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कर्नाटक चुनाव नतीजे: BJP-कांग्रेस, दोनों के लिए घाटे का सौदा नहीं है जनादेश

कर्नाटक चुनाव के नतीजों ने दोनों ही बड़ी पार्टियों को भविष्य को लेकर केवल निराशा ही नहीं दी है

Updated On: May 16, 2018 08:13 AM IST

Nilanjan Mukhopadhyay

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कर्नाटक चुनाव नतीजे: BJP-कांग्रेस, दोनों के लिए घाटे का सौदा नहीं है जनादेश

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के कुछ नेताओं द्वारा अपरिपक्व तरीके से 'जीत' का दावा करने के कारण कर्नाटक विधानसभा चुनाव का मामला आखिरकार 'अनमोल' वस्तु जैसा हो गया है.

अगर भारतीय जनता पार्टी को इस विधानसभा चुनाव में स्पष्ट बहुमत मिलता, तो इस सवाल को लेकर किसी तरह की दुविधा या शक-सुबहा का मामला नहीं रह जाता. हालांकि, कर्नाटक विधानसभा में भारतीय जनता पार्टी के सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर पर उभरने के बाद पार्टी की इस पोजीशन को धक्का नहीं लगा है कि पार्टी केंद्र में एक और कार्यकाल की खातिर जीत हासिल करने के लिए वोटरों का पसंदीदा विकल्प है.

ऊंट किसी भी करवट बैठे, भारतीय जनता पार्टी का कर्नाटक विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरना निश्चित तौर पर उसके लिए एक सकारात्मक और फायदेमंद बात है.

मोदी की करिश्माई छवि का जलवा बरकरार है

कर्नाटक में कांग्रेस पर बीजेपी की बढ़त का उतना ज्यादा नहीं होना कई महत्वपूर्ण संकेतों और चीजों की तरफ इशारा करता है. इसमें सबसे अहम बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का लगातार बरकरार रहना भी है. यह साफ है कि चुनाव प्रचार अभियान के 'आखिरी दौर' में उनकी (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी) सक्रियता ने चुनाव नतीजों को प्रभावित करने में अहम भूमिका निभाई और इस वजह से कांग्रेस को राज्य की कई विधानसभा सीटों पर हार का सामना करना पड़ा.

Ground breaking ceremony of Navi Mumbai Airport

कर्नाटक विधानसभा का चुनाव ऐसा मामला था, जहां अच्छे प्रदर्शन को लेकर कांग्रेस का भरोसा भारतीय जनता पार्टी के मुकाबले ज्यादा पक्का था. हालांकि, चुनाव परिणाम बताते हैं कि नरेंद्र मोदी की निजी सक्रियता और भूमिका से कांग्रेस की 'जीत' को किसी तरह से रोक दिया. इस बारे में शायद कांग्रेस नेता और राज्य के मौजूदा सीएम सिद्धारमैया को भी अंदाजा हो गया था, जिन्होंने अचानक से यह बयान दे दिया कि उन्हें दलित समुदाय के शख्स को राज्य का मुख्यमंत्री बनाए जाने को लेकर कोई आपत्ति नहीं है.

कर्नाटक विधानसभा चुनाव का जनादेश इस शंका को भी दूर कर देता है कि भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह अपनी चमत्कारी क्षमता गंवा चुके हैं और अब वह चालाक चुनावी मैनेजर और रणनीतिकार नहीं रहे. पिछले साल उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद अमित शाह की छवि वाकई में टार्नेडो की हो गई थी, लेकिन हाल में उनके प्रदर्शन को लेकर थोड़ी बहुत फुसफुसाहट होने लगी थी.

कांग्रेस के प्रदर्शन को भी खराब नहीं माना जा सकता

हालांकि आंकड़ों को ध्यान में रखें, तो वोट शेयर के मामले में कांग्रेस का प्रदर्शन खराब नही रहा है या फिर ऐसा नहीं है कि निवर्तमान (संभवत:) मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को जबरदस्त सरकार विरोधी लहर के कारण निर्णायक तरीके से सत्ता से बाहर कर दिया गया है.

कांग्रेस के प्रदर्शन को लेकर जाहिर तौर पर कुछ पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट आएंगी, जो पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी और राज्य नेतृत्व को लेकर सख्त होगी. वैसे, इस बार उन्होंने किसी तरह की गलती नहीं की और पार्टी नेतृत्व वैसे बड़बोले नेताओं का मुंह बंद रखने में सफल रहा, जो चुनाव प्रचार के ऐन वक्त पर पार्टी को नुकसान पहुंचाने वाले बयान देते रहते हैं, जबकि आम तौर पर वे चुनावी बहस और विमर्श से दूरी बनाए रखते हैं. यहां तक कि राहुल गांधी ने खुद सही समय पर सही तरह के बयान दिए.

किन कारणों से कांग्रेस पर भारी पड़ी बीजेपी?

वास्तव में कांग्रेस और उसके नेताओं ने अच्छी तरह से काम किया. ऐसे में सवाल यह उठता है कि किन कारणों से मोदी और उनकी टीम का प्रदर्शन बेहतर रहा !

मिसाल के तौर पर सुबह से चुनाव आयोग की वेबसाइट पर कांग्रेस के बदलते वोट शेयर पर विचार कीजिए. पार्टी के वोट शेयर का ग्राफ अधिकतम ऊंचाई के मामले में 38 फीसदी पर गया, जबकि नीचे गिरने के मामले में यह आंकड़ा 36 फीसदी के आसपास रहा. अगर इसका औसत मामला तैयार किया जाए और अगर फाइनल वोट शेयर में नाटकीय बदलाव नहीं देखने को मिले (इसकी संभावना बेहद सीमित है) तो इस ट्रेंड को कांग्रेस पार्टी के लिए खराब प्रदर्शन नहीं माना जाएगा. 2013 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को 36.5 फीसदी वोट मिले थे. ऐसे में अगर दोनों चुनावों में पार्टी के प्रदर्शन की तुलना की जाए तो जाहिर है कि कांग्रेस पार्टी का प्रदर्शन उतना बुरा नहीं रहा है.

इसके बजाय यह हुआ है कि बीजेपी ने बेहतर प्रदर्शन किया है. 2013 में भारतीय जनता पार्टी का वोट शेयर 19.89 फीसदी रहा था, लेकिन उस वक्त लिंगायत समुदाय की मजबूत शख्सियत बीएस येदियुरप्पा और आदिवासी नेता बी श्रीरामुलू दोनों पार्टी से बाहर थे. साल 2013 के विधानसभा चुनाव में दोनों नेताओं ने बीजेपी को भारी नुकसान पहुंचाने के मकसद से अलग इकाई के तौर पर काम किया और जाहिर तौर पर वे अपने इस अभियान में सफल रहे.

B S Yeduyurappa speaks at a meet the press

येदियुरप्पा की पार्टी कर्नाटक जनपक्ष को पिछले राज्य विधानसभा चुनाव में 9.79 फीसदी वोट मिले और इस पार्टी ने राज्य की 6 विधानसभा सीटों पर जीत हासिल की, जबकि श्रीरामुलू के संगठन बंदावारा श्रमिकरा रायतरा कांग्रेस पार्टी ने 2013 के विधानसभा चुनाव में 2.69 फीसदी वोट हासिल किया और उसे चार सीटें मिलीं. अगर तीनों (बीजेपी और दोनों नेता) अलग नहीं होते, तो उस वक्त भी कर्नाटक विधानसभा चुनाव के नतीजे कुछ अलग होते.

तीनों को मिलाकर 32.39 फीसदी वोट के जरिये बीजेपी को और ज्यादा सीटें जीतने में मदद मिलती. पिछले चुनाव में तीनों पार्टियों ने अलग-अलग चुनाव लड़ते हुए कुल मिलाकर 50 सीटों पर जीत हासिल की थी.

दरअसल, कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के नजरिये से यह भी कहा गया कि बीजेपी और कांग्रेस के बीच ज्यादा अंतर नहीं होगा और कांग्रेस को पूर्ण बहुमत नहीं मिलेगा.

बहरहाल, दोनों पार्टियों के बीच सीटों का अंतर काफी ज्यादा है. यह इस बात की तरफ इशारा करता है कि भारतीय जनता पार्टी ने चुनाव को लेकर अपना होमवर्क बेहतर तरीके से किया. जाहिर तौर पर पार्टी ने उम्मीदवारों के चुनाव पर ज्यादा ध्यान दिया. कांग्रेस का वोट शेयर पहले इतना या उससे ज्यादा होने का मतलब यह है कि इस पार्टी के वोट 'बर्बाद' हुए, जबकि भारतीय जनता पार्टी ने उन सीटों पर अपना ध्यान केंद्रित किया है, जहां उसके उम्मीदवारों के जीतने की संभावना अपेक्षाकृत ज्यादा थी.

इस जनादेश से आगामी विधानसभा चुनावों पर भी हो सकता है असर

कर्नाटक विधानसभा चुनाव के जनादेश का तात्कालिक प्रभाव यह होगा कि मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में होने वाले विधानसभा चुनावों का मुकाबला मौजूदा वक्त की उम्मीद से कहीं ज्यादा ज्यादा कांटे का हो जाएगा. इससे बीजेपी विरोधी मोर्चे के गठन के लिए आह्वान की आवाज को और बल मिलेगा. राहुल गांधी ने कर्नाटक विधानसभा चुनाव प्रचार अभियान के दौरान प्रधानमंत्री पद को लेकर अपना दावा पेश करने की कोशिश की, लेकिन उन्हें इस बारे में जल्द से जल्द ऐलान करना होगा.

कर्नाटक में बीजेपी के चुनाव प्रचार अभियान को अंजाम देने का तौर-तरीका और पार्टी द्वारा हासिल किए गए नतीजे इस बात की तरफ भी संकेत करते हैं कि राहुल गांधी को अभी और दांव और तरकीबें सीखने की जरूरत है. दरअसल, यह विकल्प चुनने का बड़ा कठिन मामला है- क्या मनमोहन सिंह की तरह राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को चिट्ठी लिखकर शिकायत करने बेहतर है या प्रतिद्वंद्वी को जैसा का तैसा की तर्ज पर जवाब दिया जाना चाहिए?

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