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कमल हासन को राय बनाने का हक है तो उनके विरोधियों को भी

कमल ने महाभारत और द्रौपदी के बारे में टिप्पणी की थी

Updated On: Mar 18, 2017 03:50 PM IST

Anant Vijay

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कमल हासन को राय बनाने का हक है तो उनके विरोधियों को भी

मशहूर फिल्म अभिनेता कमल हासन के खिलाफ तमिलनाडू में एक संगठन हिंदू मक्कल काची ने पुलिस को शिकायत दी है.

इस संगठन का आरोप है कि कमल हासन ने हाल ही में एक टीवी इंटरव्यू में हिंदुओं के धर्मग्रंथ महाभारत पर आपत्तिजनक टिप्पणी की जिससे उनकी धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं.

दरअसल कमल हासन ने अपने इंटरव्यू में महाभारत में द्रौपदी के जुए में हारने को लेकर अपनी टिप्पणी की थी. उनका कहना था कि इस ग्रंथ में स्त्री को पुरुषों की हाथ की कठपुतली बताया गया है जिसको उसके पति जुए में दांव पर लगा देता है.

कमल हासन के मुताबिक जिस ग्रंथ में एक महिला को जुए में दांव पर लगाने वाली चीज के तौर पर वर्णित किया गया हो उस ग्रंथ को भारत में महान माना जाता है. इस टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर कमल हासन की घेरेबंदी शुरू हुई और हिंदू मक्कल काची ने पुलिस को शिकायत दे दी कि कमल हासन की टिप्पणी से हिंदुओं की धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं.

रानी द्रौपदी [फोटो:विकिकॉमन]

रानी द्रौपदी [फोटो:विकिकॉमन]
यहां यह समझने की जरूरत है कि कमल हासन ने किस संदर्भ में यह बात कही है क्योंकि संदर्भ से काटकर किसी भी वाक्यांश को पेश करने से हमेशा अर्थ का अनर्थ हो जाता है.

इसके अलावा यह भी देखने की जरूरत है कि उत्तर भारत और दक्षिण भारत के लेखकों में धार्मिक मिथकों को लेकर अलग अलग मत रहे हैं. अगर हम सिर्फ रामायण को ही देखें तो उसमें राम और सीता को लेकर अलग अलग तरह के वर्णन हैं. वाल्मीकि रामायण में अगर देखें तो राम को मानवीय व्यक्तित्व के तौर पर पेश किया गया है जबकि मलयालम में देवत्व का रूप दिया गया है और उसी तरह गोस्वामी तुलसीदास के यहां आध्यात्मिक रूप दिखाई देता है.

इसी तरह से अगर हम सीता के अपहरण के प्रसंग को देखें तो उसके वर्णन में भी भिन्नता नजर आती है. वाल्मीकि में सीता के साथ जोर जबरदस्ती का उल्लेख है तो रामचरित मानस में अपहरण के बाद सीता के स्पर्श की बात कही गई है लेकिन जब हम कंबन रामायण को देखते हैं तो वहां सीता को कुटिया समेत उठाकर ले जाने का प्रसंग है.

इसके अलावा अगर दक्षिण भारत के लोकमानस की बात करें तो वहां रावण को राक्षस के तौर पर नहीं देखा जाता है. उनका सम्मान भी किया जाता है. दक्षिण भारत के लोक में रावण वहां राम के बराबर श्रद्धा पाते हैं. धार्मिक मिथकों को लेकर प्राचीन काल से ही लेखकों में मत भिन्नता रही है. यह अब भी कायम है.

हमारे दौर के लेखक आनंद नीलकंठम की किताबों- राइज ऑफ शिवगामी से लेकर 'असुरा, टेल ऑफ वेनिक्विस्ट' तक में धार्मिक चरित्रों के अलग रूप प्रस्तुत किए गए हैं. तो कमल हासन ने अगर द्रौपदी के आधार पर अपनी राय बनाई तो उसका उनको हक है लेकिन इतना ही हक हिंदू मक्कल काची को भी है कि वो उनके खिलाफ पुलिस को शिकायत करे. इस पूरे मसले पर कानून को अपना काम करने देना चाहिए.

पुलिस जांच कर ही रही थी कि हिंदू मक्कल काची की शिकायत पर सियासत शुरू हो गई. वामपंथी संगठनों से जुड़ी कविता कृष्षन ने ट्वीट करके इसको सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की. कविता ने कमल हासन के खिलाफ हिंदू मक्कल काची के इस कदम को हिंदू संगठनों की मुसलमानों के खिलाफ उठाए गए कदम के तौर पर देखा और उसको उसी तरह से प्रचारित भी किया.

किसी एक राज्य के एक छोटे से संगठन के एक व्यक्ति के खिलाफ शिकायत को मुसलमानों से जोड़ देना एक तरह की सांप्रदायिकता ही है. कविता ने लिखा- हिंदू संस्कृति भारतीय संस्कृति है- हिंदू संगठन. लेकिन एक मुसलमान अभिनेता महाभारत के बारे में बात नहीं कर सकता है. किसी को भी अधिकार है कि वो रामायण, महाभारत, मनुस्मृति, बाइबिल, कुरान और बौद्ध साहित्य में महिलाओं को लेकर जिस तरह की बातें हुई हैं उसकी आलोचना करे.

कविता कृष्णन बिल्कुल सही कह रही है कि सभी धर्मग्रंथों में महिलाओं की स्थिति के बारे में टिप्पणी करने का हक है लेकिन हक नहीं है कि वो किसी व्यक्तिगत राय को हिंदू-मुसलमान के चश्मे से देखे. यह प्रवृति बेहद खतरनाक है और समाज को बांटनेवाली भी है. इसका एक दुष्परिणाम यह होता है आमतौर पर सहिष्णु हिंदू भी कट्टरता की ओर कदम बढ़ा देता है. क्या कविता कृष्णन ने आजतक मुसलमानों या ईसाइयों के मसले को कभी इस तरह के सांप्रदायिक चश्मे से देखा है.

क्या कविता कृष्षण ने कभी तस्सीमा नसरीन के खिलाफ ज्यादतियों पर आवाज उठाई है. अगर हम महिलाओं के हितों की पैरोकारी ही करना चाहते हैं तो क्या तसलीमा नसरीन महिला नहीं है. क्या किसी भी कथित प्रोग्रेसिव लेखक या एक्टिविस्ट वने कभी इस्लाम में महिलाओं की स्थिति को लेकर विपरीत टिप्पणी करने का साहस दिखाया. कहना आसान होता है लेकिन करना बेहद कठिन.

धर्म इस देश में बेहद संवेदनशील मुद्दा रहा है और कमोबेश हमारे देश की जनता धार्मुक भी रही है. धर्म को अफीम बतानेवाली विचारधारा इस वजह से यहां सफल नहीं हो पाई. लेकिन जब भी धर्म को मुद्दा बनाकर राजनीति की गई है तो उसका असर समाज के सभी तबकों पर पड़ा है.

नेताओं से यह उम्मीद नहीं की जा सकती है कि वो धर्म के आधार पर राजनीति ना करें लेकिन महिला अधिकारों की रक्षा के नाम और इसकी आड़ में राजनीति करना बहुत खतरनाक होता है. इससे भी ज्यादा खतरनाक होता है बौद्धिकता के आवरण में लपेटकर सांप्रदायिकता को बढ़ावा देना.

कमल हासन के मसले को हिंदू मुसलमान के चश्मे से देखना इसका ही एक नूमना है. कविता कृष्णन जैसे लोग यही काम कर रहे हैं और बौद्धिक समाज को इन जैसों को चिन्हित कर उनके मंसूबों को सामने लाना होगा. इससे हमारे देश की बहुलतावादी संस्कृति को बल भी मिलेगा और लोकतंत्र भी मजबूत होगा.

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