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इंदिरा और सोनिया की तरह क्या निंदा मंथन से सत्ता का अमृत निकाल पाएंगे राहुल?

इंदिरा ही नहीं राहुल गांधी की तरह उनके पिता राजीव गांधी और मां सोनिया गांधी को भी कांग्रेस अध्यक्ष बनने पर विपक्ष के व्यंग्य बाणों का ऐसे ही सामना करना पड़ा था

Anant Mittal Updated On: May 11, 2018 10:20 AM IST

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इंदिरा और सोनिया की तरह क्या निंदा मंथन से सत्ता का अमृत निकाल पाएंगे राहुल?

प्रधानमंत्री बनने के सवाल पर राहुल गांधी ने हामी क्या भरी मानो प्याले में तूफान आ गया. बीजेपी और पीएम नरेंद्र मोदी ने इस बात पर जिस तरह राहुल का मजाक उड़ाया उसने 1966 में पहली बार प्रधानमंत्री बनीं इंदिरा गांधी पर विपक्षी हमलों की याद करा दी.

इंदिरा को भी झेलनी पड़ी थी चारों ओर से आलोचनाएं

इंदिरा गांधी जब प्रधानमंत्री बनीं तब संसद में उनके सामने प्रखर समाजवादी राममनोहर लोहिया से लेकर कानपुर के मजदूर नेता एस एम बनर्जी, हीरेन मुखर्जी, इंद्रजीत गुप्त, युवा दलित नेता बुद्धप्रिय मौर्य, त्रिदिब चौधरी, दशरथ देब, रिशांग कीशिंग, अशोक मेहता, मीनू मसानी, प्रकाशवीर शास्त्री, किशन पटनायक, मनीराम बागड़ी,जयपुर की पूर्व रानी गायत्री देवी, नाथ पै, होमी दाजी, एच वी कामथ, पी के वासुदेवन नायर, ए के गोपालन,बलराज मधोक, अटल बिहारी वाजपेयी आदि धाकड़ नेता विपक्ष में बैठते थे.

इंदिरा को संसद पहुंचे तब तक जुम्मा-जुम्मा चार दिन ही हुए थे. वे जब सदन में बोलने खड़ी होतीं तो घबराहट के मारे उनकी जुबान तालू से चिपक जाती. हाथ कांपने लगते और उनकी घिग्घी बंधी देखकर विपक्षी नेता उन्हें 'गूंगी गुड़िया' तक कह डालते थे. उनकी मुश्किल यह थी कि आज बीजेपी सांसद जिस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थन में खड़े होकर संसद सिर पर उठा लेते हैं तब सदन में मौजूद कांग्रेस के सिंडीकेट वाले बुजुर्ग नेता खीसें निपोरते रहते थे. इस प्रकार सिंडीकेट तब सदन में लगभग विपक्षियों का साथ देता ही प्रतीत होता था.

संजय गांधी और राजीव गांधी के साथ इंदिरा गांधी

संजय गांधी और राजीव गांधी के साथ इंदिरा गांधी

इंदिरा को यूं भी तब कांग्रेस पर हावी बुजुर्ग नेताओं के सिंडीकेट ने मोरारजी देसाई के दावे को दरकिनार करके मजबूरी में प्रधानमंत्री बनाया था. तब कांग्रेस पर के कामराज, एस निजलिंगप्पा, वी पी नाइक, मोरारजी देसाई आदि क्षत्रपों का राज था. उन्होंने इंदिरा को तब महज नेहरू की वोटबटोरू वारिस और अपने हाथों की कठपुतली बनाए रखने की सोचकर प्रधानमंत्री बनाया था.

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1967 में बनाई सरकार और फिर पीछे नहीं देखा

चीन से युद्ध हारने और फिर 1965 में पाकिस्तान से युद्ध के बाद देश में अनाज की किल्लत, महंगाई और बेरोजगारी का बोलबाला था. साल 1991 की तरह 1966 में भी विदेशी मुद्रा का संकट इतना गहरा गया था कि भारत सरकार को विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से कर्ज लेना पड़ा था. विपक्ष ने उसे देश को गिरवी रखना बताकर देश भर में जबरदस्त आंदोलन छेड़ रखा था. राजनीतिक माहौल इतना बिगड़ चुका था कि 1967 के आम चुनाव में जीतने के बावजूद कांग्रेस का विधानसभा चुनाव में आजादी के बाद पहली नौ राज्यों से सफाया हो गया था.

ऐसे हालात में इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने से कांग्रेस भले ही 1967 में केंद्र सरकार बनाने में कामयाब रही मगर विपक्ष उन पर पूरी तरह हावी था. उसमें मर्दाना पूर्वाग्रह का भी हाथ रहा और इंदिरा को विपक्ष ने नाकों चने चबवा दिए. इसके बावजूद क्रांति की बेटी से गूंगी गुड़िया, देवी ओर फिर तानाशाह एवं शहीद का दर्जा पाने वाली इंदिरा ने हथियार नहीं डाले और 1967 के आम चुनाव में धुआंधार प्रचार के बूते केंद्र में कांग्रेस की सरकार बनाने में कामयाब रहीं. उसके बाद इंदिरा ने मुड़कर नहीं देखा और 1969 में वी वी गिरि को राष्ट्रपति चुनवाकर उन्होंने कांग्रेस तोड़ दी. उसके साथ ही इंदिरा गांधी सत्ता की सीढ़ियां चढ़ती चली गईं.

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राजीव गांधी और सोनिया गांधी के लिए भी आसान नहीं थी राह

इंदिरा ही नहीं राहुल गांधी की तरह उनके पिता राजीव गांधी और मां सोनिया गांधी को भी कांग्रेस अध्यक्ष बनने पर विपक्ष के व्यंग्य बाणों का ऐसे ही सामना करना पड़ा था. विमान चालक से नेता बने राजीव गांधी जाहिर है कि भाषण कला में अपने बेटे राहुल की तरह ही कमजोर थे. वे बात-बात पर 'हमें देखना है', 'हम देखेंगे' 'हम देख रहे हैं' दोहराया करते थे. इस वजह से संसद के भीतर वाजपेयी आदि नेता उनका मजाक उड़ाने से बाज नहीं आते थे. यह बात दीगर है कि इंदिरा गांधी की हत्या और सिख विरोधी दंगों की पृष्ठभूमि में हुए 1984 के आम चुनाव में कांग्रेस के पक्ष में सहानुभूति लहर ने अटलबिहारी वाजपेयी, चंद्रशेखर, हेमवतीनंदन बहुगुणा जैसे तमाम दिग्गजों को चुनाव में धूल चटा दी थी. वाजपेयी बाद में राज्य सभा में पहुंचे थे.

sitaram kesri sonia gandhi

सोनिया गांधी को भी अपने विदेशी मूल, खराब हिंदी उच्चारण, लिखा भाषण पढ़ने आदि कमियों के लिए लंबे समय तक विरोधी नेताओं और पार्टियों के मजाक का निशाना बनना पड़ा. प्रधानमंत्री मोदी तो उनके विदेशी मूल पर तंज करने का अब भी कोई मौका नहीं चूकते. वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए की छह साल लंबी सरकार के दौर में सोनिया गांधी को सदन में तमाम व्यंग्य बाणों और तोहमतों का सैलाब झेलना पड़ा. वाजपेयी की निर्वाचित सरकार 1999 में गिराने और फिर वैकल्पिक सरकार बनाने में नाकाम रहने की राजनीतिक लिहाज से बचकानी हरकत कर चुकीं सोनिया गांधी को अपना मुंह सिलकर तमाम आलोचना झेलनी पड़ती थी.

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2004 में फिर सोनिया ने पलटी बाजी

साल 2004 का आम चुनाव तो वाजपेयी सरकार की शानदार उपलब्धियों के बावजूद न जाने बीजेपी ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल को ही मुद्दा बनाकर लड़ा. उसके बावजूद देश ने उसे नकार दिया. लोकसभा में सोनिया के नेतृत्व में कांग्रेस सबसे बड़ा दल निर्वाचित हुआ और कम्युनिस्टों के बाहरी समर्थन से यूपीए-1 सरकार बन गई. उसके बाद जाहिर है कि सोनिया गांधी को भी पीछे मुड़कर नहीं देखना पड़ा. हाल में कर्नाटक विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान और उससे पहले कांग्रेस महाधिवेशन में सोनिया अपने भाषण में केंद्र की बीजेपी सरकार और उसके मुखिया की कड़ाई से निंदा करने से बाज नहीं आईं.

राहुल भी दे रहे हैं वही परीक्षा

उनके बाद कांग्रेस अध्यक्ष बने राहुल गांधी को भी अपनी दादी इंदिरा गांधी और मां सोनिया गांधी की तरह कड़ी राजनीतिक परीक्षा से गुजरना पड़ रहा है. उनके कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद उनकी कमान में पार्टी यह दूसरा विधानसभा चुनाव लड़ रही है. इससे पहले राहुल ने तमाम तरह की खिल्ली को दरकिनार करके गुजरात का विधानसभा चुनाव भी कांग्रेस के लिए डटकर लड़ा. वहां पार्टी की विधानसभा में सीटें 25 फीसद से ज्यादा बढ़वाने में कामयाबी के बावजूद चुनाव नहीं जीत पाए. अब कर्नाटक में भी अपने मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के साथ राहुल पूरा जोर लगाए हुए हैं और देखना यही है कि तमाम विरोध और व्यंग्य के बावजूद राज्य की जनता उनके नेतृत्व पर मुहर लगाएगी अथवा नहीं.

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गौरतलब है कि आपातकाल के बाद 1977 के आम चुनाव में आजादी के बाद पहली बार कांग्रेस के सत्ता से बेदखल होने पर इंदिरा गांधी का राजनीतिक पुनर्वास कर्नाटक की जनता ने ही चिकमगलूर से उन्हें उपचुनाव जिताकर किया था. राहुल अपनी सभाओं में कर्नाटक की जनता को अपने परिवार पर उनका यह अहसान याद दिलाकर फिर से कांग्रेस को जिताकर उसे संजीवनी देने की गुजारिश कर चुके हैं. यह बात दीगर है कि इंदिरा गांधी के तो राहुल पासंग भी नहीं हैं मगर कांग्रेस आज भी उन्हीं के रास्ते पर है. कांग्रेस पर इंदिरा और उनके दिवंगत बेटे संजय गांधी के छांटे हुए कमलनाथ, गुलाम नबी आजाद, पी चिदंबरम, अशोक गहलोत, आनंद शर्मा आदि नेताओं का ही वर्चस्व है. देखना यही है कि प्रधानमंत्री पद पर दावेदारी जताने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना को राहुल गांधी अपनी दादी इंदिरा की तरह डटकर 2019 के आम चुनाव में उन्हें चुनौती देकर सत्ता पाने में कामयाब रहेंगे अथवा जनता उन्हें और लंबा इंतजार कराएगी.

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