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क्या देश की मौजूदा राजनीति को बदल देगा कर्नाटक चुनाव?

ये तय है कि 2018 और 2019 के चुनावों में कुछ बेहद ही दिलचस्प और कांटे की टक्कर वाले चुनाव हमें देखने को मिलेंगे

Updated On: May 02, 2018 09:52 AM IST

Sandipan Sharma Sandipan Sharma

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क्या देश की मौजूदा राजनीति को बदल देगा कर्नाटक चुनाव?
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कर्नाटक का चुनाव हमारे देश की राजनीति का वो मोड़ या बिंदु बनता जा रहा है जहां से एक नए परिवर्तन की शुरूआत होती है. परिवर्तन की ये प्रक्रिया साल 2013 में ही शुरू हो चुकी थी. ये वो बिंदु है जहां पर दोबारा उठ खड़े होने की कोशिश करने वाली कांग्रेस पार्टी और जिद्दी व उद्दंड बन चुकी, किसी की भी बात को न सुनने वाली बीजेपी का एक मोड़ पर मिलान हो रहा है. ये वो मोड़ है जहां के बाद कुछ भी संभव है- मसलन 2019 में सत्तासीन पार्टी की आसान जीत के बजाय दोनों विपक्षी पार्टियों के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा.

मौजूदा हालात में ये भी कहना बेमानी होगा कि कांग्रेस पार्टी ने दोबारा धमाकेदार वापसी कर ली है या बीजेपी पूरी तरह से चूक कई. ऐसा कहना बेवकूफी ही होगी. लेकिन कर्नाटक के चुनाव में जिस तरह शोर मच रहा है उससे ये तो तय है कि भारतीय राजनीति का अगला कुछ दौर बराबरी की टक्कर वाला होगा.

कांग्रेस को भी अंदाजा नहीं रहा होगा

कांग्रेस पार्टी के लिए कर्नाटक चुनाव पूरी तरह से एक नया अनुभव साबित हो रहा है, ये वहां के ज़मीनी हालात और चुनाव पूर्व विश्लेषण से भी साफ साबित हो रहा है. कुछ महीनों पहले तक ये मान पाना भी मुश्किल था कि कांग्रेस कर्नाटक में बीजेपी के खिलाफ़ खड़े होने का माद्दा भी रखती है, खासकर सीधी लड़ाई में. ये सोच पाना कि सत्तासीन कांग्रेस पार्टी बीजेपी को किसी भी तरह की चुनौती दे पाएगी, सपने देखने जैसा था क्योंकि 2013 के बाद के हर चुनाव में उसे हार का सामना करना पड़ा है, और कर्नाटक जैसे राज्य में तो बिल्कुल भी नहीं जहां कांग्रेस पार्टी ने विपक्ष की भूमिका निभाने के लिए खुद को पहले से ही तैयार कर लिया था.

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लगभग हर ओपिनियन पोल में ये कहा गया कि कर्नाटक में दोनों पार्टियों के बीच कांटे की टक्कर है. जानकारों के मुताबिक दोनों पार्टियों के बीच बस कुछ ही सीटों का अंतर है. 224 सदस्यों वाली विधानसभा में जनता दल (एस) 30 सीटों के साथ किंगमेकर की भूमिका निभा सकता है और अब जबकि पीएम मोदी भी बीजेपी की तरफ से मैदान में कूद गए हैं और राज्य में पांच दिनों तक धुंआधार प्रचार करने वाले हैं, ऐसे में काफी कुछ बदल भी सकता है, लेकिन फिर भी इस समय किसी भी तरह की भविष्यवाणी करना मुश्किल होगा.

पीएम की रैली के साथ चीजें बदल सकती हैं

पीएम मोदी मंगलवार से कर्नाटक में अपने प्रचार की शुरुआत कर चुके हैं, उन्हें इस बात का अंदाज़ा बखूबी है कि राज्य में उनकी पार्टी को किसी तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. शायद यही वो वजह कि उनके कैंपेन में मुख्य रूप से दो बातों का समावेश है. पहला उनका अपना विकास का मुद्दा और दूसरा कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पर तेज़ हमले करना. ये वही राहुल गांधी हैं जिन्हें पीएम मोदी हाल-फिलहाल तक कोई खास तवज्जो नहीं दिया करते थे. इसके अलावा वे येदुरप्पा और रेड्डी भाईयों पर विपक्षी दलों द्वारा किए जा रहे हमलों का बचाव भी कर रहे हैं या यूं कहें कि उसका जवाब भी दे रहे हैं. ऐसा करते हुए वे सिद्धारमैय्या और कांग्रेस पार्टी के राज में हुए भ्रष्टाचार के मुद्दे उठा रहे हैं.

PM Modi in Udupi

आखिर इन बातों का मतलब क्या है? पहला ये कि बीजेपी के लिए वो लैंपपोस्ट युग खत्म हो गया है जब कोई भी व्यक्ति जो पार्टी के चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़ रहा होता था वो चुनाव जीत जाया करता था, बीजेपी को ये चुनाव जीतने लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है. ये उसके मुख्यमंत्री पद के संभावित उम्मीदवार के तौर पर बीएस येदुरप्पा का चुनाव और दूसरा बेल्लारी सीट से जी सोमशेखर जैसे विवादास्पद व्यक्ति को टिकट देने से ही साफ नज़र आता है. ये दोनों ही चुनाव बीजेपी की मजबूरी और भ्रष्टाचार को लेकर उसके रुख को साफ करने के लिए काफी है. लेकिन जैसा कि येदुरप्पा ने हासन में कहा कि बीजेपी के लिए रेड्डी भाईयों की ज़रूरत इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि वे हैदराबाद और कर्नाटक के इलाके में अकेले 15 के करीब सीटें जीत कर लाने का माद्दा रखते हैं, जहां बीजेपी काफी कमजोर है.

बीजेपी के सामने मजबूरी

ये साफ है कि बीजेपी कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती है और उसके लिए हर एक सीट काफी महत्वपूर्ण है. वो एक सुनहरे भविष्य के लिए अतीत को भुलाने के लिए तैयार है. दो स्थानीय मुद्दे भी यहां एक बार फिर से प्रासंगिक हो गए हैं. मोदी मंत्र अब पहले जैसा काम नहीं कर पा रहा है. अब मोदी के नाम का मंत्र उस तरह से काम नहीं कर रहा है कि लोगों की आखों के सामने की दूसरी सच्चाइयों को दिमाग से पूरी तरह से मिटा दे. फिर चाहे वो जाति हो, स्थानीय या प्रांतीय मुद्दे हों, उम्मीदवार हो या कुछ और- हर वो चीज़ जो मोदी युग से पहले जनता के लिए महत्वपूर्ण थी वो आज फिर से महत्वपूर्ण हो गई है. यही वो कारण है जिसने कांग्रेस पार्टी को रेस में बरकरार रखा है, खासकर- उस घटना के बाद जब से मुख्यमंत्री सिद्दारमैय्या ने कन्नाडिगाओं की अस्मिता का मुद्दा लपककर उसे बीजेपी की राष्ट्रीयता के खिलाफ़ एक भावनात्मक रंग दे दिया है.

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तीसरी बात ये कि कर्नाटक के मतदाताओं को कांग्रेस पार्टी से किसी भी तरह का परहेज़ नहीं है. 2013-14 में जब पूरा भारत मोदी लहर की चपेट में था, तब ऐसा लग रहा था कि वाकई में कांग्रेस मुक्त भारत का सपना पूरा भी हो सकता है. उस समय ऐसा लग रहा था कि जनता कांग्रेस पार्टी और गांधी परिवार के बारे में बात भी करना नहीं चाहती. लेकिन आज अगर कांग्रेस पार्टी कर्नाटक के चुनावी दौड़ में बनी हुई है और राहुल गांधी की सभाओं में बड़ी संख्या में लोग जुट रहे हैं तब ये कहा जा सकता है कि राज्य की जनता के मन में कांग्रेस पार्टी की जगह बनी हुई है, वो कम से कम कांग्रेस को एक विकल्प के तौर पर देख तो रही ही है.

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बदल सकती है आगे की राजनीति

ये सब महत्वपूर्ण प्रवृत्तियां हैं और अगर कर्नाटक चुनाव के नतीजों में इनका योगदान होता है या ये ट्रेंड चुनावी नतीजे में शामिल होते हैं तो इसके दूरगामी परिणाम होंगे. इसका असर अगले कई चुनाव तक देखा जा सकेगा. अगले चरण में राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के चुनाव होने हैं, जहां जातिगत और स्थानीय मुद्दों का हमेशा से चुनाव में बड़ा रोल रहा है. हालांकि, मोदी के आने के बाद वहां भी कई तरह के बदलाव देखे गए थे. इन सभी राज्यों में कांग्रेस पार्टी बीजेपी की मुख्य प्रतिद्वंदी पार्टी के तौर पर उभरी है, उनके नेताओं में सामान्य तौर पर इस बात की खुशी होगी कि चुनावों में उनकी जीत की उम्मीद बढ़ी है और चुनाव की प्रक्रिया एक बार फिर से सामान्य ढर्रे पर पहुंची रही है.

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राजस्थान और मध्यप्रदेश दोनों ही राज्यों में जातीय समीकरणों को अप्रभावी बनाने और सत्ता विरोधी लहर से लड़ने के लिए बीजेपी को मोदी-फैक्टर की ज़रूरत है. 2019 के आम चुनाव में जीत का क्रम जारी रखने के लिए उन्हें इन दो चुनावों में जीत की बहुत ज़रूरत है ताकि वो जीत की गति को धार दे सके. अगर कर्नाटक का ये चुनाव भारत की राजनीति में आने वाले परिवर्तन का वो महत्वपूर्ण मोड़ या बिंदु साबित है तो ये तय है कि 2018 और 2019 के चुनावों में कुछ बेहद ही दिलचस्प और कांटे की टक्कर वाले चुनाव हमें देखने को मिलेंगे.

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