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कर्नाटक चुनाव का सबकः सत्ता को आईना दिखाना जरूरी, राजनीति को अलग तरह से समझें हम

यह वक्त हमें अपने लिए और भारत की खातिर बोलने का है, न कि उनके पक्ष में बोलने का है, जो शासन में बैठे हैं

Updated On: May 21, 2018 03:07 PM IST

Mahesh Peri

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कर्नाटक चुनाव का सबकः सत्ता को आईना दिखाना जरूरी, राजनीति को अलग तरह से समझें हम

मैं राहुल गांधी का कड़ा आलोचक रहा हूं और सोनिया गांधी द्वारा उन्हें राजनीति में धकेले जाने की बलवती इच्छा का भी. मैंने सोनिया की राहुल को सिंहासन पर बिठाने की तमन्ना की आलोचना भी की थी, हालांकि ऐसा सभी माता-पिता करते हैं. ये 2017 के शुरुआती समय की बात है. वो अब भी उसी तमन्ना के साथ आगे बढ़ रही हैं और कुछ समय पहले एक चुनाव की आड़ लेकर उन्होंने राहुल की ताजपोशी देश की सबसे पुरानी पार्टी पर कर दी. फिर हमारे पास कोई विकल्प ही नहीं बचा. संभव है सोनिया के पास भी कोई विकल्प नहीं मौजूद था.

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दूसरी तरफ, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने तमाम विपक्षी पार्टियों को 'अवैध' करार देने के लिए जबरदस्त अभियान चलाया. 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए बीजेपी का रास्ता विपक्ष को अक्षम, नाकाबिल और भ्रष्ट जैसा दिखाने से शुरू होता है. 2014 के लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को 'पप्पू' पर चुटकुले और तंज के साथ जीत हासिल हुई और 2019 के लिए चुनाव प्रचार अभियान में पार्टी खिचड़ी सिद्धांत को भुनाने की कोशिश करेगी.

कांग्रेस अध्यक्ष पद पर ताजपोशी के बाद नए अंदाज में दिखे राहुल

ताजपोशी से मिली ताकत के कारण राहुल गांधी का अपना वजूद दिखने लगा. वह परिपक्कव होने लगे. वह चीजों को नियंत्रित करने लगे. वह आजाद थे. वह फैसले ले रहे थे. वह आक्रामक थे. वह अपने प्रतिद्वंद्वियों पर इस तरह का निशाना साध रहे थे, जैसा पहले कभी नहीं सुना गया था. वह जुझारू नजर आ रहे थे. कहा जा सकता है कि जमीन पर उनकी शुरुआत शानदार रही. साथ ही, वह विचारवान और सहानुभूतिशील थे. उन्हें लोगों की समस्याओं का अंदाजा था. उन्होंने अपनी गलतियां स्वीकार कीं. उन्हें अपनी नाकामियों के बारे में पता था. उन्होंने अपनी कमजोरियां पर काम किया.

Rahul Gandhi in Karnataka

सबसे अहम बात यह रही कि उनका दिल सही जगह पर मौजूद था. वह अब एक सामान्य भारतीय राजनेता की तरह बर्ताव नहीं कर रहे थे. वह विवेक से भरे थे. उन्होंने राजनेताओं की उस पुरानी परंपराओं को नजरअंदाज कर दिया, जिससे कांग्रेस के पावर सेंटर घिरे हुआ करते थे. उनके सोच और रवैये में ताजगी नजर आ रही थी. उन्होंने जीत के लिए तड़प दिखाई. सत्ता हासिल करने के लिए उनमें आग भी थी, लेकिन वह लालची और सत्ता के भूखे राजनेता की तरह नहीं दिख रहे थे.

राहुल गांधी अपने पास उपलब्ध प्रलोभनों के चक्कर में नहीं पड़ रहे थे और न ही इससे जुड़ी छिछोरी हरकतों में शामिल हो रहे थे. हार और चुनौतियों को स्वीकार करते हुए वह फिर से लड़ने के लिए खड़े हुए. और गुजरात व कर्नाटक में जोरदार मुकाबला पेश करने के लिए उन्होंने कांग्रेस की जिम्मेदारी ली. जी हां, गुजरात में भी.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृह राज्य में उन्होंने अकेले बीजेपी की ताकत का मुकाबला किया जबकि भारतीय जनता पार्टी की तरफ से पार्टी संगठन, कैबिनेट, शीर्ष नेतृत्व, नमो मैजिक और ताकतवर अमित शाह की संयुक्त ताकत काम कर रही थी. राहुल गांधी ने रेड्डी बंधुओं का भी मुकाबला किया. उन्होंने अपने ऊपर आई हर चुनौती, मुश्किलों और संघर्ष का डटकर सामना किया.

बिजनेस मॉडल की तरह धार्मिकता और संस्कृति का इस्तेमाल करती है BJP

गांधी परिवार को लेकर भारतीय जनता पार्टी का विरोध और कुछ नहीं बल्कि सत्ता हासिल करने की राह में पार्टी (बीजेपी) की एकमात्र स्थाई बाधा को दूर करना है. भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रवादी राग, हिंदुत्व के लिए उनका प्रेम, भ्रष्टचार के खिलाफ कथित रवैया और अभियान को लेकर बार-बार पार्टी की कलई खुल चुकी है. बीजेपी के नेता राष्ट्रीय गीत बजते रहने के बावजूद उठकर बाहर निकल जाते हैं. बिजनेस मॉडल के तौर पर धार्मिक जगहों का इस्तेमाल करते हैं और किसी भी तरह से सत्ता हासिल करने की खातिर हर भ्रष्ट राजनेता को अपनी पार्टी में शामिल होने का न्योता देते हैं.

INDIA-POLITICS

अयोध्या दरअसल पार्टी के लिए दिल्ली पहुंचने का रास्ता है और 'सीमा' संसद पहुंचने का रूट. सत्ता हथियाने को लेकर इस स्तर का लालच भारतीय जनता पार्टी को छोड़कर किसी अन्य राजनीतिक पार्टी में देखने को नहीं मिला है और न ही किसी अन्य पार्टी के बारे में ऐसा सुना गया है. बीजेपी के सत्ता के मकसद की राह में जो कुछ भी आता है, उसे या तो अवैध करार दे दिया जाता है या फिर उसे खत्म कर दिया जाता है. महात्मा, गांधी और नेहरू परिवार, दलित और मुसलमान इस भगवा पार्टी के लिए खतरा हैं. सुरक्षा बल व सैनिक और धार्मिक श्रद्धालु-भक्त उनके लिए सत्ता हथियाने के हथियार हैं.

चार साल सत्ता में रहने के बाद भी गांधी परिवार के खिलाफ कोई सबूत नहीं जुटा सके मोदी

गांधी-नेहरू परिवार की छवि को जितना नुकसान हुआ है, वैसा किसी अन्य राजनीतिक परिवार के मामले में शायद देखने को नहीं मिला है. साजिश, भ्रष्टाचार और चरित्र हनन- गांधी परिवार को राजनीतिक तौर पर खत्म करने के लिए तमाम हथकंडों का इस्तेमाल किया गया. मौजूदा सरकार को 48 महीने यानी चार साल हो गए हैं. नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी का दावा है कि उनके पास गांधी-नेहरू परिवार की जन्मपत्री है. कहने का मतलब यह है कि पार्टी के दावों के मुताबिक इस परिवार के बारे में तमाम जानकारियां हासिल हैं.

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इसके अलावा, केंद्र सरकार के पास तमाम जांच एजेंसियां भी हैं और उनके एक इशारे पर किसी भी तरह की जांच मुमकिन हो सकती है. इसके बावजूद बीजेपी को गांधी-नेहरू परिवार के खिलाफ पिछले चार साल में कुछ हाथ नहीं लग पाया है. गांधी-नेहरू परिवार के खिलाफ हर आरोप अब तक महज आरोप ही बना हुआ है और 2019 के लोकसभा चुनावों में भी इन्हीं आरोपों को दोहराया जाएगा.

गांधी परिवार के पास कथित तौर पर 600 अरब डॉलर होने से जुड़ा बैंक स्टेटमेंट अब तक नहीं हासिल किया जा सका है. नेशनल हेरल्ड का केस अब भी वहीं है, जहां यह 2014 में था. दरअसल, नेशनल हेरल्ड का केस ऐसा मामला है, जहां एक समान नियमों के पालन की स्थिति में वैसे हर राजनेता को सजा हो जाएगी, जो ट्रस्टी हैं. प्रधानमंत्री से लेकर अमित शाह तक, तमाम मंत्रियों, देश के कई मुख्यमंत्रियों समेत कई नेताओं के खिलाफ मुकदमे हैं, जिन्हें अयोग्य माना जाता सकता है.

Amit Shah

वाड्रा की तरह बीजेपी के बड़े नेताओं के बेटों ने भी कमान संभाल ली है. पिछली यूपीए सरकार की तरह ही बीजेपी के मंत्रियों के परिवारों के मालिकाना हक वाली कंपनियों ने बेशुमार दौलत कमाई है. इसके अलावा, भारतीय जनता पार्टी के शासन के दौरान उद्यमियों ने भी जमकर रुपए की थैली बटोरी है. मसलन रेड्डी बंधु, मेहुल चोकीस, सुजान और यहां तक कि नीरव मोदी भी.

मामला खाने और खिलाने तक ही सीमित नहीं है. सबूतों के अभाव और अन्य चीजों का हवाला देते हुए 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के अभियुक्त बरी हो जाते हैं. माल्या देश से बाहर निकलने में सफल हो जाते हैं. नीरव मोदी ने भी हमें अंगूठा दिखा दिया. शारदा घोटाले के अभियुक्त बीजेपी में शामिल होने के बाद पूरी तरह से साफ-सुथरे हो गए. ललित मोदी का अब तक अता-पता नहीं है. दाऊद का शासन अब भी इस्लामाबाद से चल ही रहा है.

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नारायण राणे अब बीजेपी में हैं. सुखराम भी भारतीय जनता पार्टी का हिस्सा हैं. और रेड्डी बंधु भी काले धन के खिलाफ अभियान छेड़ने का दावा करने वाली इसी पार्टी से जुड़े हुए हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप द्वारा अमेरिका में भारतीयों को परेशान किया जा रहा है. एकमात्र हिंदू राष्ट्र का रुझान चीन और कम्युनिस्टों की तरफ बढ़ गया है. यहां तक कि भारतीय जनता पार्टी के दुश्मन नंबर-1 और गठजोड़ पूंजीवाद का शानदार नमूना कहे जाने वाले रॉबर्ट वाड्रा भी बिल्कुल फ्री घूम रहे हैं. कर्नाटक के मामले ने नरेंद्र मोदी और मोदी के भारत को आइना दिखाया है.

'अभिजात-वर्ग', 'फर्स्ट फैमिली', 'खांग्रेसी', 'सिकुलर'और 'इटैलियन' संबंध जैसे नफरत भरे जुमले को सोची-समझी रणनीति के तहत दवा के असर की तरह हमारे अवचेतन में स्थापित किया गया है. हम  में से कमजोर लोग इस दुष्प्रचार का आसानी से शिकार बन जाते हैं. गांधी परिवार के प्रति घृणा के कारण उनके इस फैसले को ढंक लेती है कि भारत के लिए क्या अच्छा है. वे भारत से जुड़े फायदों के मुकाबले गांधी-नेहरू परिवार के लिए सजा के बारे में ज्यादा सोचते हैं. बदले की भावना ज्यादा है. द्वेष का मामला ज्यादा है. नफरत ज्यादा है. और इन चीजों की तुलना में भारत के लिए बेहतरी की कामना काफी कम है.

मोदी ने खुद को जमकर बेचा और वह इसमें सफल रहे

PM Modi in Chikmagalur

नरेंद्र मोदी हममें से कइयों की पसंद थे, जिनमें मैं भी शामिल था. वह आक्रामक, विकास समर्थक, सही नीयत और बेहतर दिल वाले माने जाते थे. हालांकि, बेहद होशियारी के साथ उनकी इस तरह की छवि हम लोगों को बेची गई. लेखक, पत्रकार और अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मंत्री रहे अरुण शौरी की अगुवाई में युवा और बुद्धिमान लोगों की टीम ने नरेंद्र मोदी की यह छवि हम लोगों के बीच गढ़ी. अब इस बात में कोई शक नहीं कि नरेंद्र मोदी की इस छवि का वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं है.

हमें क्या मिला है? चीन हमारे सम्मान को निगल रहा है. हर मुद्दे पर देश में सेना तैयार हो रही है और ऐसा तब हो रहा है, जब पहले ही पाकिस्तान में देख चुके हैं कि इस तरह की सेनाएं इस मुल्क के लिए किस तरह आत्मघाती साबित हुईं. हमारे यहां भीड़ हम पर नियंत्रण कर शासन चला रही है.

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अगर आपकी युवा बेटी अपने किसी मुस्लिम दोस्त के साथ कॉफी पी रही है, तो मुमकिन है कि उसकी पिटाई हो जाए. अगर आपका युवा बेटा किसी ऐसे रेस्तरां में बैठा है, जहां बीफ भी परोसा जाता हो, तो मुमकिन कि भीड़ उसकी पीट-पीट कर हत्या कर दे. शरीर से लाचार अगर आपकी मां राष्ट्रगान के लिए उठने में सक्षम नहीं है, तो उनकी भी पिटाई की जा सकती है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश का कोई वजन नहीं रह गया है.

भ्रष्ट लोग अब भी फल-फूल रहे हैं और अगर बीजेपी में शामिल हो जाते हैं, तो आप कितने भी भ्रष्ट हों, आपको बिल्कुल पाक-साफ करार दे दिया जाएगा. अमीर और अमीर हुए हैं, जबकि गरीब और गरीब. शेयर बाजारों में 50 फीसदी का चढ़ाव हुआ और अर्थव्यवस्था तेजी से फिसली है. रोजगार में गिरावट आई है. युवा दिशाहीन हैं. एसएसआई, एमएसएमई को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. स्विस बैंक में मौजूद भारतीयों लोगों के कथित काले धन का अब तक कोई सुराग नहीं मिल पाया है. हमें अपने खातों में अब भी 15 लाख रुपए आने का इंतजार है.

Narendra Modi and Boris Johnson in London

सीमा पर अब हमारे पहले से कहीं ज्यादा जवान मारे जा रहे हैं. कश्मीर में तनावपूर्ण हालत चरम पर पहुंच चुके हैं. वाड्रा अब भी खुला घूम रहे हैं. यहां यह भी दलील दी जा सकती है कि प्रधानमंत्री तमाम अराजकताओं (यहां तक कि बीजेपी के शासन वाले राज्यों में भी) के लिए जिम्मेदार नहीं हैं, लेकिन वह इन मुद्दों पर चुप्पी साधने के लिए जरूर जिम्मेदार हैं. जैसा कि अक्सर उन्हें करते देखा जा सकता है. उनके ट्विटर पर आक्रामक फॉलोअर्स चरमपंथी और कट्टरपंथी ताकतों को मजबूत करते हैं.

अगर आप पहचान में आना चाहते हैं, तो आपको मुसलमानों और दलितों पर हमला करने और अपनी संस्कृति के लिए लड़ने की जरूरत है. और संस्कृति की परिभाषा वे लोग तय करेंगे. हम ईश्वर की रक्षा करने के लिए इंसानों की सेना तैयार कर रहे हैं.

देश में अराजकता जैसा है माहौल

हम अब ऐसे देश में रह रहे हैं, जहां सरकार संस्कृति के बारे में बात करती है. जबकि पुजारी और मठाधीश शासन पर बोलते हैं. दार्शनिक प्रशासन को लेकर बात करते हैं, बाबा शांति का पाठ पढ़ाते हैं. मानव संसाधन विकास मंत्रालय देशभक्ति लादना चाहता है. तकनीक की शिक्षा देने वाले संस्थान वेद की बात करते हैं. इसी तरह, मेडिकल संस्थान विज्ञान को छोड़कर तमाम बातें करते हैं.हम ऐसे भारत में रह रहे हैं, जहां भीड़ कानून तय करती है. न्यायिक आदेश कागजों तक सिमट कर रह जाते हैं और कानून खुद भीड़ के सामने समर्पण कर देती है.

हम ऐसे देश में हैं, जहां संविधान कट्टरपंथी दर्शन की दया पर है और न्यायपालिका खुद की आजादी के लिए याचना कर रही है. हमारे प्रधानमंत्री ऐसे हैं, जो अपनी चुप्पी के साथ कट्टरपंथियों को मौन समर्थन मुहैया करा रहे हैं और न्याय के लिए पीड़ित की आवाज सत्ता के भूखे राजनेताओं के चौतरफा शोर में गुम हो जाती है.

 

A Bharatiya Janata Party (BJP) supporter wears a mask of Prime Minister Narendra Modi, after BJP won complete majority in Tripura Assembly elections, during a victory celebration rally in Agartala

हम ऐसे देश में जी रहे हैं, जहां दरार और मतभेद हम सभी को निगल सकते हैं, जबकि इसमें हमारी कोई गलती नहीं होगी.हम इस बड़ी साजिश के अगले शिकार होंगे और इसमें हमारा कोई बस नहीं चलेगा. हम हिंसा या दंगों के शिकार हो सकते हैं, जिस पर हमारा बस नहीं होगा और न ही यह हमारे हित में होगा.

निष्पक्ष होकर पार्टियों और नेताओं का आकलन करने की जरूरत

ऐसे परिस्थितियों में हम क्या करें? क्या हम देश और इसके लोगों के लिए जो अच्छा है, उसे सिर्फ एक परिवार के खिलाफ नफरत को जीतने के लिए कुर्बान कर दें? न तो गांधी परिवार के खिलाफ नफरत और न ही प्रेम जताना उचित है. और न ही मोदी में भरोसा जताना. हमें पेंडुलम को वापस मोड़ने की जरूरत है. हमें अपने आकलन में वस्तुनिष्ठता और निष्पक्षता लाने की जरूरत है. हमें किसी भी राजनीतिक दल, विचारधारा और उसका नेतृत्व कर रहे लोगों के समर्थन को लेकर संतुलित रवैया अख्तियार करने की जरूरत है.

sonia vs modi

हमें सत्ता में बैठे चुप वैसे लोगों को सजा देने की जरूरत है, जो बोलने की परिस्थिति में चुप्पी साध लेते हैं. हमें नीयत नहीं कार्रवाई को देखना चाहिए. हमें वादा नहीं बल्कि प्रदर्शन पर फैसला करना चाहिए. हमें विचारधारा के बजाय नीति पर फैसला करना चाहिए और हिंसा के बजाय शांति की मांग करनी चाहिए.

यह वक्त अपने जीवन, अपने स्पेस और अपनी आजादी को फिर से हासिल करने का है. यह वक्त सत्ता में उन लोगों को अंगूठा दिखाने का है, जिन्होंने हमें इस हालत में पहुंचा दिया. यह वक्त हमें अपने लिए और भारत की खातिर बोलने का है, न कि उनके पक्ष में बोलने का है, जो शासन में बैठे हैं. यह वक्त ऐसा नागरिक बनने का है, जो राजनेताओं के झांसे और गिरफ्त में नहीं आएं. यह वक्त एकजुट होने का है.

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