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कर्नाटक चुनाव: क्या है राजनीति में 'हॉर्स ट्रेंडिंग' और कैसे शुरू हुआ?

FP Staff Updated On: May 17, 2018 04:31 PM IST

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कर्नाटक चुनाव: क्या है राजनीति में 'हॉर्स ट्रेंडिंग' और कैसे शुरू हुआ?

बीते 3 दिनों में कर्नाटक के राजनीतिक दंगल में एक के बाद एक कई उतार-चढ़ाव आए. बीजेपी, कांग्रेस और जेडी (एस) एक दूसरे को पटखनी देने में लगी थी. आखिरकार कांग्रेस और जेडी (एस) के गठबंधन के बावजूद बीजेपी के बीएस येदियुरप्पा ने कर्नाटक के 23वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली. इस रस्साकशी के बीच एक शब्द जो बार-बार अखबारों और ख़बरों की हेडलाइन बना रहा है, वो है 'हॉर्स ट्रेडिंग'. आपने भी कर्नाटक के चुनाव के संदर्भ में यह शब्द सुना या पढ़ा होगा.

'हॉर्स ट्रेडिंग' जिसका शाब्दिक अर्थ है 'घोड़ों की बिक्री'. लेकिन चुनावों में घोड़ों का क्या लेना-देना? दरअसल अब ये शब्द एक मुहावरे जैसा बन गया है जिसका मतलब कैंब्रिज डिक्शनरी के हिसाब से यह है.

'अनौपचारिक बातचीत जिसमें किसी भी दो पार्टियों के लोग ऐसी आपसी संधि करते हैं जहां दोनों का फायदा होता है.'

यह एक तल्ख किस्म की सौदेबाजी होती है क्योंकि दोनों ही पार्टियां इस कोशिश में रहती हैं ज्यादा से ज्यादा फायदा उन्हें हो जाए. इन सौदेबाजियों में कई बार कई तरह के धूर्त सौदे पेश किए जाते हैं और आखिरकार एक नतीजे पर ये दोनों पार्टियां पहुंच पाती हैं.

पॉलिटिक्स में क्या होती है 'हॉर्स ट्रेडिंग'

जब एक पार्टी विपक्ष में बैठे हुए कुछ सदस्यों को लाभ का लालच देते हुए अपने में मिलाने की कोशिश करती है, जहां यह लालच पद, पैसे या प्रतिष्ठा का हो सकता है, इस किस्म की विधायकों की खरीद फरोख्त को पॉलिटिक्स में हॉर्स ट्रेडिंग कहा जाता है.

ऐसा उन स्थिति में होता है जब किसी भी एक पार्टी को सरकार बनाने के लिए बहुमत न मिला हो और उसे बहुमत सिद्ध करने के लिए बाहर से मदद चाहिए. इस लटके हुए फैसले को अपने पक्ष में मोड़ने के लिए सभी पार्टियां यह कोशिश करती हैं कि किसी तरह से विपक्षी, निर्दलीय या अन्य छोटी पार्टियों के विधायक उन्हें समर्थन दे दें और उनकी सरकार बन जाए. इसके लिए साम-दाम-दंड-भेद का प्रयोग किया जाता है. चालाकी, पैसा, लाभ के पदों की वजह से यही हॉर्स ट्रेडिंग कहलाती है.

हालांकि कुछ लोग इसे 'चाणक्य-नीति' मानकर इसे राजनीति का एक जरूरी हिस्सा भी मानते हैं. राजनीति की यही उठापटक इसे दिलचस्प लेकिन कूटनीतिक बनाती है. कर्नाटक के चुनावों में इस शब्द का प्रयोग कांग्रेस ने बीजेपी के लिए किया है. कांग्रेस का आरोप है कि बीजेपी अब उनके कुछ विधायकों को अपने साथ मिलाने के लिए गंदी राजनीति खेल रही है.

फिलहाल कर्नाटक में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी बीजेपी के येदियुरप्पा ने 104 विधायकों के साथ मुख्यमंत्री की शपथ ली है. लेकिन जल्द ही उन्हें किसी भी तरीके से बहुमत साबित करना होता. यही कारण है बीजेपी जोड़-तोड़ में लगी हुई है.

इससे पहले गोवा चुनावों के समय कांग्रेस के दिग्विजय सिंह ने बीजेपी पर आरोप लगाया था कि केंद्रीय सत्ता वाली यह पार्टी कांग्रेस के विधायकों को पैसे, SUV गाड़ियों और पदों का लालच दे रही है. गोवा में वोटों की गिनती से ये साफ था कांग्रेस ने 17 सीटें और बीजेपी ने 13 सीटें जीती थीं. बीजेपी ने लोकल पार्टियों की मदद से बहुमत सिद्ध कर दिया और सरकार बना ली थी.

कहां से आया ये शब्द

इस शब्द का प्रयोग पहले वाकई में घोड़ों की खरीद फरोख्त के संदर्भ में ही होता था. करीब 1820 के आस-पास घोड़ों के व्यापारी अच्छी नस्ल के घोड़ों को खरीदने के लिए बहुत जुगाड़ और चालाकी का प्रयोग करते थे. व्यापार का यह तरीका कुछ इस तरह का था कि इसमें चालाकी, पैसा और आपसी फायदों के साथ घोड़ों को किसी के अस्तबल से खोलकर कहीं और बांध दिया जाता था.

 कब से होता है भारतीय पॉलिटिक्स में इसका प्रयोग

माना जाता है कि भारत की राजनीति में इस शब्द और संदर्भ का प्रयोग 1967 से होता चला आ रहा है. 1967 के चुनावों में हरियाणा के विधायक गया लाल ने 15 दिनों के अन्दर ही 3 बार पार्टी बदली थी. आखिरकार जब तीसरी बार में वो लौट कर कांग्रेस में आ गए तो कांग्रेस के नेता बिरेंद्र सिंह ने प्रेस कांफ्रेस में कहा था कि 'गया राम अब आया राम बन गए हैं.'

हालांकि भारत में इस दलबदली को रोकने के लिए कानून भी बनाया गया था. 1985 में राजीव गांधी ने संविधान के 52वें संशोधन में 'दल-बदल विरोधी कानून' पारित किया था. इसके हिसाब से विधायकों को अपनी पार्टी बदलने की वजह से पद से निष्कासित किया जा सकता है. फिलहाल कर्नाटक के मामले में इस कानून के हिसाब से किसी भी पार्टी के लोगों की संख्या उनकी पार्टी की कुल संख्या के दो-तिहाई से अधिक नहीं हो सकते. ऐसा होने पर सभी को अयोग्य ठहराया जा सकता है.

कहां-कहां हैं दल-बदल के खिलाफ कानून

ऐसा नहीं है कि सिर्फ भारत में ही दल-बदल के खिलाफ कानून बनाए गए हैं. राजनीति कहीं की भी हो, उसमें बहुत सी कूटनीति हर देश में पाई जाती है. लेकिन ऐसे विधायकों के खरीदने और उनके बिकने के किस्से पाए जाते हैं. कुछ देश हैं जिन्होंने भारत की ही तरह इससे निपटने के लिए कानून बनाए हैं. इन देशों में बांग्लादेश, दक्षिण अफ्रीका और केन्या जैसे विकासशील देश हैं. लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि ऐसा कोई भी कानून किसी विकसित देश जैसे कनाडा, फ्रांस, जर्मनी या यूके में नहीं है.

(न्यूज 18 से साभार)

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