और समझना महत्वपूर्ण है

Sanjay Singh Updated On: May 11, 2018 11:26 AM IST

0
कर्नाटक चुनाव: आखिरी दिन का आखिरी संदेश ही चुनावी रणनीति की असली तस्वीर है

कर्नाटक चुनाव प्रचार के अंतिम दिन बीजेपी और कांग्रेस, दोनों एक दूसरे पर काफी आक्रामक दिखे. जिस तरह, एक तरफ नरेंद्र मोदी और अमित शाह और दूसरी तरफ राहुल गांधी और सिद्धरम्मैया ने चुनाव प्रचार के अंतिम दिन मतदाताओं के दिमाग पर अपनी आखिरी छाप छोड़ी, वो इन दोनों प्रतिद्वंदी दलों की चुनावी रणनीति की असली तस्वीर दिखाती है,

प्रतिद्वंदी दलों और व्यक्तिगत उम्मीदवारों ने जिस तरीके से चुनावी अभियान के आखिरी दिन अपनी रणनीति को जमीन पर उतारा, वो हमेशा से फ्लोटिंग (अस्थिर) मतदाताओं का दिमाग तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, इस मौके का इस्तेमाल राजनीतिक दल अपने कैडर के नैतिक बल को मजबूती प्रदान करने के लिए भी करते है, ताकि वे मतदाताओं को अपने घरों से मतदान केंद्रों तक लाने के लिए मजबूती से काम कर सकें.

नरेंद्र मोदी-अमित शाह के नेतृत्व वाली बीजेपी और राहुल गांधी-सोनिया गांधी की अगुआई वाली कांग्रेस की विचार प्रक्रिया और चुनाव तैयारियों के बीच के अंतर को देखना और समझना महत्वपूर्ण है. कम से कम जिस तरह से, उन्होंने प्रचार अभियान के आखिरी घंटों में गुरूवार को अपने चुनाव प्रचार कार्यक्रमों की योजना बनाई.

ये भी पढ़ें: कर्नाटक चुनाव: पीएम मोदी पर राहुल गांधी ने इतना फोकस किया कि मुद्दा ही भूल गए

राहुल गांधी ने बेंगलुरु में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित किया. कर्नाटक का लगभग पूरा कांग्रेस नेतृत्व, मुख्यमंत्री सिद्धरम्मैया और लोकसभा में पार्टी के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे राहुल गांधी के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस में बैठे थे. प्रेस कॉन्फ्रेंस का विचार ठीक था. राहुल गांधी इसके जरिए चुनाव प्रचार के आखिरी दिन जनता को एक अंतिम संदेश देना चाहते थे. ऐसा करना उस नेता के लिए और भी अहम हो जाता है, जो शब्दों को वजनदार बनाकर अपने हिसाब से महत्वपूर्ण बातें, मीडिया के जरिए जनता के बीच पेश करना चाहता है.

कर्नाटक में चीन का क्या काम?

विडंबना यह है कि राहुल गांधी ने इस मौके पर पाकिस्तान, रूस और राफेल्स पर अंतहीन बातें कीं. अंत में उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि 'पीएम मोदी द्वारा विदेश नीति पूरी तरह से बर्बाद कर दी गई है.' थोड़ी देर के बाद जब उनसे किसी अन्य मुद्दे पर सवाल पूछा गया, तो कांग्रेस अध्यक्ष एक बार फिर चीन के बारे में बोलने लगे. चीन पर बात करते हुए कहने लगे, 'मैं चीन के मुद्दे को ले कर बहुत भावुक हूं ...' और उन्होंने इसे दो बार दोहराया भी. उन्होंने चीन पर अपनी लंबी बातचीत का निष्कर्ष यह निकाला कि 'ये एक ऐसी आपदा है, जो विदेश नीति की वजह से निर्मित हुई है.'

जब उनसे मोदी की तरफ से उनके लिए 'नामदार' (विरासत) और 'घमंडी' बताए जाने और 15 मिनट तक बिना कागज देखे बोलने की चुनौती दिए जाने के बारे में सवाल पूछा गया तो राहुल गांधी ने खुद को खुद से गौतम बुद्ध की उपमा दे दी. इसी के साथ उन्होंने ये दावा भी किया कि 'मेरे प्रति प्रधानमंत्री मोदी का क्रोध इसलिए है, क्योंकि वह मुझे खतरे के रूप में देखते हैं.'

राहुल गांधी ने पत्रकारों से हिंदी में सवाल पूछने के लिए भी कहा. हालांकि, खुद उन्होंने इन सवालों के जवाब हिंदी में दिए, लेकिन ये नहीं बताया कि हिंदी और अंग्रेजी के सवाल अलग-अलग कैसे थे. एक उदाहरण देखिए. जब एक टेलीविजन संवाददाता ने उनसे पूछा, 'क्या आपको लगता है कि राफेल कर्नाटक चुनाव में एक बड़ा मुद्दा था?' राहुल ने यह कहते हुए जवाब दिया कि पत्रकार ने 'सवाल बदल दिया' और फिर इसके बाद उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ पहले से ही लगाते रहे आरोपों की दोबारा बरसात करनी शुरु कर दी.

ये भी पढ़ें: इंदिरा और सोनिया की तरह क्या निंदा मंथन से सत्ता का अमृत निकाल पाएंगे राहुल?

इस बात से किसी को भी आश्चर्य हो सकता है कि कर्नाटक के आम मतदाताओं को चीन के मुद्दे बताकर राहुल गांधी क्या जताना चाहते थे. चीन को लेकर राहुल गांधी क्या सोचते हैं, इससे कर्नाटक के सामान्य लोगों को क्या लेना-देना है. सवाल यह है कि क्या जनता विदेश नीति मामलों पर उनकी जानकारी और खुद को बुद्ध की उपमा दिए जाने से प्रभावित होगी?

आधे दिन की आधी लड़ाई

इसके उलट, गुरुवार की सुबह मोदी ने तकनीक का इस्तेमाल किया. उन्होंने नमो ऐप के जरिए कर्नाटक भर के अपने एससी/एसटी/ओबीसी और स्लम मोर्चा कार्यकर्ताओं के साथ संबंध स्थापित किया. प्रधानमंत्री मोदी ने कार्यकर्ताओं को सिर्फ यह बताने पर फोकस किया कि बीजेपी ने इन समुदायों के लिए कितना काम किया है और क्यों 12 मई को इन समुदायों के अधिक से अधिक लोगों को बीजेपी के पक्ष में वोट देना चाहिए.

ज्यादातर जन भावना दलितों, अनुसूचित जनजातियों और ओबीसी के आसपास उभरी थी. इसलिए, मोदी ने इन समुदायों से आने वाले अपने कार्यकर्ताओं को संबोधित कर, मतदान से पहले उनके मनोबल को बढ़ाना उचित समझा होगा.

अमित शाह की योजनाएं अलग थी. उन्होंने बादामी में मेगा रोड शो किया. इस चुनाव में ये अभी तक का किसी भी पार्टी द्वारा आयोजित सबसे बड़ा रोड शो था. बादामी उन दो निर्वाचन क्षेत्रों में से एक हैं, जहां से मुख्यमंत्री सिद्धरम्मैया चुनाव लड़ रहे हैं. उनके खिलाफ बीजेपी के श्रीरामुलू है. वे एक दलित नेता हैं और रेड्डी भाइयों के करीबी माने जाते हैं. श्रीरामुलू बेल्लारी से लोकसभा सांसद है. अमित शाह के रोड शो के दृश्य काफी प्रभावशाली हो सकते हैं. अमित शाह के एक तरफ श्रीरामुलू और दूसरी तरफ बीजेपी के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार येदियुरप्पा थे. उस मेगा रोड शो ने ये छाप छोड़ी कि सिद्धरम्मैया के लिए मैदान कठिन है. यदि बीजेपी इस संदेश को कर्नाटक के बाकी हिस्सों में फैला पाई तो उसके लिए ये आधी लड़ाई जीतने जैसी है.

ये भी पढ़ें: राहुल गांधी के पीएम वाले बयान पर बवाल मचाने से पहले तर्क भी तो देखिए

बाद में राहुल गांधी बाहर निकलकर जनता के बीच भी गए और अमित शाह ने भी दिन के दूसरे हिस्से में प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कीं. लेकिन दिन के पहले हिस्से की घटनाओं से यही संदेश निकला कि बीजेपी की चुनाव प्रचार मशीनरी कहीं अधिक व्यवस्थित है और रणनीति के मामले में बेहतर तैयार की गई थी. कांग्रेस को यही उम्मीद होगी कि उसकी अंकगणितीय गणना सही निकले.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
Social Media Star में इस बार Rajkumar Rao और Bhuvan Bam

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi