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कपिल मिश्रा विवाद: 'आप' का ड्रामा खत्म होने के बाद क्या होगा?

केजरीवाल एंड पार्टी ने पार्टी-पार्टी का जो खेल शुरू किया था, वह क्लाइमैक्स पर पहुंच रहा है

Pramod Joshi Updated On: May 07, 2017 06:09 PM IST

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कपिल मिश्रा विवाद: 'आप' का ड्रामा खत्म होने के बाद क्या होगा?

पार्टी के भीतर अभी तक व्यक्तिगत मतभेद थे या वैचारिक नजरियों का टकराव था. अब कपिल मिश्रा ने जो आरोप लगाया है वह अरविंद केजरीवाल की राजनीति को ध्वस्त करके रख देगा, बशर्ते वे अपने आरोपों को पुख्ता कर सकें.

फिलहाल केजरीवाल की नैतिकता का सारा पानी एक झटके में उतर गया है. आम आदमी पार्टी की दीर्घकालीन राजनीति अधर में है. क्या यह राजनीतिक शतरंज में बीजेपी का बनाया चक्रव्यूह है, जिसमें केजरीवाल नादानी में जा फंसे हैं? या उनकी अतिशय महत्वाकांक्षाओं की यह तार्किक परिणति हैं?

क्या ये महज राजनीतिक आरोप है?

आरोप लगाते समय तक कपिल मिश्रा औपचारिक रूप से केजरीवाल सरकार में मंत्री थे और इस मामले के चश्मदीद गवाह. हालांकि अभी इस मामले में केस दर्ज नहीं हुआ है, पर होगा तो केजरीवाल का असमंजस बढ़ाएगा. इन बातों के गहरे निहितार्थ हैं. पर क्या कपिल मिश्रा घूस के ठोस सबूत साबित कर पाएंगे? या यह महज राजनीतिक आरोप बनकर रह जाएगा?

कपिल मिश्रा ने कहा है कि उन्होंने दो दिन पहले केजरीवाल को सत्येंद्र जैन से दो करोड़ रुपए नकद लेते हुए देखा है. उन्होंने पार्टी के भीतर कुछ घोटालों का जिक्र भी किया है. घोटालों के परत-दर-परत खुलने का अंदेशा अभी कायम है.

पार्टी का क्या होगा?

इस मामले से केजरीवाल कैसे बचेंगे और राजनीति के मैदान में अपनी प्रतिष्ठा किस तरह बचाएंगे, इसे देखना होगा. बहरहाल सवाल यह है कि भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन के गर्भ से पैदा हुई इस पार्टी का क्या होगा? क्या यह टूट जाएगी?

Arvind Kejriwal

इसे बीजेपी की साजिश के रूप में साबित करने की कोशिश भी की जाएगी. बगावत को बढ़ावा देने में बीजेपी का हाथ होने की बात समझ में आती है. पर पार्टी के भीतर भी कहीं न कहीं गड़बड़ है.

इस मामले में दूसरे दलों का नजरिया भी महत्त्वपूर्ण साबित होगा. इस हफ्ते कुमार विश्वास और अमानतुल्ला खान के मामले में पार्टी ने पहले कुमार विश्वास को और फिर अमानतुल्ला को संतुष्ट करने की जो कोशिश की है, वह उसके राजनीतिक अंतर्विरोधों की कहानी बता रही है.

केजरीवाल के नीतीश कुमार और ममता बनर्जी के साथ अच्छे रिश्ते हैं. वे भाजपा-विरोधी राष्ट्रीय राजनीति से भी जुड़े हैं. जेडीयू की शुरुआती प्रतिक्रिया केजरीवाल के पक्ष में है.

पार्टी के महासचिव केसी त्यागी ने कहा है कि दिल्ली सरकार को काम करने नहीं दिया गया. उसके रास्ते में अड़ंगे लगाए गए. उधर कांग्रेस पार्टी की ओर से अजय माकन ने भ्रष्टाचार-विरोधी कानून के तहत कार्रवाई की मांग की है. साथ ही केजरीवाल से भी इस्तीफा मांगा है.

सिसोदिया ने खारिज कर दिया है आरोप

उप मुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया ने प्रकारांतर से कहा है कि कपिल मिश्रा ने यह आरोप इसलिए लगाया क्योंकि उन्हें अपने पद से हटा दिया गया था. वह भी इसलिए क्योंकि दिल्ली में पानी की सप्लाई की स्थिति खराब हो गई है.

पार्टी के सूत्रों का कहना है कि एमसीडी चुनाव के दौरान पानी की सप्लाई की दशा और खराब हो गई. बिल भी बढ़ाकर भेजे जाने की शिकायतें है. वास्तव में ऐसी स्थिति थी, तो कुछ दिन पहले इस बात को सामने आना चाहिए था.

पार्टी ने अब यह मान लिया है कि एमसीडी चुनाव में हारने का कारण यह था कि उनकी सरकार पानी की सप्लाई ठीक से नहीं दे पाई. क्या वास्तव में इसी वजह से कपिल मिश्रा को उनके पद से हटाया गया? कहना मुश्किल है कि आरोपों का पिटारा कितना बड़ा है.

आरोप-प्रत्यारोप केजरीवाल पर ही उल्टा पड़ेगा

अरविंद केजरीवाल अब अपने बचाव में कपिल मिश्रा पर आरोप लगाएंगे तो यह बात उल्टे उनपर ही पड़ेगी. सवाल उठेगा कि कैसी थी उनकी टोली? जबसे दिल्ली में उनकी सरकार बनी है कई मंत्री आरोपों के कारण हटे हैं. यह स्थिति भी अभूतपूर्व है.

कपिल मिश्रा की राजनीति पर भी सवाल खड़े होंगे. उनकी मां अन्नपूर्णा मिश्रा बीजेपी की सीनियर नेता हैं और पूर्व दिल्ली की मेयर रह चुकी हैं. वे कुमार विश्वास खेमे से ताल्लुक रखते हैं. कुमार विश्वास पर भाजपा का एजेंट होने का आरोप लग रहा है.

साभार @KapilMishraAAP

साभार @KapilMishraAAP

कपिल मिश्रा ने पार्टी छोड़ने का इरादा जाहिर नहीं किया है. उनके साथ कितने विधायक हैं और उनकी भविष्य की राजनीति क्या है, इसे लेकर कयास हैं. पर टकराव इतना बढ़ चुका है कि उनकी और केजरीवाल की राहें अब जुदा हो गईं हैं, पर यह अलहदगी अभी पूरी नहीं हुई है.

मनीष सिसोदिया ने जो सफाई पेश की है, उसमें कपिल मिश्रा पर कोई बड़ा आरोप नहीं लगाया गया है. पर अब उन्हें कोई न कोई कहानी बतानी होगी कि यह वितंडा खड़ा क्यों हुआ. पार्टी इस कहानी की पटकथा कहीं न कहीं लिख रही होगी.

सवाल यह है कि क्या ये बातें देश के गले में आसानी से उतर जाएंगी? केजरीवाल पर लगा आरोप मामूली नहीं है. यही आरोप किसी दूसरे राजनीतिक नेता पर लगता तो बात अलग होती. वे शुद्ध-पवित्र राजनीति का संदेश लेकर आए हैं. उनपर लगा आरोप किसी बाहरी व्यक्ति ने नहीं, उनके सहयोगी ने लगाया है, जो आंदोलन और पार्टी के गठन का उनका साथी है. इस आरोप से बचकर निकलना आसान नहीं होगा. ऐसे आरोपों के कई और पुलिंदे कहीं और भी होंगे.

यह सब व्यावहारिक राजनीति के लटके-झटके हैं, जिसमें अरविंद केजरीवाल ही नहीं, उनकी पूरी टोली फंस गई है. फिलहाल साफ है कि केजरीवाल एंड पार्टी ने पार्टी-पार्टी का जो खेल शुरू किया था, वह क्लाइमैक्स पर पहुंच रहा है. पूरी नाटकीयता के साथ.

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