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क्या इन राजनीतिक पैतरों से पार्टी को पुनर्जीवित कर पाएंगे कन्हैया ?

कन्हैया पार्टी के भीतर अपनी साख बढ़ाने और मोदी विरोधियों को लामबंद करने के लिए राजनीतिक स्टंट अपनाने से बाज नहीं आ रहे

Updated On: Oct 19, 2018 06:00 PM IST

Pankaj Kumar Pankaj Kumar

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क्या इन राजनीतिक पैतरों से पार्टी को पुनर्जीवित कर पाएंगे कन्हैया ?
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कन्हैया एक बार फिर सुर्खियो में हैं और वजह है बेगूसराय में उनके समर्थकों द्वारा दुर्गा पूजा आयोजन समिति के लोगों का पीटा जाना. स्थानीय पत्रकारों के मुताबिक कन्हैया बेगूसराय के मंसूरचक से सभा कर लौट रहे थे और रास्ते में उनका काफीला एक ऐसी जगह पर रुका जहां पास में दुर्गा पूजा का पंडाल लगा था. वक्त आरती का था इसलिए लोगों की भीड़ ठसाठस थी. वैसे भी बिहार में दशहरा बेहद धूमधाम से मनाया जाता है और आम लोग सड़कों पर दुर्गा पूजा पंडाल देखने परिवार के साथ आते हैं.

कन्हैया के काफिले में कई गाड़ियां थीं जिनमें उनके समर्थक मौजूद थे. गाड़ी बीच सड़क पर रोके जाने की वजह से आयोजन समिति के लोगों ने ऐतराज जताया. उस दरम्यान कन्हैया पास के एक कोंचिग संस्थान के डायरेक्टर से मुलाकात कर रहे थे. मामूली कहासुनी हुई और कन्हैया समर्थकों ने आयोजन समिति के लोगों को पीट दिया. बाद में लोकल लोगों की नाराजगी को देखते हुए कन्हैया और उनकी टोली को भागना पड़ा.

स्थानीय लोगों के मुताबिक ये कोई राजनीतिक लड़ाई थी ही नहीं. ये महज कन्हैया के लोगों की दबंगई थी कि उन्हें सड़क के किनारे गाड़ी लगाने के लिए क्यूं कहा जा रहा है. हो सकता है आयोजन समिति के लोगों के कहने के तरीके में थोड़ी तल्खी हो लेकिन उनकी तल्खी का जवाब उन्हें पीटकर दिया गया.

स्थानीय पत्रकार सत्येन्द्र कुमार कहते हैं, 'कन्हैया के काफिले की गाड़ी तोड़ी गई, ये स्थानीय लोगों के गुस्से का इजहार था लेकिन बेरहमी से मारपीट को अंजाम कन्हैया के लोगों ने ही दिया ये साफ प्रतीत होता है.

वहीं प्रसार भारती के संवाददाता रह चुके अमरेन्दर कुमार कहते हैं, 'मामले दोनों तरफ से दर्ज किए गए हैं जबकि घायल पूजा समिति के लोग हुए हैं. कन्हैया की गाड़ी को लोगों ने गुस्से में तोड़ा है. कन्हैया के लोग पूजा आयोजन समिति के लोगों को मारकर भाग रहे थे. इसलिए इसे कोई राजनीतिक रंग देना सोची समझी रणनीति है.'

कुछ दिन पहले पटना के एम्स में भी डॉक्टर्स ने कन्हैया और उनके समर्थकों पर बदसलूकी और मारपीट का आरोप लगाया था जब कि कन्हैया और उनके समर्थकों ने इसे बीजेपी द्वारा प्रायोजित करार देकर मामले को राजनीतिक रंग देने की कोशिश की थी. दोनों घटनाओं पर गौर फरमाया जाए तो साफ दिखता है कि कन्हैया यूनिवर्सिटी पॉलिटिक्स वाली तल्खी राजनीति के असली मैदान में भी बरकरार रखना चाहते हैं.

Kanhaiya Kumar

ध्यान रहे कन्हैया बखूबी जानते हैं कि उनकी हर गतिविधि को मीडिया खूब उठाएगा, इसलिए हर बात पर बीजेपी पर ठीकरा फोड़ने का कोई मौका वो गंवाते नहीं हैं. बेगूसराय कम्यूनिस्टों का गढ़ रहा है. एक जमाने में उसे मिनी मॉस्को भी कहा जाता था. कन्हैया महागठबंधन के उम्मीदवार होंगे, ऐसा लगभग सुनिश्चित माना जा रहा है. इसलिए कन्हैया हर मौके को बीजेपी बनाम कन्हैया बना देने का कोई कसर छोड़ते नहीं हैं.

वैसे उनकी पार्टी के भीतर लोकसभा में उनको टिकट दिए जाने को लेकर बेहद नाराजगी है. कई जमीनी कार्यकर्ता उन्हें ऊपर से थोपा हुआ करार देकर चुनाव में मजा चखाने की बात भी कर रहे हैं. पार्टी कार्यकर्ताओं में इस बात को लेकर भी नाराजगी है कि सालों से राजनीतिक जमीन पर पसीना बहाने वाले स्थानीय नेताओं को दरकिनार कर कन्हैया को ऊपर से थोपा जा रहा है. ये कम्यूनिस्ट कल्चर के खिलाफ है और स्थानीय कम्यूनिस्ट नेता और पूर्व सांसद शत्रुघ्न प्रसाद सिंह, दिग्गज नेता राजेन्द्र सिंह और रामरतन सिंह सरीखे नेता का अपमान भी.

कन्हैया बेगूसराय संसदीय क्षेत्र में पार्टी की अंदरूनी राजनीति से भी बखूबी परिचित हैं. इसलिए हर मौके पर बीजेपी के खिलाफ लड़ने में अपने को अग्रसर दिखा वो पार्टी के अंदर और बाहर एक लंबी लकीर खींचने का कोई मौका हाथ से जाने देना नहीं चाहते. यही वजह है कि पटना एम्स के डॉक्टर्स और गार्डस और पूजा समिति के लोग जिसमें बीजेपी जेडीयू और कम्यूनिस्ट सबके लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं. उसे कन्हैया बनाम भगवा बना दिया गया.

युवाओं को लुभाने के लिए आक्रामकता का सहारा

कन्हैया जानते हैं कि कम्यूनिस्ट पार्टी का जहां एक समय बोलबाला था, वहां जमींदोज हो चुकी पार्टी को जिंदा करने के लिए आक्रामकता बेहद जरूरी है. जो युवा 90 के दशक में मंडल के बाद कम्यूनिस्ट पार्टी से मुंह मोड़ चुके थे उन्हें साथ लाने के लिए एससी/एसटी पर बीजेपी के रवैये को लेकर अगड़ी जाति के युवाओं में नाराजगी को भुनाने को कोई मौका गंवाते नहीं हैं.

वहीं पिछड़ों और दलित का दिल जीतने के लिए एक सप्ताह पहले कन्हैया ने एक सभा की जिसमें जिग्नेश मेवाणी के साथ बीजेपी के खिलाफ जमकर आग उगली. पिछड़ा खास कर यादव जाति के लोगों को लुभाने के लिए वो लालू को निर्दोष भी बताते हैं.

कन्हैया ने इतिहास को दोहराने की भी कोशिश की और जिस जगह का चुनाव किया उसका नाम बखरी है. यहां से कॉमरेड चंद्रशेखर ने 60 के दशक में कांग्रेस के खिलाफ बिगुल फूंक कर उसकी जड़ें हिला दी थी लेकिन पिछले लोकसभा में सीपीआई ने जेडीयू के साथ मिलकर चुनाव लड़ा फिर भी उसे तीसरे स्थान से संतोष करना पड़ा था. इससे जनाधार की असली हकीकत पता की जा सकती है. इतना ही नहीं 2015 के विधानसभा चुनाव में बेगूसराय संसदीय क्षेत्र की 6 विधानसभा सीटों पर दूसरे या तीसरे नंबर पर रहना उसके खिसकते जनाधार की हकीकत को बखूबी बयां करता है. जाहिर है हाशिए पर जा चुकी पार्टी में जान फूंकने के लिए कन्हैया युवाओं को अपनी आक्रामकता से लुभाना चाहते हैं और लालू और जिग्नेश मेवाणी का साथ दिखाकर वो दलित और पिछड़े खासकर यादवों और मुसलमानों का समर्थन हासिल कर बाजी जीतने का दांव भी खेल रहे हैं.

1980 के दशक के खूनी खेल में न तब्दील जाए ये आक्रामकता?

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राजनीति क्या करवट लेगी ये कोई नहीं जानता क्योंकि बेगूसराय में राजनीतिक खूनी खेल का दौर तब से खत्म हुआ है जबसे कम्यूनिस्ट मोटे तौर पर बेहद कमजोर हुए हैं. 60 के दशक में पार्टी का नेतृत्व कॉमरेड चंद्रशेखर और कॉमरेड ब्रह्म देव के हाथों था. जिनकी सादगी और जोरदार भाषणों से कम्यूनिस्ट पार्टी की जड़ें मजबूत हो रही थीं. चंद्रशेखर के पिता कांग्रेस सरकार में दिग्गज मंत्री थे लेकिन बेटे चंद्रशेखर ने कांग्रेस का विरोध कर बेगूसराय के गांव और खेत-खलिहानों के मजदूरों के लिए संघर्ष करना जरूरी समझा. लोगों की नजरों में चंद्रशेखर की छवी बेहद लोकप्रिय नेता के रूप में थी.

80 के दशक में कम्यूनिस्ट दफ्तर पर पुलिस की रेड हुई. जिसमें उस समय के एक बाहुबली कारबाइन जैसे हथियार के जखीरे के साथ धरे गए थे. कम्यूनिस्ट पार्टी की मिलिटेंट विंग इतनी पावरफुल थी कि उससे बचने के लिए काग्रेस को बाहुबलियों का सहारा लेना पड़ता था. घात प्रतिघात का एक लंबा दौर चला. विधायक सहित योगी सिंह और इंद्रदेव सिंह तक की हत्या हुई. योगी सिंह और इंद्रदेव सिंह मिलिटेंट विंग के नेता थे. इनकी हत्या कांग्रेस समर्थित बाहुबली किशोर सिंह के द्वारा की गई.

किशोर जेल में बंद थे और उनकी हत्या अस्सी के दशक में जेल को तोड़कर की गई. इस हत्या में जो लोग नामजद हुए थे वो बेगूसराय की कम्यूनिस्ट पार्टी के बड़े नेता थे. इतना ही नहीं अस्सी के दशक में एक खूनी खेल सीपीआई और सीपीएम के बीच भी हुआ, जिसमें तीन दर्जन से ज्यादा हत्याएं हुई लेकिन 90 के दशक में समाजवादी पार्टियों और बीजेपी के मजबूत हो जाने से राजनीतिक हिंसा का दौर थम सा गया. 90 के बाद शांति हुई. अब राजनीतिक हत्याओं का दौर खत्म हो चुका है.

लेकिन जमीदोज हो चुकी कम्यूनिस्ट पार्टी को किसी चमत्कार की तलाश है. कम्यूनिस्ट पार्टी लोकसभा में भी बेहद खराब प्रदर्शन से हतोत्साहित है. पार्टी के भीतर कलह है और पुराने नेता और पूर्व सांसद शत्रुघ्न प्रसाद सिंह और राजेन्द्र सिंह आमने-सामने हैं. पिछले लोकसभा में पार्टी जब तीसरे नंबर पर आई तो इसके लिए एक दूसरे पर आरोप मढ़ने में मीडिया का भी सहारा लिया गया. जाहिर है पार्टी को पुनर्जीवित करना कन्हैया के लिए एक चुनौती है. खासकर तब जब पार्टी के कार्यकर्ता उनकी उम्मीदवारी को लेकर भी शीर्ष नेतृत्व से नाराज हैं.

इसलिए कन्हैया पार्टी के भीतर अपनी साख बढ़ाने और मोदी विरोधियों को लामबंद करने के लिए राजनीतिक स्टंट अपनाने से बाज नहीं आ रहे लेकिन ये स्टंट मंसूरचक की घटना के बाद महज राजनीतिक ही रहे यही बेहतर होगा.

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