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कैराना: जाट-मुस्लिम का साथ संदेश है कि सांप्रदायिकता बहुत वक्त तक वोटबैंक नहीं रह सकती

कैराना के नतीजों से लगता है कि रोजमर्रा की सांप्रदायिकता से होने वाला सियासी फायदा घटने लगा है. विपक्ष की एकजुटता ने इस रणनीति की धार और कुंद कर दी है

Ajaz Ashraf Updated On: Jun 01, 2018 10:36 AM IST

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कैराना: जाट-मुस्लिम का साथ संदेश है कि सांप्रदायिकता बहुत वक्त तक वोटबैंक नहीं रह सकती

कैराना लोकसभा सीट के उप-चुनाव में राष्ट्रीय लोकदल के हाथों बीजेपी की हार के कई मायने निकाले जा सकते हैं. इस चुनाव के नतीजे से साफ है कि एकजुट विपक्ष को हराना बीजेपी के लिए बहुत बड़ी चुनौती होगी. ये नतीजे ये भी बताते हैं कि मोदी का जादू कम हो रहा है. विकास के उनके वादे खोखले साबित हो रहे हैं. इसके सिवा इस नतीजे को ऐसे भी देख सकते हैं कि बीजेपी ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चीनी मिलों पर किसानों का बकाया पैसा दिलाने में नाकामी की सजा भुगती है. और कैराना के नतीजे का सबके बड़ा सबक ये है कि उम्मीदों को आसमान पर बिठाकर, नामुमकिन से सपनों को पूरा करने का वादा करके उन्हें पूरा करने में नाकामी कितनी घातक हो सकती है.

लेकिन, इन सभी बातों से ज्यादा अहम है कैराना के मतदाताओं का एकजुट होकर रोजमर्रा की बात बन चुकी सांप्रदायिक राजनीति को मात देना. 'रोजमर्रा की सांप्रदायिकता' ये जुमला दो विद्वानों सुधा पई और सज्जन कुमार ने गढ़ा है. उन्होंने इसके जरिए ये समझाने की कोशिश की है कि किस तरह बीजेपी हर चुनाव को बहुत आसानी से हिंदू बनाम मुसलमान बना देती है, और जीत जाती है. लेकिन, कैराना ने दिखा दिया है कि 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों के बाद आमने-सामने खड़े जाटों और मुसलमानों ने अपने मतभेद भुलाकर रोजमर्रा की बात बन चुकी सांप्रदायिकता के सामाजिक-आर्थिक नुकसान से पार पाने की कोशिश की है.

रोजमर्रा की सांप्रदायिकता से उब गई है जनता

सुधा पई और सज्जन कुमार ने अपनी किताब Everyday Communalism: Riots in Contemporary Uttar Pradesh में 'रोजमर्रा की सांप्रदायिकता' को विस्तार से समझाया है.

सुधा पई और सज्जन कुमार लिखते हैं कि रोजमर्रा की सांप्रदायिकता' 'रोज़ाना के छोटे-छोटे मगर भड़काऊ मसलों का इस्तेमाल लंबे समय से साथ रहते आ रहे हिंदुओं और मुसलमानों के बीच धीरे-धीरे दुश्मनी और सामाजिक दुराव पैदा करना है'. सड़क हादसा, क्रिकेट के खेल में झगड़ा, किसी एक के घर का पानी रिस कर दूसरे के घर में पहुंचने जैसे मामूली मुद्दों को सांप्रदायिक रंग दिया जा सकता है. सुधा पई और सज्जन कुमार कहते हैं कि हर झगड़े, हर मुद्दे को हिंदू-मुसलमान का झगड़ा बनाने का मकसद, 'समाज में मुसलमान विरोधी सामाजिक पूर्वाग्रह पैदा कर के उसके सबके बीच स्वीकार्य बनाना है'.

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दोनों ही का कहना है कि रोजमर्रा की सांप्रदायिकता की ऐसी घटनाएं हम ज्यादातर उन जगहों पर देखते हैं, जहां के लोग आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहे हैं, या फिर बड़े सामाजिक बदलाव का सामना कर रहे हैं. और उसके मुताबिक खुद को ढाल नहीं पा रहे हैं. ऐसे हालात में हिंदुओं और मुसलमानों को एक-दूसरे के खिलाफ भड़काना आसान हो जाता है, क्योंकि दोनों ही समुदाय आर्थिक रूप से एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. अपनी किताब के लिए सुधा पई और सज्जन कुमार ने 2005 में मऊ, 2007 में गोरखपुर और 2013 में मुजफ्फरनगर-शामली में हुए दंगों की बारीकी से समझा.

हिंसा और झड़प की प्रतीकात्मक तस्वीर

हिंसा और झड़प की प्रतीकात्मक तस्वीर

इन सभी जगहों पर दंगे भड़कने से पहले, कई छोटी-मोटी झड़पें हुई थीं. इन्हें या तो जान-बूझ कर पैदा किया गया, या फिर किसी घटना को सांप्रदायिक रंग देकर दोनों समुदायों के बीच दरार पैदा की गई. दोनों लेखकों का कहना है कि 2004 में जब एनडीए 'शाइनिंग इंडिया' के नारे के बावजूद सत्ता में नहीं लौट सकी, तो, उसके बाद बीजेपी ने बहुत सोच-समझकर ऐसी रोजमर्रा की सांप्रदायिकता की रणनीति पर काम करना शुरू किया. जबकि 'शाइनिंग इंडिया' के जरिए बीजेपी ने जनता को ये कहकर अपने पाले में करने की कोशिश की थी कि अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने देश का कायाकल्प कर दिया है. लेकिन बीजेपी जनता को ये समझाने में नाकाम रही. और बुरा तब हुआ जब 2007 और 2012 के यूपी विधानसभा के चुनाव में बीजेपी तीसरे नंबर पर रही.

पिछड़ी जातियों को हिंदुत्व की राजनीति के खेमे लाना था मकसद

पई और कुमार का तर्क ये भी है कि रोजमर्रा की सांप्रदायिकता की रणनीति का एक मकसद पिछड़ी जातियों को हिंदुत्व की राजनीति वाले भगवा खेमे में लाना भी था. पूर्वी उत्तर प्रदेश में आदित्यनाथ और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उमेश मलिक, संजीव बालियान और हुकुम सिंह ने जोर-शोर से गैर-ब्राह्मणवादी हिंदुत्व की राजनीति का प्रचार-प्रसार किया.

अगस्त-सितंबर 2013 में मुजफ्फरनगर-शामली में भयंकर दंगों के भड़कने से पहले कई छोटे-मोटे विवादों को बड़ी चतुराई से सांप्रदायिक रंग देकर हिंदुओं को मुसलमानों के खिलाफ भड़काया गया. जैसे कि मार्च 2013 में कैराना के बुचाखेड़ी गांव की घटना को ही लीजिए. ये गांव शामली जिले में पड़ता है. यहां पर होलिका दहन के लिए जमा की गई लकड़ी में किसी ने आग लगा दी. किसी को नहीं पता कि आग किसने लगाई. लेकिन इसके लिए मुसलमानों को जिम्मेदार ठहराते हुए गांव के गुज्जरों ने एक मस्जिद पर हमला बोल दिया. इसके चलते पुलिस को गोली चलानी पड़ी. फौरन ही बीजेपी के विधायक हुकुम सिंह और सुरेश राणा बुचाखेड़ी गांव जा पहुंचे. उन्होंने गांव में पुलिस के गोली चलाने के लिए शामली के मुस्लिम एसपी को जिम्मेदार ठहराया. एक मामूली विवाद को सांप्रदायिक रंग दे दिया गया था. इसके बाद ये बड़ा चुनावी मुद्दा बना दिया गया.

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बंद कमरे की राजनीति

ये कैराना ही था, जहां 2014 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने 400 जाटों को बंद कमरे में ये समझाया कि 2013 में हुए अपमान (दंगों) का बदला लेने के लिए उन्हें नरेंद्र मोदी को वोट करना चाहिए. अमित शाह के इस भाषण को सोशल मीडिया पर वायरल कराया गया. जिसका फायदा बीजेपी और उसके सहयोगी अपना दल को मिला. दोनों ने 2014 के लोकसभा चुनाव में मिलकर यूपी की 80 में से 73 सीटें जीत लीं.

लेकिन ये रणनीति सिर्फ लोकसभा चुनाव जीतने के लिए नहीं थी. सत्ता में आने के बाद बीजेपी और इसके सहयोगियों ने रोजमर्रा की बातों को सांप्रदायिक रंग देना शुरू कर दिया. जैसे गोकशी, दो अलग धर्मों के युवाओं के बीच-मेल जोल, धर्म परिवर्तन और कैराना से हिंदुओं के तथाकथित पलायन के मुद्दों को हवा दी जाने लगी. बीजेपी और उसके सहयोगियों का मकसद ये है कि वो ऐसे छोटे स्तर के संघर्ष से हिंदुओं और मुसलमानों के ताल्लुक को नए सिरे से गढ़ना चाहते हैं. हर नई घटना के साथ हिंसा के नए स्तर को मान्यता मिल जाती है. दोनों समुदायों के साथ रहने की शर्तें हर ऐसी घटना के बाद बदल जाती हैं.

पई और कुमार लिखते हैं कि, 'रोजमर्रा की सांप्रदायिकता का सांस्कृतिक और सियासी लक्ष्य है. भारत को हिंदू राष्ट्र बनाना, जहां पर मुसलमानों को बहुसंख्यक समुदाय के जीवन मूल्यों, संस्कृति और विचारों को अपनाना होगा. कुल मिलाकर रोजमर्रा की सांप्रदायिकता का मकसद धर्म आधारित बहुसंख्यक लोकतंत्र की स्थापना है'.

अब घट रहे हैं फायदे, सांप्रदायिकता घर नहीं चलाती

लेकिन कैराना के नतीजे से साफ है कि रोजाना की सांप्रदायिक राजनीति से होने वाले फायदे घटने लगे हैं. गैर ब्राह्मणवादी हिंदुत्व भी अपनी अधिकतम ऊंचाई तक पहुंच चुका है. इसकी वजह ये है कि ऐसी सांप्रदायिकता का इलाके की अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा असर पड़ा है. इसलिए और भी क्योंकि बरसों से जाटों और मुसलमानों के हित एक-दूसरे से जुड़े रहे हैं. वो एक-दूसरे पर निर्भर रहे हैं. कभी वो किसान नेता और पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की मजगर (MAJGAR यानी मुस्लिम, अहीर, जाट, गुज्जर और राजपूतों) गठजोड़ का हिस्सा रहे थे. चरण सिंह ने ये सामाजिक गठबंधन कांग्रेस से मुकाबले के लिए तैयार किया था.

1990 के दशक में इस सामाजिक एकजुटता को चोट उस वक्त पहुंची जब वीपी सिंह सरकार ने ओबीसी को आरक्षण देने का फैसला किया. जब जाटों को आरक्षण के दायरे से बाहर रखा गया, तो नाराज होकर उन्होंने बीजेपी का दामन थाम लिया. बीजेपी उस वक्त राम जन्मभूमि आंदोलन के जरिए हिंदू वोटों को एकजुट करने की कोशिश में जुटी थी. बीजेपी आरक्षण के भी खिलाफ थी और उसने पर्दे के पीछे से 1990 के मंडल विरोधी विरोध-प्रदर्शनों को हवा दी थी. लेकिन, 1990 के दशक की बंटवारे वाली राजनीति का जाटों-मुसलमानों की जुगलबंदी पर बहुत बुरा असर नहीं पड़ा था. जाट जमींदारों के यहां काम करने वाले ज्यादातर मजदूर मुसलमान हुआ करते थे. खेती में काम आने वाली मशीनों की मरम्मत करने वाले भी अक्सर मुसलमान ही होते थे. इसके अलावा हिंदू जाट और मुल्लों (मुसलमानों) का रहन-सहन, रवायतें और सांस्कृतिक विरासत भी साझी थी.

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जाटों और मुसलमानों का ये रिश्ता 2013 के दंगों की वजह से टूट गया. इसके बाद रोज-रोज के सांप्रदायिक विवादों के चलते जाटों और मुसलमानों के रिश्ते में आई दरार पाटने का भी वक्त नहीं मिला. जाट बहुल गांवों में मुसलमान काम करने नहीं जाते थे. उन्हें डर रहता था कि कहीं हमला न हो. इससे जाट जमींदारों की खेती की लागत बढ़ गई. इसके अलावा खेती के काम आने वाली मशीनों की मरम्मत के लिए स्थानीय मुस्लिम कारीगर भी मिलने बंद हो गए. मुसलमानों के लिए जाटों के गांव में काम करने से डरने की वजह से उनमें बेरोजगारी बढ़ी. उनके हाथ से सस्ते कर्ज का जरिया भी निकल गया. छोटे-मोटे काम धंधे करने वाले मुसलमानों को अक्सर जाट कर्ज देकर मदद करते थे.

चरमराती अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए आए साथ

हालात ऐसे बने कि दोनों ही समुदायों को अपने बीच की सांप्रदायिकता की खाई को पाटने की कोशिश करनी पड़ी. 2013 के दंगों की वजह से पैदा हुए हालात से पार पाने के लिए मुहिम सी चल पड़ी. इस दौरान मुसलमानों ने जाटों के खिलाफ दंगों के केस वापस लेने शुरू कर दिए. इसके बदले में जाटों ने मुसलमानों को पैसे देकर मदद की. दोनों ही तबकों ने मसले को सुलझाने की कोशिश की. इसकी वजह सिर्फ मौत का डर या पैसों का लालच नहीं थी. फिर भी जाटों-मुसलमानों के बीच की खाई पाटने की मुहिम तेज होने लगी. ये बात उस वक्त पक्के तौर पर पता चल गई, जब यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने 2013 के दंगों के आरोपी बीजेपी के नेताओं के खिलाफ दंगों के केस वापस लेने का एलान किया. ये सभी के सभी नेता हिंदू थे. आदित्यनाथ के इस कदम का मकसद मुसलमानों पर जाटों से बढ़ते तालमेल को रोकने का दबाव बनाना था. दोनों समुदायों को साथ लाने की कोशिश सामाजिक स्तर पर भी हो रही थी, और सियासी दल भी इस पर काम कर रहे थे.

हालांकि समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल ऐसा खुले तौर पर नहीं मानेंगे, लेकिन जाटों और मुसलमानों को एक-दूसरे के करीब लाने के लिए दबाव उन्होंने ही डाला. इस कोशिश ने चौधरी चरण सिंह के बेटे अजित सिंह और उनके बेटे जयंत चौधरी के लिए सियासी माहौल तैयार किया. ताकि, वो जाटों को बीजेपी के पाले से वापस अपने खेमे में ला सकें. जयंत चौधरी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में काफी मेहनत कर रहे थे. वो जाटों को समझा रहे थे कि बीजेपी ने उनकी खेती से जुड़ी चुनौतियों का समाधान नहीं ढूंढा. न ही जाटों को आरक्षण दिया और न ही उनके लिए नौकरियां जुटा सकी. इसके अलावा रोज-रोज की सांप्रदायिकता से उनके खेती से जुड़े फायदों पर असर पड़ रहा था.

जाटों और मुसलमानों को साथ ले आई आरएलडी

सबसे अहम बात ये कि बिना ब्राह्मणों की अगुवाई वाले हिंदुत्व के बावजूद जाटों को बीजेपी के भीतर वो ताकत नहीं दी गई, जिसकी उन्हें उम्मीद थी. बीजेपी के बारे में आम राय है कि वो ऊंची जातियों की पार्टी है. बीजेपी के खेमे में 2014 और 2017 में एकजुट हुए तमाम सामाजिक समूहों की अपनी-अपनी अपेक्षाएं थीं. बीजेपी के लिए इन सभी को साध पाना मुश्किल था. जाट अब राष्ट्रीय लोकदल के खेमे में वापस आने को बेकरार थे.

लेकिन, जीत के लिए राष्ट्रीय लोकदल को मुसलमानों का साथ भी चाहिए था, जैसा कि उन्होंने चरण सिंह के दौर में किया था. यही वजह थी कि आरएलडी ने कैराना में मुस्लिम महिला तबस्सुम हसन को उम्मीदवार बनाया. तबस्सुम हसन 2009 में बीएसपी के टिकट पर लोकसभा चुनाव जीत चुकी हैं. तबस्सुम के बेटे नाहिद कैराना से समाजवादी पार्टी के विधायक हैं. राष्ट्रीय लोकदल के लिए मुस्लिमों के बीच पैठ बनाना इसलिए भी आसान हो गया कि मुस्लिम वोटों का कोई दावेदार नहीं था.

फिर भी कैराना ने रोजमर्रा की सांप्रदायिकता से मुकाबला करने और उसे पीछे धकेलने में बड़ा रोल निभाया है. इसकी वजह ये है कि हिंदुत्व के शमशीरधारी सिपाही कहे जाने वाले जाटों ने मुसलमानों के साथ मिलकर एक मुस्लिम उम्मीदवार को वोट दिया. ऐसा संभव है कि जाट और मुसलमान एक-दूसरे को प्रतिद्वंदी या जानी दुश्मन मानते हों. लेकिन सामाजिक गठबंधन की मदद से राजनैतिक एकजुटता के लिए लोगों को तैयार करके बरसों से रिस रहे जख्मों पर मरहम जरूर लगाया गया है. जैसे कि पहले बिहार में मुसलमानों के खिलाफ दंगों में यादव सब से आगे रहा करते थे. पर बाद में लालू प्रसाद यादव ने मुसलमानों और यादवों को एक साथ लाने में कामयाबी हासिल की थी. इसके बाद बिहार में यादव काफी हद तक मुसलमानों के संरक्षक बन गए थे.

इस नजरिए से देखें तो कैराना के नतीजों से लगता है कि रोजमर्रा की सांप्रदायिकता से होने वाला सियासी फायदा घटने लगा है. विपक्ष की एकजुटता ने इस रणनीति की धार और कुंद कर दी है.

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