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कर्नाटक : अगर बीजेपी जीती तो आगे लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ देखने के लिए तैयार हो जाइए

कर्नाटक पर नजर जमाए रखिए. भले ही बात एक राज्य की जान पड़ती हो लेकिन इस सूबे में बीजेपी की जीत होती है तो उसके नतीजे व्यापक होंगे

Sandipan Sharma Sandipan Sharma Updated On: May 14, 2018 07:23 PM IST

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कर्नाटक : अगर बीजेपी जीती तो आगे लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ देखने के लिए तैयार हो जाइए

लालच से निपटने का सबसे बेहतर तरीका है कि आप उस लालच के हो जाएं- ऑस्कर वाइल्ड का यह कहा बहुत मशहूर है. और, अगर बीजेपी को ऑस्कर वाइल्ड के विचार पसंद हुए तो फिर बहुत मुमकिन है कि हमें राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और लोकसभा के चुनाव एक साथ होते देखने को मिलें. वजह ये कि ऐसा करने का लालच इतना भारी है कि बीजेपी से ना कहते ना बनेगा.

इन राज्यों के विधानसभा तथा संसद के निचले सदन (लोकसभा) के चुनाव एक साथ कराने के पक्ष में सबसे मजबूत दलील ये है: विपक्ष जिस वक्त गिरी-पड़ी हालत में हो तो उसे ताकत बटोरने का मौका ना देते हुए उसपर सबसे तगड़ी चोट मारनी चाहिए. कांग्रेस अगर कर्नाटक मे हार जाती है तो बीजेपी के लिए कांग्रेस मुक्त भारत बनाने का यह सबसे सुनहरा मौका होगा.

ऐसा कहने के कुछ कारण हैं:

एक तो यह कि कांग्रेस अगर कर्नाटक के चुनाव हार जाती है तो उसके हाथ से इलेक्शन-फंड का एक मजबूत जरिया निकल जाएगा. चूंकि कांग्रेस का शासन सिर्फ पंजाब और पुदुचेरी में ही बचेगा सो इलेक्शन फंड के मामले में कांग्रेस के हाथ एकदम तंग हो जाएंगे. ऐसे में कांग्रेस के लिए बीजेपी से मुकाबला करना बहुत मुश्किल हो जाएगा क्योंकि बीजेपी के पास चुनावी जंग में खर्च करने के लिए खजाना खूब भरा हुआ है.

साल 2013 के बाद से कांग्रेस एक दर्जन से ज्यादा दफे बड़े चुनावी मुकाबलों में उतरी है. ऐसे हर चुनावी दंगल में उसे खूब सारे रुपये खर्च करने पड़े हैं. भारत में पार्टियों का आर्थिक जीवन इस भरोसे चलता आया है कि चुनाव में जितनी रकम खर्च हो रही है, वह सारी रकम पार्टी अगर चुनाव जीत गई तो चंदे, कारपोरेट फंड तथा घूसखोरी के जरिए जुटा लेगी. लेकिन दुर्भाग्य कहिए कांग्रेस का कि उसके लिए चुनाव एक ऐसी गहरी खाई साबित हो रहा है जिसमें रुपए तो खूब ही गर्क हो रहे हैं लेकिन बदले में उधर से निकलकर कुछ हाथ नहीं लग रहा.

राहुल गांधी ने अपने गुजरात चुनाव के बाद के इस तीन दिवसीय गुजरात दौरे की शुरूआत गिर सोमनाथ जिले में स्थित सोमनाथ मंदिर के दर्शनों के साथ की है (फोटो: पीटीआई)

गुजरात विधानसभा चुनाव में चुनाव प्रचार के दौरान राहुल गांधी ( फाइल फोटो: पीटीआई )

यूपी और गुजरात के चुनावों के दौरान ही साफ हो गया था कि पार्टी के पास चुनाव लड़ने के लिए पैसों की कमी पड़ रही है. कई उम्मीदवारों ने शिकायत की थी कि 24 अकबर रोड से चंद चुने हुए लोगों को ही वित्तीय सहायता मिल रही है. बाकी उम्मीदवारों को एक तरह से पार्टी ने छोड़ दिया है कि वे चाहें तो अपने खर्चे पर चुनाव का प्रचार अभियान चलाएं. यूपी और गुजरात के चुनावों के बाद से पार्टी की बैलेंसशीट बिगड़ी नजर आने लगी. अगर रकम जुटाने के स्रोत सूखते जाएं तो पार्टी के लिए बड़े चुनाव लड़ना मुश्किल होता जाएगा. और, बीजेपी को यह बात पता ही होगी कि उसकी मुख्य प्रतिपक्षी पार्टी कांग्रेस के हाथ चुनाव खर्चे के मामले में बहुत तंग चल रहे हैं.

दूसरी वजह ये कि कांग्रेस भले खस्ताहाल हो लेकिन मौजूदा लोकसभा की अवधि पूरी होने तक कुछ चुनावों मे उसके जीत के आसार हैं. मध्यप्रदेश और राजस्थान दोनों ही सूबों में बीजेपी सत्ता में है और उसे सत्ता-विरोधी लहर का सामना करना होगा. राजस्थान में उपचुनावों तथा पंचायत और नगरपालिका के चुनावों के नतीजों के संकेत हैं कि लोग-बाग वसुंधरा राजे की सरकार से नाखुश हैं. बीजेपी को इस बात का भी ध्यान होगा ही कि राजस्थान में 1993 के बाद से कोई भी सरकार दोबारा सत्ता में नहीं लौटी है. 1993 के बाद से हर बार सत्ताधारी पार्टी को लोगों ने हार का स्वाद चखाया है.

इसी तरह मध्यप्रदेश में जमीनी हालात की खबरों के संकेत हैं कि कांग्रेस अब फिर से उठ खड़े होने की हालत में है. कमल नाथ को पार्टी की प्रांतीय इकाई का अध्यक्ष बनाकर कांग्रेस ने मध्यप्रदेश में अपनी स्थिति संवारने की कोशिश की है. बड़ी संभावना यही दिख रही है कि कांग्रेस मध्यप्रदेश में साझे नेतृत्व में सामने आएगी, ज्योतिरादित्य सिंधिया को अहम जिम्मेदारी दी जाएगी और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को भी आगे की पांत में रखने की कोशिश होगी. प्रदेश में किसान संकट में हैं, नौजवान बेरोजगारी का सामना कर रहे हैं और सूबा पानी की कमी से परेशान है. इन तमाम वजहों से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के लिए चुनावी लड़ाई बहुत मुश्किल साबित होने वाली है.

तीसरी बात ये कि कांग्रेस अगर कर्नाटक चुनाव हारती है तो पार्टी के भीतर नेतृत्व के सवाल पर बहुत बेचैनी पैदा होगी. पार्टी के कार्यकर्ता और नेता राहुल गांधी के नेतृत्व और चुनाव जीत पाने की उनकी क्षमता का फिर से मूल्यांकन करेंगे. वे सोचेंगे कि नोटबंदी, बेरोजगारी, दलितों का गुस्सा जैसी कई बातें अभी पार्टी के पक्ष में हैं तब भी कांग्रेस चुनाव जीत पाने में नाकाम है. कर्नाटक की हार पार्टी के नैतिक बल पर एक चोट की तरह होगी, वह पार्टी को भ्रम में डालेगी और कांग्रेस राहुल गांधी को अपना एकमात्र विकल्प मानना छोड़ सकती है.

narendra modi twitter

आखिर बीजेपी कांग्रेस को राजस्थान और मध्यप्रदेश में अपनी बिखरी हुई ताकत को बटोरने, एकजुट होने और गंभीर चुनौती बनकर उभरने का मौका क्यों देगी भला ? इन राज्यों में अगर कांग्रेस जीतती है या फिर टक्कर कांटे की रहती है तो फिर उससे मौजूदा राजनीति की कहानी में एक मोड़ आ सकता है. बड़ी संभावना यही लगती है कि बीजेपी एकसाथ चुनाव कराने का विकल्प चुनेगी और ऐसे में स्थानीय मुद्दे एक किनारे हो जायेंगे तथा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्टार प्रचारक बनेंगे जो कांग्रेस के लिए एकतरह से ताबूत में आखिरी कील की जैसा साबित होगा.

बीजेपी को यह भी ध्यान में रखना होगा कि बढ़ती बेरोजगारी, डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरती कीमत और सरकार की लोकप्रियता का नीचे गिरता ग्राफ उसके लिए जोखिम का सबब साबित हो सकता है, खासकर उस स्थिति में जब कांग्रेस कुछ सूबों में चुनाव जीत ले और विपक्ष अगले लोकसभा चुनावों से पहले एक मंच पर आ जाए.

इसलिए कर्नाटक पर नजर जमाए रखिए. भले ही बात एक राज्य की जान पड़ती हो लेकिन इस सूबे में बीजेपी की जीत होती है तो उसके नतीजे व्यापक होंगे. बात बेशक लालच की है लेकिन बीजेपी के सामने एक झटके में लोकसभा के चुनाव जीतने, राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ का अपना दुर्ग बचाने और कांग्रेस को हमेशा-हमेशा के लिए अखाड़े से बाहर कर देने का मौका आन खड़ा हुआ है!

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