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कर्नाटक चुनाव के मूड से क्यों नहीं करनी चाहिए 2019 की भविष्यवाणी

ऐसे हालात में जब वोटर अच्छे चुनावी नारों और सोशल मीडिया पर प्रचार के प्रभावित होता है, वैसे में राजनीति में एक साल का वक्त, लंबा, बहुत लंबा होता है

Updated On: Mar 30, 2018 01:52 PM IST

Ajay Singh Ajay Singh

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कर्नाटक चुनाव के मूड से क्यों नहीं करनी चाहिए 2019 की भविष्यवाणी

भारत में हर चुनाव अपने-आप में अनूठा होता है. हर चुनाव को लेकर कहा जा सकता है कि ये आगे की राजनीति की दशा-दिशा तय करेगा. हालांकि हकीकत ये है कि हर चुनाव पहले से चल रही राजनीति के समीकरण ही नए सिरे से तय करता है.

बहुत से लोग ये सोच रहे हैं कि 12 मई को होने वाले कर्नाटक विधानसभा के चुनाव, देश की राजनीति को नई दिशा देंगे. लेकिन, उनकी इस सोच को राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद बनने वाले समीकरण यकीनन झटका देंगे.

भारतीय वोटरों की फ्लैश मॉब वाली मानसिकता

अभी लोकसभा चुनाव एक साल दूर हैं. ऐसे में राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे, राजनैतिक विश्लेषकों को आने वाले सियासी समीकरण के संकेत दे सकते हैं. लेकिन, विधानसभा चुनाव के नतीजों के आधार पर राष्ट्रीय राजनीति की भविष्यवाणी करना खतरे से खाली नहीं. इन पर भरोसा इसलिए नहीं किया जा सकता क्योंकि भारतीय मतदाता ने पिछले कई चुनावों से फ्लैश मॉब वाली मानसिकता का मुजाहिरा किया है.

मसलन, राजस्थान में तीन उप-चुनावों में बीजेपी की हार के बाद बने नारे को ही लीजिए. 'रानी तेरी खैर नहीं, मोदी तुमसे बैर नहीं'. साफ है कि ये नारा किसी मीडिया सलाहकार या चुनाव एक्सपर्ट ने नहीं बनाया. ये नारा तो सोशल मीडिया पर सक्रिय आम लोगों ने खुद बनाया था. मतलब ये कि राजस्थान में वसुंधरा राजे के खिलाफ नाराजगी बहुत ज्यादा है.

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कर्नाटक के चुनावी मुद्दे

इसी तरह, कर्नाटक के चुनाव में कई मुद्दे अहम होंगे. कर्नाटक ने चतुर सियासी चाल चलते हुए कर्नाटक में चुनाव को स्थानीय मुद्दों पर लड़ने का फैसला किया है. कांग्रेस की कोशिश है कि वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व को सीधी चुनौती न दे. मुख्यमंत्री सिद्धारमैया शातिर सियासी खिलाड़ी हैं. इसीलिए उन्होंने चुनाव से महीनों पहले कन्नड़ उप-राष्ट्रवाद को हवा देनी शुरू कर दी थी. उन्होंने कर्नाटक के अलग झंडे को मंजूरी दी. उन्होंने ताकतवर लिंगायत समुदाय को अल्पसंख्यक समुदाय का दर्जा देने का कदम उठाया, ताकि उन्हें हिंदुत्व के मोर्चे से अलग कर सकें.

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कांग्रेस की ये सभी सियासी चालें, ऊपरी तौर पर तो बेहद शातिर और कारगर दिखती हैं. मगर, इसमें भी कोई दो राय नहीं कि सिद्धारमैया की सरकार के प्रति आम लोगों में काफी नाराजगी है. यूं तो वो बहुत माहिर राजनेता कहे जाते हैं. पर, सिद्धारमैया अच्छे प्रशासक नहीं माने जाते. राज्य की बिगड़ती कानून-व्यवस्था से लेकर बुनियादी ढांचे के विकास की धीमी रफ्तार जैसी कई शिकायतें उनकी सरकार से हैं. आप कर्नाटक का दौरा करें, तो, साफ दिखता है कि किसानों की बढ़ती परेशानियां और रोजगार बढ़ाने में नाकामी जैसे मसले सिद्धारमैया के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं. शायद यही वजह है कि चुनाव करीब देखकर वो जज्बाती मसले उठाकर अपने पक्ष में माहौल बनाना चाहते हैं.

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इसमें कोई दो राय नहीं कि भारतीय राजनीति में जज्बातों का बेहद अहम रोल होता है. लेकिन, कभी ऐसा नहीं हुआ कि जज्बातों ने हारते हुए नेता को जिताया हो. ऐसे में अगर सिद्धारमैया इस नियम के अपवाद के तौर पर अपनी कुर्सी बचा पाते हैं, तो उन्हें अपनी किस्मत को शुक्रिया कहना चाहिए. इसमें कोई शक नहीं कि सिद्धारमैया ने कर्नाटक के सियासी माहौल में ऐसे भंवर पैदा कर दिए हैं कि किसी के लिए भी साफ तस्वीर देख पाना मुश्किल हो रहा है. हालांकि इस धुंध से कर्नाटक के वोटर पर कोई असर नहीं पड़ने वाला. क्योंकि शायद उसने अब तक मन बना लिया है कि उसे किसे वोट देना है.

इन राज्यों में बीजेपी के लिए चुनौती

कर्नाटक के बाद राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में होने वाले चुनाव भी बेहद अहम होंगे. यहां बीजेपी के सामने अपनी सत्ता बचाने की चुनौती होगी. अगर, वोटर अपने राज्यों की सरकारों के काम-काज से नाराज होकर कोई फैसला लेने वाला हो, तो, इस बात की काफी संभावनाएं हैं कि राजस्थान और मध्य प्रदेश में बीजेपी अपनी जमीन गंवा सकती है. मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार और किसानों की बुरी हालत की खबरें लगातार फैल रही हैं. इनमें से कई खबरें सच हैं. इसी तरह वसुंधरा राजे सरकार के खिलाफ राजस्थान के लोगों में किस कदर नाराजगी है, ये बात हाल के उप-चुनाव के नतीजों से साफ दिखी.

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हर लिहाज से लोकसभा चुनाव से पहले तमाम राज्यों के विधानसभा चुनावों के अलग-अलग नतीजे आने की संभावना है. लेकिन, इन अलग-अलग विधानसभाओं के नतीजों से 2019 के आम चुनाव को लेकर कोई साफ तस्वीर बना पाना बेहद मुश्किल है. ज्यादातर राज्यों में चुनाव स्थानीय नेताओं के कामकाज पर लड़ा जाएगा. ज्यादातर विधानसभा चुनाव या उप-चुनाव स्थानीय मुद्दों पर लड़े जाते हैं. इन पर राष्ट्रीय मुद्दों का ज्यादा असर नहीं होता.

राज्यों के चुनावों से राष्ट्रीय चुनावों के नतीजे नहीं निकाले जा सकते

देश के राजनैतिक इतिहास में ये बात बार-बार साबित हुई है. जैसे कि 1960 के दशक में कई राज्यों में कांग्रेस के प्रति नाराजगी की वजह से पार्टी को सत्ता गंवानी पड़ी थी. फिर भी इंदिरा गांधी ने 1971 के लोकसभा चुनाव में शानदार जीत हासिल की थी. इसी तरह 2012 में बीजेपी भी यूपी के विधानसभा चुनाव में बुरी तरह पिटी थी. लेकिन पार्टी और उसके सहयोगियों ने 2014 के लोकसभा चुनाव में यूपी की 80 में से 73 सीटें जीती थीं.

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वहीं 2014 के लोकसभा चुनाव में बिहार में बीजेपी ने 40 में से 31 सीटें जीती थीं. लेकिन, एक साल बाद ही पार्टी विधानसभा का चुनाव हार गई थी. बीजेपी का यही हाल दिल्ली में भी हुआ था, जहां पार्टी ने 2014 में सभी 7 लोकसभा सीटें जीत ली थीं. मगर बाद में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी बुरी तरह हार गई थी. लोकसभा के चुनाव राज्यों के चुनाव से एकदम अलग होते हैं.

राज्यों के चुनाव में जहां स्थानीय मुद्दे हावी होंगे, वहीं 2019 के आम चुनाव में मोदी का व्यक्तित्व सबसे बड़ा फैक्टर होगा. लोकसभा चुनाव में मोदी सरकार के काम-काज, उसकी विश्वसनीयता और शानदार सियासी मैनेजमेंट का इम्तिहान होगा. मोदी के मुकाबले विपक्षी दल अभी भी एक साथ आने की कोशिश ही कर रहे हैं. पुराने तजुर्बों को देखें, तो मोदी अक्सर बेहद मुश्किल हालात में भी अपने हक में माहौल बनाने में कामयाब रहते आए हैं. ऐसे हालात में जब वोटर अच्छे चुनावी नारों और सोशल मीडिया पर प्रचार के प्रभावित होता है, वैसे में राजनीति में एक साल का वक्त, लंबा, बहुत लंबा होता है.

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