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कर्नाटक चुनाव : सोशल मीडिया और जमीनी रणनीति का बेहतर मिश्रण करा है जनता दल सेकुलर

बीजेपी और कांग्रेस की लड़ाई के बीच जेडीएस लोगों के बीच सोशल मीडिया के माध्यम से और डोर-टू-डोर कैंपेन के जरिए सीधे पहुंच रहा है

Parth MN Updated On: May 01, 2018 05:17 PM IST

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कर्नाटक चुनाव : सोशल मीडिया और जमीनी रणनीति का बेहतर मिश्रण करा है जनता दल सेकुलर

कर्नाटक में चुनावी घमासान जोर पकड़ रहा है. जैसे-जैसे मतदान का दिन यानि 12 मई की तारीख नजदीक आते जा रही है, हर गुजरते लम्हे के साथ जमीनी चुनाव-प्रचार और सोशल मीडिया पर चुनावी बुखार का पारा उबाल खा रहा है. मुख्यमंत्री सिद्धरमैया के ट्विटर पर 1.42 लाख फॉलोवर हैं तो बीजेपी की ओर से मुख्यमंत्री पद के दावेदार बीएस येद्दुरप्पा के ट्वीटर अकाउंट पर 2.79 लाख चाहने वाले मौजूद है और ये दोनों नेता अपने-अपने फ़ॉलोवर की तादाद के साथ एक-दूसरे पर बेझिझक हमला बोल रहे हैं.

जारी चुनावी जंग के तीसरे कोने पर जनता दल (सेक्यूलर) है और इसके नेता एचडी कुमारस्वामी की चमक सोशल मीडिया पर तनिक फीकी है. लेकिन सोशल मीडिया से जरा परे नजर हटाकर देखें तो जनता दल सेक्यूलर की मौजूदगी बाकी के मंचों पर अच्छी-खासी नजर आ रही है.

बेंगलुरु के एक नफीस से होटल के बारजे पर 50 सदस्यों की एक टोली दिन-रात काम पर जुटी है. बीते दो महीने से यही जगह इन लोगों की कर्मभूमि है. इस जगह को ये लोग अपनी भाषा में ‘वॉररूम’ का नाम दे रहे हैं. अंग्रेजी के ‘एल’ वर्ण के आकार के अहाते में घुसते ही आपकी नजर सबसे पहले के एक बड़े से ह्वाइटबोर्ड पर जाती है. इसपर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा है- ‘कुछ भी नामुमकिन नहीं’. साथ ही बोर्ड पर यह भी दर्ज है कि अब जंग के निर्णायक दिन के कितने दिन बाकी रह गए हैं.

खिड़की के सामने रखी टोकरी इस्तेमाल की जा चुकी चाय की प्याली और तश्तरियों से भरी हुई है. कोने में एक टेबल है. इस पर बिस्लेरी की बोतलें और प्लास्टिक के ग्लास रखे हुए हैं.दीवार पर टंगे टीवी सेट के नीचे चार्जर लटक रहे हैं.

पार्टी के सदस्य, स्वयंसेवक जिस तरफ देखो, सब पुरुष ही पुरुष हैं और वे अपने काम में इतने व्यस्त हैं कि किसी को इंटरव्यू देने की फुर्सत ही नहीं. वे अपनी डेस्कटॉप पर नजर गड़ाए बैठे हैं. जनता दल(सेक्युलर) की सोशल मीडिया टीम के एक अहम सदस्य 25 वर्षीय श्रेयस चंद्रशेखर डेस्कटॉप पर नजर गड़ाये बैठे लोगों की ओर इशारा करते हुए कहते हैं, 'ये ही हैं वो लोग जो किसी संदेश का वायरल होना सुनिश्चित करते हैं. हम लोग अगले दिन की तैयारी पहले से ही कर लेते हैं.'

kumar swamy

थोड़ी दूर आगे कुछ सदस्य छह टीवी स्क्रीन पर कन्नड़ भाषा में चलने वाले न्यूज चैनल पर आंखें टिकाये बैठे हैं. श्रेयस बताते हैं, 'यह इमरजेंसी टीम हैं. अगर कोई नई खबर आती है तो यह टीम हमें आगाह करती है और हम उसी के हिसाब से अपनी योजना बनाते हैं.' श्रेयस बेंगलुरु में डिसिजन साइंटिस्ट के रूप में काम कर रहे थे. बाद में उन्होंने जनता दल(सेक्यूलर) की सोशल मीडिया पर मौजूदगी धारदार बनाने के इरादे से अपनी नौकरी छोड़ दी. वे कहते हैं, 'मेरी तरह कई और स्वयंसेवकों ने भी नौकरी छोड़ी है.'

चेतन अभिलाष 22 साल के हैं. उन्होंने अभी-अभी कॉलेज की पढ़ाई पूरी की है और वे कोर टीम का हिस्सा है. चेतन अभिलाष कहते हैं, 'पिछले साल अप्रैल में हमने कुमार पथन नाम से एक बैठक बुलाई थी. इसमें 2000 स्वयंसेवक आए. हमने सोशल मीडिया पर विस्तार से चर्चा की और तय हुआ कि 2018 के चुनावों में सोशल मीडिया एक अहम चीज साबित होने वाली है. बैठक के तुरंत बाद हमने किसानों और ऑटो ड्राइवर के साथ कुमार अन्ना के इवेन्ट्स के पोस्ट अपलोड किए, हमें इस पर बड़ी अच्छी प्रतिक्रिया मिली.'

सोशल मीडिया का इस्तेमाल सारी पार्टियां कर रही हैं लेकिन चेतन बताते हैं कि जेडीएस का अभियान बाकी पार्टियों से तनिक अलग रीत पर चल रहा है. वे कहते हैं, 'कांग्रेस और बीजेपी ने इसे आऊटसोर्स कर रखा है. लेकिन हमारे पास इन दो राष्ट्रीय पार्टियों जितने संसाधन नहीं हैं. हम सब स्वयंसेवक हैं. हमारा प्रचार-अभियान भले छोटे स्तर पर चल रहा हो लेकिन हमारा ध्यान अपने एजेंडे पर है. हमारा प्रचार-अभियान सकारात्मक है. पार्टी नेतृत्व से इस बारे में साफ-साफ आदेश मिला है. कांग्रेस और बीजेपी तो एक-दूसरे को गिराने में लगे हैं.'

वार-रूम में सारी ताकत अवाम के बीच पहुंचने के लिए लगायी जा रही है. श्रेयस बताते हैं, 'हमारा जनाधार ज्यादातर ग्रामीण इलाकों में है. जब किसी को स्मार्टफोन हासिल होता है तो वह सबसे पहले उसमें ह्वाटस्एप डाउनलोड करता है, फिर फेसबुक. ट्वीटर पर सिर्फ एलीट(अभिजन) तबके के लोग हैं सो वहां आपको मीडिया अटेंशन तो मिलता है लेकिन वोट नहीं मिलते.'

श्रेयस कहते हैं कि कर्नाटक के ग्रामीण इलाके के लोगों ने तो ट्विटर का नाम भी नहीं सुना होगा. 'जब आपके पास संसाधन कम हों तो बेहतर यही है कि आप अपना ध्यान सीमित दायरे में ही लगाएं. हमने एक सर्वे किया और पाया कि ह्वाटस्एप तथा फेसबुक के सहारे हम अपनी छाप छोड़ने में कामयाब हैं, सो हमें ट्विटर की जरूरत नहीं है. जो लोग क्षेत्रीय भाषाओं में संदेश लिख-पढ़ या देख-सुन रहे हैं उनके बीच ट्विटर लोकप्रिय नहीं हैं.'

बेंगलुरु के आईटी सेल से रोजाना चार लाख ह्वाटस्एप यूजर्स को उनके फोन पर संदेश भेजा जाता है. इसमें ‘ग्रुप्स’ शामिल नहीं हैं. श्रेयस बताते हैं कि ये संदेश फिर लाखों यूजर्स के पास फॉरवर्ड किए जाते हैं. हमने अपने काम को आगे बढ़ाने के लिए कई फेसबुक पेज बनाए हैं. हमारे पेज को 70 लाख लोग फॉलो कर रहे हैं. फेसबुक के सहारे भेजे गये हमारे कुछ वीडियोज को 2 करोड़ से ज्यादा लोगों ने देखा है. हम वो ही चीजें अपलोड करते हैं जिनका रिश्ता कर्नाटक के ग्रामीण के इलाके के लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी से है..

फेसबुक के पेजेज पर कन्नड़ भाषा में प्रचार की बहुत सी सामग्री अपलोड की गई है और इन्हें लाखों व्यूअर्स मिले हैं. अपलोड की गई इस प्रचार सामग्री में से एक में सूबे के ग्रामीण इलाकों में पेश आ रही बिजली की किल्लत के बारे में कहा गया है. इस प्रचार सामग्री में एक मां को दिखाया गया है जो बीमार पिता की देखभाल कर रही है और किताब पढ़ रही बेटी दोनों को देख रही है और इस दरम्यान बिजली का आना-जाना लगा हुआ है. इस संदेश के जरिए यह बताने की कोशिश की गई है कि जबतक कुमारस्वामी मुख्यमंत्री नहीं बनते हालात नहीं बदलने वाले हैं.

संजीदा किस्म के संदेशों के साथ कुछ मजाकिया तेवर वाले मीम बनाए गए हैं इनमें कुमारस्वामी के चेहरे को किसी फिल्मी सितारे के चेहरे पर चस्पा कर दिया गया है. ऐसे मीम में कुमारस्वामी लोगों के बीच जोशीले भाषण देते नजर आते हैं. सोशल मीडिया टीम का कहना है कि उसने यह आयडिया मिल-जुलकर तैयार किया है.

चेतन बताते हैं कि वाररूम का जिम्मा यह सुनिश्चित करने का है कि हर वीडियो, मीम, तस्वीर या फिर कोई लिखित संदेश ह्ववाट्सएप के जरिए सीधे 4 लाख लोगों तक पहुंचे और ऐसा हर संदेश फेसबुक पर फौरन ही शेयर हो जाए. चेतन ने कहा कि वाररूम में कुल 50 लोग इस काम में लगे हैं तथा सूबे में अलग-अलग जगहों पर 200 और लोग इस काम में जुटे हैं. ये सभी संदेश को वायरल बनाने में हमारी मदद करते हैं.

हालांकि सोशल मीडिया पर ध्यान देने का फैसला साल 2017 के अप्रैल में लिया गया लेकिन श्रेयस का कहना है कि 2013 के बाद से ही पार्टी के मन में यह विचार चल रहा था. उस वक्त चुनावों में जनता दल सेक्यूलर की हार हुई थी और पार्टी के नेता कुमारस्वामी बहुत उदास थे. यही वो वक्त भी था जब बीजेपी 2014 के लोकसभा चुनावों की तैयारी के मद्देनजर सोशल मीडिया का बड़ी कामयाबी के साथ इस्तेमाल कर रही थी.

साल 2013 में कांग्रेस ने 36.6 फीसद वोट के साथ सरकार बनाई जबकि बीजेपी 32.2 प्रतिशत मतों के साथ सूबे में दूसरे स्थान पर रही. जेडीएस को 20 प्रतिशत वोट मिले थे. जेडीएस के सामने चुनौती इस वोटशेयर को बनाये रखने के साथ-साथ कुछ और वोटों को हासिल करने की है ताकि पूर्व मुख्यमंत्री कुमारस्वामी किंगमेकर के रूप में उभर सकें जैसा कि ओपिनियन पोल में बताया जा रहा है.

लेकिन ऐसा कहना आसान है, करना बहुत मुश्किल. जब चुनाव में मतदाताओं का बंटवारा और ध्रुवीकरण तेजी से हो रहा हो तो मुकाबले में खड़ा तीसरा पक्ष हाशिए पर चला जाता है. कांग्रेस जेडीएस को बीजेपी की बी टीम बताकर प्रचार कर रही है और एक बात यह भी है कि कुमारस्वामी ने 2006 में सरकार बनाने के लिए बीजेपी से हाथ मिलाया था, सो यह तथ्य उनके लिए मददगार नहीं साबित हो पा रहा. उनपर मनमाने ढंग से पार्टी चलाने के आरोप लगाये जाते रहे हैं और हाल ही में पार्टी के 7 विधायक पाला बदलते हुए कांग्रेस की ओर कूच कर गए.

श्रेयस का कहना है कि सोशल मीडिया से की जा रही कोशिशों की वजह से बाधाओं को दूर करने में कामयाबी मिल रही है. वे बताते हैं, 'राष्ट्रीय मीडिया ही नहीं बल्कि क्षेत्रीय मीडिया ने भी कांग्रेस और बीजेपी पर ही फोकस कर रखा है. हमें अपनी हैसियत के मुताबिक कवरेज नहीं मिल रही,' ऐसा कहते हुए श्रेयस ने फोन उठाकर दिखाया कि कुमारस्वामी की रैलियों में किस कदर भीड़ जुड़ रही है लेकिन वाररुम के टीवी चैनल अमित शाह के मंदिर दौरे की कवरेज कर रहे हैं और इसके बाद टीवी चैनल का फोकस सिद्धारमैया के प्रेस-कांफ्रेस की ओर मुड़ जाता है. श्रेयस कहते हैं, 'हमारे नेता ने सैकड़ों मंदिरों की यात्रा की है लेकिन मीडिया ने कभी इस यात्रा की इतने विस्तार से कवरेज ना की. लेकिन मुझे इस बात का यकीन है कि सोशल मीडिया के जरिए हम इसकी भरपाई कर रहे हैं और हमारा प्रचार-अभियान जमीनी स्तर तक पहुंच रहा है.'

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कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया

इस रणनीति का एक संकेत यह भी है कि पार्टी के स्वयंसेवकों ने प्रचार-अभियान के हिस्से के तौर पर मारियो(एक कार्टून चरित्र) की तर्ज पर एक गेम तैयार किया है. यह गेम सिर्फ एंड्रओएड पर उपलब्ध है. अभी तक इस खेल को 20 हजार दफे डाऊनलोड किया जा चुका है. श्रेयस का कहना है, 'गेम एक बार फोन पर डाऊनलोड हो जाय तो हम उसके सहारे अपने प्रचार से जुड़े अपडेट और नोटिफिकेशन भेज सकते हैं.'

तैयार किया गया गेम बहुत मजेदार है. इसमें कुमारस्वामी की एक छोटी सी आकृति दिखती है. अपने इस रुप में कुमारस्वामी पूरे सूबे में एक जगह से उछलकर दूसरी जगह पहुंचते और वहां से कांग्रेस या फिर बीजेपी का झंडा उखाड़कर जेडीएस का झंडा फहराते नजर आते हैं. गेम के हर लेवल पर जेडीएस के चुनावी घोषणापत्र की कोई पंक्ति फोन के स्क्रीन पर तैरती नजर आती है. जैसे-जैसे गेम में लेवल बढ़ता है दुश्मन के रूम में कमल का फूल या फिर पंजे का निशान नजर आता है और गेम के आखिरी के हिस्से में कुमारस्वामी कर्नाटक के मुख्यमंत्री बन जाते हैं. बहरहाल, मुश्किल ये है कि आप हर बार गेम के सारे लेवल पार नहीं कर पाते और समर्थकों को यह देखना शायद ही पसंद आये कि कुमारस्वामी को कमल के निशान या फिर हाथ के पंजे ने लड़ाई में गिरा दिया.

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