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कर्नाटक चुनाव 2018: गेम चेंजर साबित हो सकते हैं देवगौड़ा

86 वर्षीय पूर्व प्रधानमंत्री और जनता दल-सेकुलर (जेडीएस) के प्रमुख एचडी देवेगौड़ा के लिए कर्नाटक का ये विधानसभा चुनाव ‘करो या मरो’ वाला है

Updated On: Apr 15, 2018 09:18 AM IST

Aparna Dwivedi

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कर्नाटक चुनाव 2018: गेम चेंजर साबित हो सकते हैं देवगौड़ा

कर्नाटक में जेडीएस नेता एचडी देवगौड़ा काफी उत्साह में हैं. सुबह पांच बजे से अपनी चुनावी दिनचर्या शुरु कर देतें हैं. उनके ज्यादा उत्साह की वजह भी है. सुप्रीम कोर्ट के एक मामले में एससी-एसटी एक्ट में संशोधन के बाद उबला विरोध और मायावती का साथ उन्हें इस चुनाव में काफी खुश कर रहा है. इस विरोध ने जहां एक तरफ बिखरते दलित वोटरों को एक कर दिया साथ ही उन्हें बीजेपी से नाराज भी कर दिया है.

86 वर्षीय पूर्व प्रधानमंत्री और जनता दल-सेकुलर (जेडीएस) के प्रमुख एचडी देवेगौड़ा के लिए कर्नाटक का ये विधानसभा चुनाव ‘करो या मरो’ वाला है. हालांकि उन्हें उम्मीद है कि 1994 के अपने प्रदर्शन को दोहरा पाएंगे. 1994 में उन्होंने 224 में से 113 सीटें जीती थीं.

कर्नाटक चुनाव इस बार सभी राजनैतिक पार्टियों के लिए महत्वपूर्ण है. मुकाबला कांग्रेस, बीजेपी और देवेगौड़ा के गठबंधन के बीच है. इसके अलावा हैदराबाद में जड़ें जमा चुकी ओवैसी की एआईएमआईएम भी इस साल चुनाव में हाथ आजमाना चाहती है. पार्टी की नजर कर्नाटक के मुस्लिम बहुल इलाकों पर है. ओवैसी और देवगौड़ा के बीच गठबंधन को लेकर बातचीत शुरु हुई थी लेकिन मामला अटका रहा. सूत्रों की माने तो दोनो चुनाव से पहले गठबंधन को लेकर अभी भी उलझन है. देवेगौड़ा के पारंपरिक वोटरों में मुसलमान वोटर भी माने जाते हैं.

इस बार कर्नाटक चुनाव में जातिगत समीकरण बेहद अहम रोल निभा रहे हैं. राज्य में वोक्कालिगा और पिछड़े वोट बैंक पर जेडीएस का प्रभाव माना जाता है जबकि दलितों पर मायावती का भी प्रभाव है. बहुजन समाज पार्टी के साथ अपने गठबंधन को लेकर देवगौड़ा का मानना है कि बीएसपी ने पहले भी राज्य के चुनाव में अपने उम्मीदवार उतारे थे. हालांकि उन्हें किसी भी सीट पर जीत नहीं मिली लेकिन कुछ क्षेत्रों में 30 हजार तक वोट हासिल किए थे. ऐसे में वो सीटें जहां पर मामला कुछ हजार वोटों से अटकता है, बीएसपी का साथ उन्हें मदद देगा.

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चुनाव में जातिगत समीकरण 

कर्नाटक की राजनीति में जातीय समीकरण तीन समुदाय में बटे हैं. ये हैं - लिंगायत समुदाय, वोक्कालिग्गा समुदाय और कुरबा समुदाय से जुड़े हैं. दिलचस्प बात ये है कि राज्य की मौजूदा राजनीति इन तीन समुदाय से आने वाले तीन नेताओं पर ही टिकी है. कांग्रेस नेता और मुख्यमंत्री के. सिद्धारमैया कुरबा समुदाय से आते हैं. बीजेपी के मुख्यमंत्री उम्मीदवार बी.एस येदियुरप्पा लिंगायत समुदाय से आते हैं. जबकि जनता दल सेक्यूलर के एच.डी देवेगौड़ा वोक्कालिग्गा समुदाय से हैं.

राज्य में वोक्कालिगा और लिंगायत समुदाय राजनीतिक लिहाज से काफी महत्वपूर्ण हैं. ऐसा माना जाता है कि लिंगायत बीजेपी के मतदाता है. लिंगायतों की कई सालों से अपने लिए अलग धर्म की मांग रही थी. जिसे मानते हुए सिद्धारमैया सरकार ने उनको अलग धर्म की मान्यता देने वाले प्रस्ताव को केंद्र के पास भेज कर गेंद केंद्र सरकार के पाले में डाल दी है.

वहीं दूसरी तरफ में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने कुछ संतों से बात करते हुए ये कहा था कि जब तक केंद्र में बीजेपी की सरकार है तब तक कांग्रेस सरकार के इस फैसले को लागू नहीं होने दिया जाएगा. इसके विरोध में लिंगायत के 220 मठों के मठाधीशों ने बैठक बुलाकर इन चुनावों में कांग्रेस को समर्थन देने का बड़ा एलान कर दिया. लिंगायत समुदाय बीजेपी का परंपरागत मतदाता रहा है. इस समुदाय का बीजेपी को 90 के दशक से ही समर्थन मिलता आ आ रहा है. राज्य की 224 विधानसभा सीटों में से 100 से अधिक सीटों पर इस समुदाय का प्रभाव है.बीजेपी के मुख्यमंत्री उम्मीदवार बीएस येदियुरप्पा भी इसी समुदाय से आते हैं. कर्नाटक में लिंगायत समुदाय के लोगों की संख्या करीब 18 प्रतिशत है.

हालांकि लिंगायत कभी भी देवगौड़ा की ताकत नहीं रही है लेकिन इस बार उन्हें उम्मीद है कि कांग्रेस और बीजेपी के बीच लिंगायत वोटर को अपनी तरफ खींचने की होड़ के चक्कर में जेडीएस फायदे में रहेगी.

देवेगौड़ा की ताकत- वोक्कालिग्गा समुदाय 

पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा वोक्कालिग्गा समुदाय के बड़े नेता माने जाते हैं. जनसंख्या के लिहाज से वोक्कालिग्गा कर्नाटक की दूसरी प्रभावी जाति है. इसकी आबादी 12 फीसदी है. वोक्कालिगा परंपरागत रूप से देवेगौड़ा को समर्थन देते रहे हैं. उसके बाद कांग्रेस का नंबर आता है और अंत में बीजेपी. वोक्कालिगा समुदाय की लिंगायत वाले मुद्दे पर सिद्धारमैया सरकार के खिलाफ नाराजगी है. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि ऐसे में वोक्कालिगा समुदाय के लोग सिद्धारमैया सरकार को सबक सिखाने का फैसला कर सकते हैं और इसका सीधा लाभ जेडीएस को होगा.

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दलित फैक्टर 

कर्नाटक विधानसभा चुनाव के लिए जेडीएस के साथ गठबंधन कर बीएसपी ने सबको हैरान कर दिया था. 1996 के बाद मायावती ने पहली बार किसी भी राज्य में चुनाव से पहले गठबंधन किया था. जेडीएस ने इस गठबंधन को बड़ी उपलब्धि कहा था. इस गठबंधन के जरिए जेडीएस की नजर राज्य के दलित वोटो पर हैं. राज्य की 224 विधानसभा सीटों में से 36 सीटें अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित हैं. लेकिन ऐसा अनुमान है कि दलित समुदाय कर्नाटक की 60 विधानसभा सीटों के नतीजे निर्धारित कर सकता है. कर्नाटक में त्रिशंकु विधानसभा की पुरानी परंपरा है. इसके अलावा साल 1985 से कोई भी सत्ताधारी पार्टी लगातार दूसरी बार सरकार बनाने में कामयाब नहीं हो पाई है. ऐसे में दलितों के प्रभाव वाली 60 सीटों का महत्व खासा बढ़ जाता है.

बीएसपी 20 सीटों पर चुनाव लड़ रही है. अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों में उम्मीदवारों के चयन के आधार पर बीएसपी दो मुख्य पार्टियों यानी कांग्रेस और बीजेपी में से किसी एक के कुछ हजार वोट काट सकती है. कांटे की लड़ाई में कुछ हजार वोटों का नुकसान कांग्रेस और बीजेपी दोनों के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है.

देवेगौड़ा की मुश्किलें 

हालांकि राह देवेगौड़ा की भी आसान नहीं है. देवेगौड़ा अपनी सेक्यूलर छवि को बनाते हुए जहां एक तरफ अपने पारंपरिक वोटर बैंक वोक्कालिगा समुदाय को तो संभालने में लगे ही हैं साथ ही दलित और मुसलमान वोटरों पर भी उनकी नजर है. मायावती के साथ और दलितों का बीजेपी से गुस्सा उन्हें अपने पक्ष में लग रहा है, लेकिन उनकी समस्या उनके अपने बेटे एचडी कुमारस्वामी हैं. साल 2004 में कर्नाटक के इतिहास में पहली बार त्रिंशकु सरकार बनी थी.

उस समय बीजेपी को सत्ता से दूर रखने के लिए देवेगौड़ा ने कांग्रेस के साथ मिलकर गठबंधन सरकार बनाने का फैसला किया और एन धरम सिंह मुख्यमंत्री बने और डिप्टी सीएम का पद जेडीएस के सिद्धरमैया को मिला. कुमारस्वामी ने 2006 की शुरुआत में कांग्रेस सरकार से समर्थन वापस ले लिया और बीजेपी के सहयोग से सरकार बनाई हालांकि वो सरकार भी 2007 में गिर गई लेकिन कुमारस्वामी के बीजेपी के साथ हाथ मिलाने के बाद देवगौड़ा के सेक्यूलर छवि को धक्का लगा. अब उनकी कोशिश है कि छवि उन्हें वापस मिले.

अति शांत मायावती 

गठबंधन के ऐलान के एक हफ्ते बाद मायावती और जेडीएस सुप्रीमो और पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा ने बेंगलुरु में एक विशाल संयुक्त रैली को संबोधित किया था. इस रैली में इन दोनों ने कहा था कि वो एक साथ मिल कर कर्नाटक में कांग्रेस शासन का अंत करेंगे. लेकिन उसके बाद मायावती कर्नाटक में नहीं दिखी. एचडी देवेगौड़ा के गृह क्षेत्र हासन में हो रही विशाल रैली में उनके आने की उम्मीद थी लेकिन वो रैली में नहीं पहुंची. हालांकि ना बीएसपी और ना ही जेडीएस ने इस गठबंधन से पीछे हटने की बात की है लेकिन राजनैतिक हलकों में ये चर्चा जोरो पर है कि क्या मायावती पीछे हट गई हैं.

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वैसे जातीय समीकरण पर नजर डाले तो कर्नाटक में लिंगायत 18 फीसदी, दलित 20 फीसदी, मुस्लिम 16 फीसदी, ओबीसी 16 फीसदी, वोक्कालिग्गा समुदाय 12 फीसदी और अन्य 18 फीसदी हैं.

कर्नाटक में जेडीएस का बीएसपी के साथ गठबंधन ना सिर्फ बीजेपी बल्कि कांग्रेस के लिए भी मुश्किल खड़ी कर सकता है. दरअसल कर्नाटक में पिछड़े और ओबीसी वोटर की संख्या काफी अधिक है जिसपर जेडीएस की पकड़ काफी अच्छी है, वहीं ओबीसी वोटर्स में मायावती की पैठ कांग्रेस और बीजेपी के लिए मुश्किल बन सकती है.

विधानसभा चुनाव में जेडीएस की ओर से पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा और उनके बेटे एचडी कुमार स्वामी मुख्य चेहरा बनकर उभर रहे हैं और माना जा रहा है कि अगर किसी दल को बहुमत नहीं मिलेगा तो जेडीएस किंगमेकर की भूमिका में आ सकता है.

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