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कर्नाटक चुनाव बताता है कि राहुल गांधी को सीनियर नेताओं की जरूरत क्यों है

कर्नाटक चुनाव के नतीजों के बाद जोड़-तोड़ में जिस तरह कांग्रेस ने बाजी मारी है उससे पुराने कांग्रेसी दिग्गजों की अहमियत और ज्यादा बढ़ गई है

Syed Mojiz Imam Updated On: May 22, 2018 08:28 AM IST

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कर्नाटक चुनाव बताता है कि राहुल गांधी को सीनियर नेताओं की जरूरत क्यों है

कर्नाटक में कांग्रेस समर्थित जेडीएस सरकार बुधवार को कार्यभार संभालेगी. कांग्रेस ने चुनाव हारने के बाद ऐसा दांव खेला कि बीजेपी चारों खाने चित्त हो गयी है. जिस बीजेपी ने गोवा, मेघालय, मणिपुर में कांग्रेस को मात देकर सरकार बनाई थी. वही बीजेपी कर्नाटक जैसे बड़े राज्य की सत्ता हाथ में आने के बाद संभाल नहीं पाई है. दरअसल कांग्रेस ने इस बार ज्यादा मुस्तैदी दिखाई है. कांग्रेस के नेताओं ने बीजेपी को मौका नहीं दिया कि वो कोई चाल चल सके.

कांग्रेस के सीनियर नेताओं ने ऐसा जाल बुना कि बीजेपी के नेता उसमें उलझ गए. कई लोगों की रिकॉर्डिंग भी सार्वजनिक हो गयी लेकिन लड़ाई में दोनों पक्षों के बीच गुजरात एंगल को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. कांग्रेस की तरफ से पर्दे के पीछे की मोर्चेबंदी अहमद पटेल के पास थी. तो बीजेपी अमित शाह के इशारों पर काम कर रही थी. लेकिन अहमद पटेल एक बार अमित शाह पर फिर भारी पड़ गए हैं.

कांग्रेस की सीनियर टीम ने जिस तरह से पूरे मामले को मैनेज किया वो 2008 के बाद फिर से दिखाई दिया है. जब मनमोहन सिंह सरकार विश्वास मत हासिल कर रही थी. राहुल गांधी की अगुवाई में पार्टी के भीतर एक बदलाव किया जा रहा है. राहुल गांधी नौजवान नेताओं को अपनी टीम में शामिल कर रहे हैं. लेकिन 2019 के अहम चुनाव से पहले और बाद में भी राहुल गाधी को जोड़-तोड़ और गठबंधन की राजनीति के लिए सीनियर नेताओं पर निर्भर रहना पडे़गा. क्योंकि कर्नाटक से साबित हो गया है कि टीम सोनिया गांधी के पास इस तरह की राजनीति का अनुभव और ताकत दोनों है.

कांग्रेस के खेवनहार

कांग्रेस मे जोड-तोड़ में माहिर पुराने लोग ही हैं. नये लोगों को सीनियर नेताओं से सीखने की जरूरत है. कर्नाटक के नतीजे आने से पहले गुलाम नबी आज़ाद और अशोक गहलोत बेंगलुरु पहुंच गए थे. गुलाम नबी आजाद के सिद्धारमैया से रिश्ते काफी अच्छे हैं. जिसकी वजह से जब जेडीएस के समर्थन की बात आई तो सिद्धारमैया गुलाम नबी आजाद के सामने ना नुकुर नहीं कर पाए. वहीं अशोक गहलोत राजस्थान के दो बार मुख्यमंत्री रह चुके हैं. उनको पता था कि किस तरह से विधायकों को टूटने से बचाना है. इसलिए विधायक विश्वास मत के पहले तक बसों में सफर करते रहे. जिनसे उनसे संपर्क करना बीजेपी के लिए मुश्किल साबित हुआ. वहीं कांग्रेस के लिए अहमद पटेल अब भी मैन फ्राइडे हैं. जिन्होने दिल्ली से बेंगलुरु और चंडीगढ़ और पिंजोर तक मैनेजमेंट में कोई कसर नहीं छोड़ी है.

Rajya Sabha election

विधायकों को टूट से बचाने को लेकर, पार्टी के लीगल एक्सपर्ट्स तक को समय बद्ध तरीके से काम पर लगाया.वहीं एलांयस के साथियों से भी अहमद पटेल बात करते रहे है. ये सीनियर नेता राहुल गांधी के लिए 2019 में काम आ सकते हैं. हालांकि यही अहमद पटेल और कमलनाथ मेघालय में अमित शाह की चाल का जवाब नहीं दे पाए थे. ज़ाहिर है कि मेघालय में कॉनराड संगमा को कांग्रेस अपने पक्ष में नहीं कर पाई. क्योंकि कांग्रेस ने पहले नहीं सोचा कि ऐसा कर सकते हैं. इन सब के बीच कर्नाटक के तेज-तर्रार नेता डी.के. शिवकुमार का नाम उभर कर सामने आया है. जो कई बार कांग्रेस के लिए जोड़-तोड़ का काम बखूबी अंजाम दे चुके हैं.

डी.के शिवकुमार क्यों महत्वपूर्ण हैं

कांग्रेस की पूर्ववर्ती सरकार में डी.के. शिवकुमार ऊर्जा मंत्री थे. हालांकि मुख्यमंत्री से उनके रिश्ते बहुत अच्छे नहीं थे. लेकिन दिल्ली में आलाकमान में उनकी पकड़ मजबूत होने की वजह से सरकार में बने रहें. डी.के. शिवकुमार के राजनीति में अभिभावक के तौर पर एस.एम. कृष्णा थे. जो अब बीजेपी में हैं. लेकिन डी.के. शिवकुमार ने पार्टी नहीं छोड़ी और कांग्रेस के चुनाव में कैम्पेन कमेटी के प्रमुख थे. हालांकि डी.के. शिवकुमार के ऊपर भ्रष्टाचार के आरोप बीजेपी ने लगाए हैं. डी.के. शिवकुमार गुजरात में राज्यसभा के चुनाव के दौरान गुजरात के विधायकों की सफल मेहमाननवाज़ी कर चुके हैं.

इससे पहले विलास राव देशमुख सरकार बचाने में अहम भूमिका निभाई थी. कांग्रेस को बीजेपी के नेताओं को मात देने के लिए डी.के. शिवकुमार जैसे लोगों की हर राज्य में दरकार है, जो पार्टी के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार रहें. हालांकि डी.के. शिवकुमार को पहले गठबंधन से नाखुश बताया जा रहा था. लेकिन डी.के. शिवकुमार ने कहा, 'राहुल गांधी ने गठबंधन को लेकर फैसला किया है. देश को सेक्युलर राजनीति की आश्यकता है. इसलिए हमने सारी पुरानी बातें भुला दी हैं.'

DK Shivakumar

हालांकि डी.के. शिवकुमार सरकार के पांच साल पूरा होने के सवाल पर साफ जवाब नहीं दे रहे है. ज़ाहिर है कि कर्नाटक में आगे और सियासी हलचल देखने को मिल सकती है लेकिन कर्नाटक के बहाने कांग्रेस को ऐसा नेता मिला है जो दक्षिण के जोड़-तोड़ की राजनीति में माहिर है. दूसरे क्षेत्रीय दलों की राजनीति को समझता है. हालांकि कांग्रेस को ऐसे नेताओं को साथ रखने में मशक्कत करनी पड़ सकती है. बीजेपी की भी ऐसे दमखम वाले नेताओं पर नज़र हो सकती है. कांग्रेस के ही हथियार से बीजेपी ने नॉर्थ-ईस्ट में कांग्रेस को पटखनी दी है.

हेमंत बिस्वा सर्मा की वजह से नॉर्थ-ईस्ट बीजेपी के पास

कांग्रेस में असम के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के खास नेताओं मे से हेमंत बिस्वा सर्मा का नाम आता था. लेकिन दोनों के बीच विवाद बढ़ता गया. राहुल गांधी दोनों पक्षो के बीच विवाद नहीं सुलझा पाए. बीजेपी ने मौके की नजाकत को समझा और हेमंत बिस्वा सर्मा को अपने पाले में कर लिया. बीजेपी में जाते ही हेमंत बिस्वा सर्मा ने कांग्रेस की ताबूत में कील जड़ दी है. जो पूर्वोत्तर भारत कभी कांग्रेस का गढ़ हुआ करता था, वो बीजेपी का गढ़ बन गया.

असम ,त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय में देखते ही देखते बीजेपी की सरकारें बन गईं. कांग्रेस हेमंत को पार्टी में रोक ना पाने का खामियाजा भुगत रही है. कांग्रेस अपने नेताओं को पार्टी में बनाए रखने में जद्दोजहद करती रहेगी. सीनियर नेताओं को खुश करने के लिए राहुल गांधी ने अधिवेशन में भी कहा कि सभी वरिष्ठ नेताओं का सम्मान बरकरार रखा जाएगा.

2004 -2014 तक यूपीए की गठजोड़ की सरकार

सोनिया गांधी की इसी टीम ने 2004 से लेकर 2014 तक कांग्रेस की अगुवाई मे यूपीए की सरकार चलवाई है. 2008 में लेफ्ट के समर्थन वापस लेने के बाद भी सरकार पर कोई असर नहीं हुआ था. मनमोहन सिंह ने समाजवादी पार्टी के 38 सांसदों की बदौलत आसानी से विश्वास मत हासिल कर लिया था. जिसमें बीजेपी के कई सांसदों ने कांग्रेस यूपीए के पक्ष में वोट दिया था. बीजेपी के तब के सांसद एच.डी. सांगलियाना और ब्रजभूषण सिंह ने यूपीए का समर्थन कर दिया था. हालांकि इस दौरान कैश फॉर वोट का भी मामला संसद में उठा.

बीजेपी के सांसद अशोक अर्गल ने एक करोड़ रुपए ले जाकर स्पीकर के टेबल पर रख दिया था. हालांकि ये सब इतिहास की बात है. 2009 के चुनाव में फिर से यूपीए की वापसी हुई. सपा, बसपा एक-दूसरे के कट्टर विरोधी होने के बाद भी सरकार का समर्थन करते रहे.राष्ट्रपति चुनाव में भी बीजेपी के सहयोगी कांग्रेस उम्मीदवार का समर्थन करते रहे हैं.जाहिर है काग्रेस का ओल्ड गार्ड जोड़-तोड़ की राजनीति में बीजेपी से पीछे नहीं है, ये बात दीगर है कि जोड़-तोड़ के लिए भी कांग्रेस के पास आंकड़ा तो होना चाहिए.

जोड़-तोड़ की राजनीति के खिलाड़ी

pramod mahajan

अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार को अल्पमत की सरकार को बचाने के लिए प्रमोद महाजन का नाम लिया जाता है. उन्होंने सरकार चलाने मे अहम भूमिका निभाई. तमाम राजनीतिक दलों को बीजेपी के पक्ष में करने में माहिर खिलाड़ी थे. लेकिन एक पूर्व कांग्रेसी नेता भी अटल बिहारी के साथ थे. जिनका नाम आर. कुमार मंगलम था. वो भी जोड़-तोड़ की राजनीति के माहिर खिलाड़ी थे. 1991-1996 के बीच कांग्रेस की पी.वी. नरसिम्हाराव में भी जोड़-तोड़ के जरिए अपनी सरकार पूरे पांच साल चलाई. हालांकि जेएमएम के सांसदों को रिश्वत देने का आरोप उन पर लगा था. उस दौरान जितेन्द्र प्रसाद और राम लखन सिंह यादव ने जेएमएम सांसदों को कांग्रेस के पक्ष में रखने में अहम भूमिका अदा की थी.

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