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कर्नाटक चुनाव: पीएम ने खारिज किए ओपिनियन पोल्स, पूर्ण बहुमत के लिए लड़ने की सलाह

अभी की स्थिति में साफ-साफ यह बताना तो मुश्किल है कि सूबे में चुनाव के नतीजे क्या रहेंगे लेकिन एक बात तय है कि चुनाव में कांटे की लड़ाई होनी है

Updated On: Apr 27, 2018 11:14 AM IST

Sanjay Singh

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कर्नाटक चुनाव: पीएम ने खारिज किए ओपिनियन पोल्स, पूर्ण बहुमत के लिए लड़ने की सलाह
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नरेंद्र मोदी ‘ओपिनियन पोल’ के फैन कभी नहीं रहे. सभी चुनावों में राजनीतिक पंडितों के पूर्वानुमान और ओपिनियन पोल प्रचार-अभियान की उनकी रैलियों में मजाक का विषय बनते आए हैं. कर्नाटक का चुनाव इसका अपवाद नहीं हो सकता. लेकिन एक बात कर्नाटक के चुनाव को और भी ज्यादा दिलचस्प बना रही है- बात यह कि अभी मोदी ने बीजेपी के प्रचार के लिए कर्नाटक की जमीन पर अपने पांव नहीं रखे हैं तो भी उन्होंने अलग-अलग एजेंसियों और मीडिया हाऊस के ओपिनियन पोल को आड़े हाथों लेते हुए यह दावा किया है कि कर्नाटक में त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति नहीं होने जा रही और 15 मई के दिन जनादेश एकदम साफ होगा कि अगले पांच सालों के लिए सूबों में किस पार्टी की सरकार बनने जा रही है.

कर्नाटक में मोदी की पहली चुनावी रैली 1 मई के दिन होगी यानी इसमें अभी पांच दिनों की देरी है और 12 मई को होने वाले चुनावों में लोगों का मत अपनी तरफ मोड़ने के लिहाज से उनके पास ज्यादा वक्त नहीं होगा. चुनाव-प्रचार के लिए मोदी के कर्नाटक पहुंचने के वक्त तक नामांकन प्रक्रिया को बंद हुए हफ्ता भर हो चुका होगा. सूबे की पार्टी इकाई की मुराद तो यही होगी कि मोदी चुनाव-प्रचार कुछ पहले से शुरू करते लेकिन फिलहाल मोदी दिल्ली और बाकी जगहों के काम में बहुत ज्यादा व्यस्त हैं, जिसमें विदेश का दौरा भी शामिल है.

चीन जाने से दो घंटे पहले गुरुवार के रोज उन्होंने सूबे के पार्टी कार्यकर्ताओं से जुड़ने के लिए उपलब्ध विकल्पों में से एक मोबाइल टेक्नोलॉजी का बेहतर इस्तेमाल करते हुए उनसे पार्टी के एजेंडे पर बात की और कार्यकर्ताओं को वो मुद्दे बताए जिसके सहारे वे कांग्रेस और जनता दल(सेक्युलर) जैसे विरोधी दलों को चुनौती दे सकते हैं. उन्होंने कार्यकर्ताओं से पार्टी की मजबूती और विरोधी दलों की कमजोरियों पर बात करते हुए बताया कि गुमराह करने वाली जो सूचनाएं कांग्रेस फैला रही है उसकी काट कैसे की जा सकती है.

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2004 में बनी थी त्रिशंकु विधानसभा की हालत

मोदी का यह कहना सही जान पड़ता है कि कर्नाटक के मतदाता एक ना एक पार्टी की तरफ अपना मन निर्णायक रुप से बनाकर वोट करेंगे और त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति पैदा नहीं होगी. कर्नाटक में पिछली दफे त्रिशंकु विधानसभा की हालत 2004 में बनी थी. तब बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी और उसे 79 सीटें मिली थीं, कांग्रेस को 65 सीट और जनता दल(सेक्यूलर) को 58 सीटों पर जीत हासिल हुई थी. इसके बाद से राज्य में मतदाताओं ने पहले बीजेपी फिर कांग्रेस के पक्ष में निर्णायक रुप से मतदान किया है.

bjp vs congress

चुनावी एतबार से उत्तर भारत के सबसे बड़े राज्य उत्तरप्रदेश में पिछली दफे 2002 में त्रिशंकु विधानसभा के हालात बने. तब समाजवादी पार्टी सबसे बड़े दल के रूप में उभरी और 403 सीटों वाली यूपी विधानसभा में उसे 143 सीटें हासिल हुई थीं. बीएसपी सीटों के मामले में दूसरे स्थान पर रही और बीजेपी तीसरे स्थान पर. साल 2007, 2012 तथा 2017 में उत्तरप्रदेश में बीएसपी, एसपी तथा बीजेपी को स्पष्ट जनादेश मिला.

हालांकि छोटे राज्यों में जहां विधानसभा 40 से 60 सीटों के बीच सिमटी हुई है, त्रिशंकु विधानसभा के हालात बनते रहे हैं. ऐसे राज्यों में गोवा, मणिपुर, मेघालय तथा अन्य राज्यों के नाम लिए जा सकते हैं लेकिन किसी भी बड़े राज्य या सीटों के मामले में मंझोले आकार के राज्य में बीते डेढ़ दशक में त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति नहीं बनी है.

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दलील दी जा सकती है कि साल 2014 के अक्तूबर में महाराष्ट्र में कोई भी पार्टी निर्णायक तौर पर विजेता बनकर नहीं उभरी थी लेकिन तब सीटों पर हासिल हुई जीत के एतबार से सोचें तो मतदाताओं का रुझान एकदम ही जाहिर था. मतदाताओं ने 288 सीटों वाली महाराष्ट्र विधानसभा के लिए बीजेपी के 122 उम्मीदवारों को जीत दिलायी थी. इस वक्त बीजेपी सूबे में 25 सालों के बाद अकेले अपने बूते चुनावी मैदान में उतरी थी और 2009 के चुनावों में उसके 49 उम्मीदवार जीते थे. जाहिर है, 2014 के चुनावों मे बीजेपी को 76 सीटों की बढ़त हासिल हुई. शिवसेना भी अपने बूते चुनावी मैदान में उतरी थी और उसे 63 सीटें हासिल हुई जबकि पिछले (2009) चुनाव में उसके खाते में 45 सीटें आयी थीं.

इस तरह 2014 के चुनावों में शिवसेना के खाते में 18 सीटों की बढ़त हुई. सूबे में कांग्रेस ने पूरे 10 साल तक एनसीपी के साथ मिलकर शासन किया और कांग्रेस को भारी हार का सामना करना पड़ा. उसकी सीटें एकबारगी 82 से घटकर 42 पर पहुंच गईं. चुनाव के नतीजे बता रहे थे कि ढाई दशक तक संग-साथ रहने वाले बीजेपी और शिवसेना को ही मतदाताओं ने अपनी पसंद के तौर पर चुना है भले ही इन दोनों दलों ने चुनाव इक्कट्ठे होकर ना लड़ा हो. मतदाताओं को उम्मीद थी कि ये दो दल सरकार बनाने के लिए आपस में हाथ मिलाएंगे.

इस पर मोदी का क्या कहना है

अब जरा ये देखें कि मौजूदा माहौल में कर्नाटक के बारे में मोदी का क्या कहना है. उन्होंने कहा, 'ये अब हंग असेम्बली की नई चर्चा शुरु कर रहे हैं. ये झूठ है. नतीजे आने तक 2014 में कहा कि हंग पार्लियामेंट आयेगी. आप पूर्ण बहुमत की वकालत कीजिए. कर्नाटक का भाग्य बदलने के लिए पूर्ण बहुमत की सरकार चाहिए. ये षड़यंत्र चलाया जा रहा है.'

narendra modi on namo app

इसके बाद मोदी ने राजनीतिक पंडितों, तथाकथित पर्यवेक्षकों (आब्जर्वर्स) और सियासी विरोधियों पर करारा हमला बोला. मोदी यह संदेश देना चाहते थे कि भले ही मुकाबला बीजेपी, कांग्रेस तथा जनता दल(सेक्युलर) के बीच में होने से त्रिकोणीय हो लेकिन यह मुकाबला सीधे-सीधे बीजेपी और कांग्रेस के बीच होना चाहिए और इस सूरत में बीजेपी ही मतदाताओं की पसंदीदा पार्टी बनकर उभरेगी.

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अभी की स्थिति में साफ-साफ यह बताना तो मुश्किल है कि सूबे में चुनाव के नतीजे क्या रहेंगे लेकिन एक बात तय है कि चुनाव में कांटे की लड़ाई होनी है.

टाइम्स नाऊ-वीएमआर के सर्वे में कांटे की टक्कर का पूर्वानुमान लगाया गया है. इसके मुताबिक कांग्रेस को बीजेपी पर बस कुछ ही सीटों की बढ़त हासिल है. सर्वे में कांग्रेस को 91 सीटें मिलनी की बात कही गई है जबकि बीजेपी को 89 सीटें. इस सर्वे में जेडी(एस) को 40 सीटों पर जीत मिलने की बात कही गई है यानि जेडीएस किंगमेकर की भूमिका में उभर सकता है.

टीवी9-सीवोटर तथा इंडिया टुडे-कार्वी ओपीनियन पोल में भी त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति बतायी गई है. सी-फोर का पूर्वानुमान है कि कांग्रेस 2013 की तुलना में कहीं ज्यादा भारी अंतर से जीतने जा रही है. किसी भी ओपिनियन पोल में बीजेपी को साफ-साफ जीत मिलने की बात नहीं कही गई है.

मोदी ने ओपिनियन पोल और चुनाव के नतीजों के बारे में जो कुछ कहा है उसके बारे में बीजेपी के नेता अब विस्तार से अपनी बात रख रहे हैं और तुलना के तौर पर बता रहे हैं कि यूपी में भी किसी ओपिनियन पोल ने ये नहीं कहा था कि जीत बीजेपी की होने जा रही है.

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