S M L

कर्नाटक: क्यों बनीं हैं कर्नाटक की पहली महिला डीएम आप की उम्मीदवार

आप उम्मीदवार रेणुका विश्वनाथन का मुकाबला कांग्रेस के हरीश से होगा

Sarah Fazal Updated On: Apr 03, 2018 04:07 PM IST

0
कर्नाटक: क्यों बनीं हैं कर्नाटक की पहली महिला डीएम आप की उम्मीदवार

भारी बहुमत के साथ जीत दर्ज करते हुए साल 2015 में दिल्ली में सरकार बनाने वाली आम आदमी पार्टी(आप) 2018 में कर्नाटक विधानसभा के चुनाव में अपना जोर आजमाने के लिए तैयार है. यों 2014 के लोकसभा चुनावों में इस पार्टी को एक भी सीट पर जीत नसीब नहीं हुई थी लेकिन कर्नाटक के उभरते चुनावी मंजर को लेकर पार्टी ने अपने लिए उम्मीदें बांध रखी हैं. पार्टी ने 17 मार्च को अपने 18 उम्मीदवारों के नाम का ऐलान किया, यह भी जताया कि उसका मंसूबा सभी 224 सीटों पर चुनावी मुकाबले में उतरने का है.

बंगलुरु के शांतिनगर विधानसभाई सीट पर होने जा रहे चुनावी मुकाबले पर हमेशा की तरह लोगों की खास नजर रहेगी और पार्टी ने इस सीट से बतौर उम्मीदवार पूर्व आईएएस अधिकारी रेणुका विश्वनाथन को मैदान में उतारा है. रेणुका विश्वनाथन का मुकाबला इस सीट पर कांग्रेस के विधायक एनए हरीश से होना है. मारपीट के एक मामले में बेटे की गिरफ्तारी के बाद एनए हरीश विवादों के घेरे में हैं. साल 2008 में एन ए हरीश की पार्टी(कांग्रेस) को इस सीट पर 52.35% वोट मिले थे और साल 2013 के चुनावों में पार्टी की झोली में इस सीट पर 52.45 फीसद वोट गये थे.

1970 के बैच के आईएएस कैडर में शामिल रेणुका विश्वनाथन को उत्तर कर्नाटक की पहली महिला डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर होने का श्रेय हासिल है. हालांकि शांतिनगर सीट पर कांग्रेस की स्थिति मजबूत जान पड़ती है लेकिन आम आदमी पार्टी की उम्मीदवार रेणुका विश्वनाथन को भरोसा है कि इस सीट पर जीत उनकी पार्टी की ही होगी. एक खास इंटरव्यू में उन्होंने न्यूजकार्ट.कॉम की रिपोर्टर सराह फजल से पार्टी की रणनीतियों पर बात की और यह भी बताया कि कर्नाटक के मतदाताओं के लिए आम आदमी पार्टी किन वजहों से सबसे बेहतर पार्टी साबित हो सकती है.

shanti nagar seat

 

राजनीति में आने की क्या वजह रही?

रिटायरमेंट के बाद मैंने कोई दूसरी नौकरी नहीं की. मैं जो कुछ करना चाहती थी, वह करते हुए मैं बड़े सकून से थी. चार साल पहले मैं आम आदमी पार्टी से जुड़ी क्योंकि मैंने देखा कि ये पार्टी सचाई की राह पर चलते हुए सत्ता में आयी है और भ्रष्ट हुए बगैर कामयाबी के साथ सरकार चला रही है. एक आईएएस अधिकारी के रुप में सैंतीस सालों के अपने कार्यकाल में मैंने ऐसा होते कभी नहीं देखा था.

क्या आपको लगता है कि महिला राजनेता के लिए अपनी जगह बना पाना मुश्किल साबित होता है?

आम आदमी पार्टी ने दो महिला उम्मीदवार चुनावी मैदान में उतारे हैं. मेरे अलावे मैसूर के चमराजा से मालविका चुनाव लड़ रही हैं. मैं राजनेता हूं..मुझे नहीं लगता कि(महिला होने की वजह से) कोई फर्क पड़ता है. मिसाल के लिए आप अगर जर्मनी या इंग्लैंड को देखें तो वहां किसी व्यक्ति को पार्टी के नेतृत्व के लिए चुना जाता है तो इसलिए कि वह इस काम को सबसे अच्छे ढंग से अंजाम दे सकता है, वह अपने संपर्कों के कारण नेतृत्व के पद पर चुना जाता हो, ऐसी बात नहीं....शायद ‘आप’ ही एकमात्र पार्टी है जहां चुनावी मुकाबले के लिए उम्मीदवार सियासी या पारिवारिक नातेदारियों के कारण नहीं बल्कि अपनी योग्यता के कारण चुने जाते हैं. मेरे लिए यह (चुनाव लड़ना) बहुत आसान है क्योंकि मुझे अपने परिवार का समर्थन हासिल है. मुझे नहीं लगता कि सभी उम्मीदवारों के साथ ऐसी स्थिति है. हमारा सामाजिक ढांचा ऐसा है कि पुरुषों की तुलना में महिलाओं से कहीं ज्यादा बड़ी पारिवारिक भूमिका के निर्वाह की उम्मीद की जाती है. इस कारण यह (चुनाव लड़ना) कुछ कठिन हो जाता है.

एक पूर्व प्रशासक के नाते आपको अपनी जीत के क्या आसार नजर आते हैं? क्या लोग वोट डालते समय यह भी ख्याल करते हैं कि उम्मीदवार की पारिवारिक पृष्ठभूमि क्या है?

ईमानदारी से कहूं तो मुझे नहीं लगता कि मेरा पूर्व प्रशासक होना इस चुनाव में (मुझे मिलने वाले वोटों के लिहाज से) कोई भूमिका निभाएगा. मुझे इस बात का पता है कि लोग अपने नुमाइंदे चुनते वक्त बहुत सी बातों का ख्याल करते हैं. मुझे लगता है लोग प्रतिनिधि चुनते वक्त ये देखते हैं कि उसे सार्वजनिक जीवन में कामकाज की जानकारी हो, वह पहले से सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहा हो. लोग पार्टी की साख को भी परखते हैं, देखते हैं कि पार्टी किन बातों के पक्ष में है. साथ ही, लोग उम्मीदवार की ईमानदारी को भी देखते-परखते हैं.

मुझे पक्का यकीन है कि लोग किसी उम्मीदवार के पूरी शख्शियत का ख्याल करते हैं. आम आदमी पार्टी ने एक ऑटो-रिक्शाचालक को भी अपना उम्मीदवार बनाया है. पार्टी ने कई सामाजिक पृष्ठभूमि के उम्मीदवार मुकाबले में उतारे हैं. दरअसल बात यहां ऐसे लोगों की है जो सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी से काम कर सकें.

आम आदमी पार्टी ने कहा है कि वह चुनावी मैदान में नीतियों के आधार पर चलने वाली पार्टी के रुप में उतरी है, नेता की छवि के सहारे चलने वाली पार्टी के रुप में नहीं. क्या आपको लगता है कि कर्नाटक के स्थापित नेताओं की लोकप्रियता के बरक्स सियासी मैदान में उतरने में इससे आम आदमी पार्टी को मदद मिलेगी?

आपको यह देखकर शायद आश्चर्य हो कि लोग इन उम्मीदवारों से बहुत उकताये हुए हैं. चीजें अभी जिस तरह से चल रही हैं उससे लोग जरा भी संतुष्ट नहीं है- मुझे यह बात समझाने में उन्हें एक सेंकेंड का भी वक्त नहीं लगता. हर कोई, चाहे वह धनी हो या गरीब या फिर झुग्गी बस्तियों में रहने वाला, इस बात से सहमत हैं. यह बात तय है कि लोग बहुत नाखुश हैं. मुझे नहीं लगता कि स्थापित नेता अब भी लोकप्रिय हैं.

कर्नाटक में आपकी पार्टी की चुनावी रणनीति क्या है और यह दूसरी पार्टियों से कैसे अलग है?

गलियों और सड़कों पर आपको यह अन्तर हर जगह नजर आयेगा. एक हमी है जो अभी चुनाव-अभियान में लगे हैं, सीन में बाकी कोई और नजर नहीं आ रहा. हम घर-घर जाकर चुनाव-प्रचार कर रहे हैं. मुझे नहीं लगता कि अभी कोई पार्टी घर-घर जाकर चुनाव-प्रचार कर रही है. सो, हमारे लिए मैदान अभी एकदम खुला हुआ है. (बाकी दूसरे दलों ने) अभी सिर्फ अपने पोस्टर लगाये हैं. लेकिन हमलोग तीन महीने से अपना प्रचार-अभियान चला रहे हैं. हम लोगों से मिलते हैं और उन्हें विकास को लेकर अपने पार्टी के एजेंडे के बारे में बताते हैं.

आम आदमी पार्टी स्थानीय स्तर पर जहां जैसे मुद्दे हैं उसी हिसाब से वार्ड स्तर के मेनिफेस्टो तैयार कर रही है. मेनिफेस्टो में कौन-से मुद्दे उठाये जाने की संभावना है?

हम अलग-अलग इलाकों मे जाते हैं और वहां कुछ मसले दिखते हैं. ये ही मसले इलाके से संबंधित वार्ड स्तर के मेनिफेस्टो में रखे जायेंगे. लोग हमें बताते हैं कि उनके इलाके में किन समस्याओं का समाधान जरुरी है, जैसे पानी की निकासी, कूड़े का निबटारा या फिर प्रदूषण आदि. लोगों की बतायी ये समस्याएं वार्ड स्तर के मेनिफेस्टो के लिए दर्ज कर ली जाती हैं. आम आदमी पार्टी कर्नाटक में प्रांतीय स्तर का भी एक मेनिफेस्टो तैयार करेगी. इसमें आमफहम मुद्दों को जगह दी जायेगी और इसमें सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट(ठोस-कचरा प्रबंधन), ट्रैफिक जैम जैसी समस्याओं के समाधान के लिहाज से नीति तैयार करने पर जोर होगा.

क्या अभी के नेता किसी निर्वाचन क्षेत्र के विधायक/निर्वाचित प्रतिनिधि के तौर पर अपनी जिम्मेवारी का निर्वाह कर रहे हैं? अगर नहीं तो फिर क्यों?

ईमानदारी से कहूं तो मैं नहीं मानती कि विधायक का काम सिर्फ एमएलए फंड से पैसे खर्चने तथा अपने निर्वाचन क्षेत्र के लोगों को जरुरत की चीजें मुहैया कराना है. बहुत से लोग यही मानकर चलते हैं कि किसी एमएलए का काम यहीं तक सीमित है और उसे इतना ही कुछ करना होता है. लेकिन एमएलए राज्य की विधानसभा का सदस्य होता है और इस नाते उसे सदन के हर सत्र में भाग लेना होता है, उसे लोगों के मुद्दों पर चर्चा करनी होती है और लोगों के फायदे के लिए कानून बनाना होता है. विधायक को चाहिए कि वह अपने निर्वाचन क्षेत्र की समस्याओं को व्यापक रुप से उठाये ताकि उसके उठाये मुद्दे के सहारे राज्य स्तर पर समस्या के समाधान की राह खुले.

आम आदमी पार्टी को 2014 के लोकसभा चुनावों में एक भी सीट पर जीत हासिल नहीं हुई, नाकाम कोशिश के इस उदाहरण को देखते हुए इस चुनाव में आम आदमी पार्टी के लिए क्या संभावनाएं दिखती हैं? साल 2014 के बाद से अबतक पार्टी की संभावनाओं में क्या बदलाव आया है?

ओह..बहुत सी बातें बदली हैं! आपको याद होगा कि 2014 में आम आदमी पार्टी की दिल्ली में बहुत कम दिनों के लिए एक सरकार बनी, बाद में पार्टी 2015 में भारी बहुमत से जीत हासिल कर सत्ता में आयी. फिर पार्टी ने जमीनी स्तर पर चीजों को देखना शुरु किया और दिल्ली में चीजें बदलनी शुरु हुईं. मेरे प्रचार-अभियान का एक बड़ा हिस्सा लोगों को यह बताने पर टिका है कि बीते तीन सालों में पार्टी ने दिल्ली में क्या कुछ हासिल किया है. लोग, और यहां तक कि बच्चे भी हमारी पार्टी के हाथो हुए बदलाव को देख-परख रहे हैं और इसका उनपर असर हुआ है.

माना जाता है कि बीजेपी के आईटी सेल के प्रभारी अमित मालवीय ने चुनाव-कार्यक्रम लीक किया. इसे लेकर आम आदमी पार्टी ने चुनाव आयोग को जिम्मेदार ठहराया है, कहा है कि आयोग बीजेपी के हाथों की कठपुतली है. इस आरोप के पक्ष में आम आदमी पार्टी के पास क्या सबूत हैं?

यह जानकारी(चुनाव-कार्यक्रम) सिर्फ चुनाव आयोग को रहनी चाहिए और वही इस जानकारी का एलान कर सकता है. लेकिन जिस व्यक्ति ने चुनाव-कार्यक्रम के बारे में पहले बताया वह बीजेपी का था. जाहिर है, फिर बीजेपी इस सबमें एक हिस्सेदार है. यही पार्टी भारत सरकार चला रही है और हम सब जानते हैं कि मुख्य चुनाव आयुक्त..चुनाव के अधिकारियों की नियुक्ति मौजूदा सरकार ने की है.

माना जा रहा है कि कर्नाटक में साल 2018 का चुनावी मुकाबला बीजेपी, कांग्रेस तथा जेडी(एस) के बीच है. क्या आपको लगता है कि आम आदमी पार्टी अपना खाता खोल पाएगी?

खाता खुल पाने में कोई मुश्किल नहीं है. हम जब भी लोगों से बात करते हैं, वे कहते हैं कि हम बदलाव चाहते हैं. तो फिर आखिर यह बदलाव है क्या? आज कर्नाटक में कांग्रेस की और बीजेपी की केंद्र में सरकार है. लोगों पर इन दोनों ही दलों का शासन है तो फिर वे बदलाव के लिए और कहां जायेंगे? उनके पास विकल्प के रुप में या तो जेडी(एस) है या फिर हमारी पार्टी. इस कारण, हमें अपनी जीत का भरोसा ना रखने का सवाल ही नहीं. लोग बदलाव चाहते हैं और उनके पास आम आदमी पार्टी क रुप में सबसे अच्छा विकल्प है.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
Test Ride: Royal Enfield की दमदार Thunderbird 500X

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi