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कर्नाटक चुनाव 2018: सिद्धारमैया के लिए चामुंडेश्वरी सीट जीतना क्यों है जरूरी?

वरुणा सीट से विधानसभा का चुनाव लड़ रहे यतींद्र को भी अपने पिता सिद्धारमैया की मदद की जरूरत होगी, क्योंकि बीजेपी ने भी इस सीट को बेहद अहम बना दिया है

T S Sudhir Updated On: Apr 09, 2018 07:35 PM IST

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कर्नाटक चुनाव 2018: सिद्धारमैया के लिए चामुंडेश्वरी सीट जीतना क्यों है जरूरी?

कर्नाटक के मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता सिद्धारमैया का चामुंडेश्वरी विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने का फैसला आग से खेलने जैसा राजनीतिक दांव कहा जा सकता है. दरअसल, मैसूर के अपने पुराने विधानसभा क्षेत्र में उनकी वापसी हुई है, जहां से वह पांच बार विधायक का चुनाव जीत चुके हैं. जबकि दो बार उन्हें हार का भी सामना करना पड़ा.

इन तमाम जीतों में सबसे कम अंतर से जीत 2006 के उपचुनाव में हुई थी. उस वक्त उन्होंने महज 257 वोटों के अंतर से जेडी(एस)-बीजेपी के संयुक्त उम्मीदवार के खिलाफ जीत हासिल की थी. एक तरह से कहें तो यह उनकी खुशकिस्मती रही कि वह कम अंतर से भी यह चुनाव जीत गए.

क्यों खास है यह चुनाव क्षेत्र?

साल 2004 में लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों के परिसीमन के बाद चामुंडेश्वरी विधानसभा के कुछ हिस्से वरुणा विधानसभा क्षेत्र में चले गए. सिद्धारमैया ने 2008 और 2013 के विधानसभा चुनाव चामुंडेश्वरी विधानसभा के नजदीक मौजूद वरुणा सीट से जीत हासिल की.

बहरहाल, वह अपने बेटे यतींद्र को चुनावी राजनीति में लाना चाहते थे. लिहाजा उन्होंने खुद के लिए बेहद सुरक्षित मानी जानी वाली वरुणा सीट को छोड़कर चामुंडेश्वरी विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने का जोखिम उठाया है. इस विधानसभा क्षेत्र में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के खिलाफ काफी चुनौतियां हैं.

इस विधानसभा क्षेत्र का नाम पहाड़ की चोटी पर मौजूद देवी चामुंडेश्वरी के नाम पर है. इन्हें मैसूर की प्रमुख देवी माना जाता है. सिद्धारमैया इस विधानसभा सीट पर जेडी(एस) के जीटी देवगौड़ा के खिलाफ चुनाव लड़ेंगे. गौड़ा इस सीट से मौजूदा विधायक हैं और वह एक जमाने में मुख्यमंत्री के बेहद करीबी सहयोगी हुआ करते थे.

क्या है सिद्धारमैया का इरादा?

दरअसल, सिद्धारमैया अपने पुराने विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने के फैसले को एक चैंपियन की घर वापसी के तौर पर पेश करना चाहते हैं. हालांकि, राजनीतिक हलकों में इस विधानसभा चुनाव को उनकी 10वीं और आखिरी चुनावी लड़ाई भी माना जा रहा है.

बहरहाल, गौड़ा भी अपनी तरफ से कोई कोर-कसर छोड़ नहीं रहे हैं. सिद्धारमैया के इस सीट से चुनाव लड़ने के फैसले को गौड़ा बिल्कुल अलग तरीके से प्रचारित कर रहे हैं. उनके मुताबिक, 2006 के चुनाव में जीत के बाद सिद्धारमैया के दिल की धड़कन बढ़ गई और उन्होंने वरुणा सीट के लिए चामुंडेश्वरी विधानसभा क्षेत्र को 'छोड़' दिया. यह भी कहा जा रहा है कि चामुंडेश्वरी सीट से चुनाव लड़कर सिद्धारमैया झंझट में फंस गए हैं.

कुमारस्वामी की चुनौती या पुत्र प्रेम का मामला?

कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी ने सिद्धारमैया को चुनौती देते हुए कहा था कि वह (सिद्धारमैया) मैसूर में सुरक्षित सीट चुनने के बजाय चामुंडेश्वरी विधानसभा सीट से चुनाव लड़कर दिखाएं. सिद्धारमैया ने अपनी पुरानी पार्टी की चुनौती को स्वीकार करते हुए इस बार चामुंडेश्वरी विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने का फैसला किया.

चूंकि, सिद्धारमैया के खिलाफ जेडी(एस) और बीजेपी दोनों पार्टियों ने जोरशोर से अभियान छेड़ रखा है, लिहाजा इस बात की प्रबल संभावना है कि मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की हार सुनिश्चित करने के लिए कर्नाटक की ये दोनों विपक्षी पार्टियां खास रणनीति के तहत तालमेल कर परोक्ष रूप से एकजुट हो जाएं.

क्या होगा बीजेपी का?

कर्नाटक के इस हिस्से में (मैसूर इलाके में) बीजेपी मजबूत खिलाड़ी नहीं है. साथ ही, पार्टी ने अब तक इस विधानसभा क्षेत्र से कभी जीत भी हासिल नहीं की है. कुमारस्वामी ने सिद्धारमैया पर हमले तेज करते हुए दावा किया है कि खुफिया रिपोर्ट में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के चुनाव हार जाने का अंदेशा जताया गया है.

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

इस सीट पर जीटी देवगौड़ा के उम्मीदवार होने के कारण जाहिर तौर पर सिद्धारमैया का असली मुकाबला अपने हमनाम एच. डी. देवगौड़ा और उनके परिवार से है. यह चुनावी मुकाबला एक तरह से निजी भी जाता है, क्योंकि 2006 में जब सिद्धारमैया ने उपचुनाव में जीत हासिल की थी, तो उस वक्त कुमारस्वामी कर्नाटक के मुख्यमंत्री थे और वह जेडी(एस)-बीजेपी गठबंधन सरकार का नेतृत्व कर रहे थे.

कुमारस्वामी ने उस वक्त सिद्धारमैया को हराने के लिए चुनाव प्रचार में एंड़ी-चोटी का जोर लगाय दिया था. दरअसल, चुनाव के इस नतीजे को इस संबंध में एक तरह का संकेत माना जा रहा था कि एचडी देवगौड़ा का वास्तविक राजनीतिक उत्तराधिकारी कौन है.

जातीय समीकरणों के कारण कांटे का हो सकता है मुकाबला

सिद्धारमैया के एक और प्रतिद्वंद्वी और आलोचक श्रीनिवास प्रसाद भी इस विधानसभा सीट से मुख्यमंत्री की हार देखना पसंद करेंगे. प्रसाद कभी सिद्धारमैया की कैबिनेट में मंत्री हुआ करते थे. वह कर्नाटक की कांग्रेस सरकार में कैबिनेट स्तर के मंत्री (राजस्व) थे. दो साल पहले उन्हें अपमानजनक तरीके से मंत्री पद से हटा दिया गया था. इस सीनियर दलित नेता को सिद्धारमैया से कई तरह से अपना बदला चुकाना है.

दरअसल, 2017 में मैसूर जिले के नांजागुड़ में हुए उपचुनाव में प्रसाद की हार सुनिश्चित करने में भी सिद्धारमैया ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी. कांग्रेस का दामन छोड़ने के बाद प्रसाद ने नांजागुड़ विधानसभा सीट से बीजेपी उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा था.

चामुंडेश्वरी विधानसभा सीट पर जातीय समीकरणों के कारण मुकाबला काफी कड़ा हो गया है. इस सीट के कुल 2.5 लाख वोटरों में 70,000 से भी ज्यादा वोटर वोक्कालिगा (गौड़ा के समुदाय) समुदाय से हैं. ओबीसी, दलित और मुसलमान वोटरों की संख्या तकरीबन 1.2 लाख है. सिद्धारमैया कुरुबा जाति (ओबीसी) से ताल्लुक रखते हैं. इस विधानसभा क्षेत्र में लिंगायत वोटरों की संख्या 30,000 है. सिद्धारमैया को उम्मीद है कि लिंगायत समुदाय को अलग धर्म का दर्जा दिए जाने का उनकी सरकार का फैसला इस समुदाय को कांग्रेस पार्टी और उनकी तरफ आकर्षित करने में काफी मददगार साबित होगा.

क्या है चामुंडेश्वरी सीट का इतिहास?

इस विधानसभा सीट का इतिहास भी थोड़ा सा दिलचस्प है. बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) ने 2004 में इस विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा था और उसे 9,700 वोट मिले थे. सिद्धारमैया के लिए खुशकिस्मती की बात यह रही कि दो साल बाद इस सीट पर हुए उपचुनाव में पार्टी ने चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया.

इसी वजह से सिद्धारमैया को राजनीति में फिर से जीवनदान मिलने में बीएसपी की भी भूमिका मानी जाती है. अगर सिद्धारमैया 257 वोट के अंतर से जीत हासिल नहीं करते, तो शायद वह राजनीतिक निर्वासन में चले जाते. अब चूंकि बीएसपी और जेडी(एस) का चुनावी गठबंधन है, लिहाजा दलित वोट इस बार विधानसभा चुनाव में निर्णायक पहलू साबित हो सकता है.

सिद्धारमैया उस वक्त जेडी(एस) से बाहर निकल चुके थे और कांग्रेस में ऊंचे स्तर पर अपनी जगह बनाने की कोशिश में जुटे थे. अब वह मुख्यमंत्री के तौर पर चामुंडेश्वरी लौट चुके हैं और वोटर उन फायदों की तरफ देखेंगे, जो इस विधानसभा सीट पर उनकी नुमाइंदगी के कारण उन्हें मिल सकता है.

दलील दी जा रही है कि जब विकल्प सिद्धारमैया और जीटी देवगौड़ा के बीच है, तो मुमकिन है कि जाति का मामला ज्यादा मायने नहीं रखे. क्योंकि अगर कांग्रेस की सत्ता में वापसी होती है, तो सिद्धारमैया मुख्यमंत्री होंगे, जबकि जीटी देवगौड़ा की हैसियत किसी भी हालत में एक विधायक से ज्यादा नहीं रह सकती.

वोटरों को लुभाने के लिए सिद्धारमैया के दौरे और प्रचार अभियान के मिले-जुले नतीजे देखने को मिल रहे हैं. बीजेपी नेता बेहद प्रसन्नता के साथ यह बता रहे हैं कि सिद्धारमैया की चामुंडेश्वरी क्षेत्र की रैलियों में काफी कम भीड़ जुट रही है. हालांकि, कांग्रेस कैंप में इस बात को लेकर चिंता नहीं है. दअरसल, सिद्धारमैया अपने खास गंवई अंदाज में इस अर्द्धशहरी विधानसभा क्षेत्र के उन लोगों तक पहुंच रहे हैं, जिन्हें वह निजी तौर पर जानते हैं.

सिद्धारमैया के लिए मुश्किल चुनौती यह है कि पार्टी के स्टार प्रचारक के तौर पर उन्हें कर्नाटक के सभी 30 जिलों पर फोकस करना होगा, लिहाजा चामुंडेश्वरी और वरुणा विधानसभा सीटों पर ध्यान देने के लिए उनके पास वक्त बेहद सीमित होगा. वरुणा सीट से विधानसभा का चुनाव लड़ रहे यतींद्र को भी अपने पिता सिद्धारमैया की मदद की जरूरत होगी, क्योंकि बीजेपी ने भी इस सीट को बेहद अहम बना दिया है. बीजेपी इस विधानसभा क्षेत्र से बीएस येदियुरप्पा को पार्टी का उम्मीदवार बना सकती है.

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