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क्यों किया ज्योतिरादित्य और यशोधरा राजे सिंधिया ने मंच साझा

सिंधिया परिवार में बुआ और भतीजे में लंबे समय से बातचीत बंद है

Updated On: Oct 03, 2017 05:11 PM IST

Dinesh Gupta
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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क्यों किया ज्योतिरादित्य और यशोधरा राजे सिंधिया ने मंच साझा

मध्यप्रदेश की राजनीति के प्रभावशाली सिंधिया राज परिवार के अंदरूनी रिश्तों में जमी बर्फ पिघलती नजर आ रही है. पिछले छब्बीस साल से संपत्ति के बंटवारे को लेकर अदालत में एक-दूसरे के खिलाफ खड़े बुआ और भतीजे के एक साथ मंच पर आ जाने से राज्य की राजनीति में बड़े बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है. बुआ यशोधरा राजे सिंधिया,शिवराज सिंह चौहान के मंत्रिमंडल में खेल मंत्री हैं. भतीजे ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस के प्रभावशाली नेता हैं. दोनों नेताओं की राजनीतिक कर्मभूमि ग्वालियर संभाग है.

ज्योतिरादित्य सिंधिया गुना से सांसद हैं. यशोधराराजे सिंधिया इस संसदीय क्षेत्र की शिवपुरी विधानसभा सीट से विधायक हैं. दोनों नेताओं के बीच सालों से संवादहीनता की स्थिति बनी हुई है. संवादहीनता के इस सेतु का तीसरा कोण राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया हैं. वसुंधरा राजे सिंधिया भी ज्योतिरादित्य सिंधिया की बुआ हैं. राज परिवार की संपत्ति के विवाद में दोनों बुआ अदालत में ज्योतिरादित्य सिंधिया के खिलाफ खड़ी हुईं हैं. बुआ और भतीजे को एक मंच पर लाने वाला कार्यक्रम स्वर्गीय माधवराव सिंधिया की प्रतिमा के अनावरण का था.

अदालत ने कहा है संपत्ति के विवाद में आपसी सुलह कर उदाहरण प्रस्तुत करें

बुआ और भतीजे के एक मंच पर आने के पीछे वजह ग्वालियर के अपर सत्र न्यायाधीश का वह आदेश बताया जा रहा है,जिसमें न्यायाधीश सचिन शर्मा ने कहा कि मामले से जुड़े सभी पक्षकर पढ़े-लिखे प्रतिष्ठित जन प्रतिनिधि हैं, इस कारण उन्हें आपसी सुलह से मामले का निराकरण कर जन सामान्य के समक्ष उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए. अदालत के आदेश के अनुसार दोनों पक्षों को 6 अक्टूबर तक समझौता प्रस्ताव पेश करना है. मामले में याचिकाकर्ता पूर्व केन्द्रीय मंत्री सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया हैं. मुकदमा बुआ राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया और यशोधरा राजे सिंधिया के खिलाफ दायर किया गया है. ज्योतिरादित्य सिंधिया ने मुकदमा वर्ष 1990 में दायर किया था. उस वक्त उनकी उम्र लगभग बीस वर्ष थी. करीब 27 साल से मुकदमा अदालत में लंबित है. सिंधिया ने अदालत से मांग की है कि सिंधिया राजवंश के उत्तराधिकारी होने के कारण पूरी संपत्ति पर उनका हक है.

ये मुकदमा उस वक्त दायर किया गया था, जब उनकी दादी विजयराजे सिंधिया और पिता माधवराव सिंधिया जीवित थे. दोनों का निधन वर्ष 2001 में हुआ है. संपत्ति के विवाद के चलते ही माधवराव सिंधिया की अपनी मां विजयराजे सिंधिया और दोनों बहनों से बोलचाल बंद रही. संपत्ति विवाद में अदालत के निर्देश के बाद यह संभावना प्रकट की जा रही है कि रिश्तों की बर्फ पूरी तरह से पिघल सकती है. जबकि जानकारों का मानना है कि मध्यस्थ के अभाव में संभव है कि अदालत को ही संपत्ति के बारे में निर्णय करना पड़े. वसुंधरा राजे सिंधिया और यशोधरा राजे सिंधिया उत्तराधिकारी कानून के तहत पिता की संपत्ति में अपना हिस्सा मांग रही हैं. संपत्ति के विवाद में ग्वालियर की हिरन वन कोठी पर कब्जे को लेकर भी आपराधिक मुकदमा अदालत में विचाराधीन है.

शिवराज सिंह चौहान करा रहे हैं संपत्ति की जांच

प्रदेश के सबसे शक्तिशाली इस शाही परिवार की महारानी विजयराजे सिंधिया के कारण ही भारतीय जनता पार्टी मध्यप्रदेश में अपने पैर जमा पाई. प्रदेश में विजयराजे सिंधिया की पहचान राजमाता के तौर पर है. उनके प्रयासों के कारण ही वर्ष 1967 में राज्य में पहली बार संविद सरकार का गठन हुआ था. विजयराजे सिंधिया ने डीपी मिश्रा के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार को गिरा दिया था. राजमाता सिंधिया उसी के बाद से कांग्रेस विरोधी राजनीति कर रही थीं. राष्ट्रीय स्वयं संघ को भी महल में पनाह उन्होंने ही दी थी. साथ ही आर्थिक मदद भी की थी. 1980 में भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ. उसमें विजयराजे सिंधिया सबसे ताकतवर नेता के तौर पर उभर कर सामने आईं.

माधवराव सिंधिया उनके इकलौते पुत्र थे. संपत्ति और राजनीतिक मतभेद इस कदर बढ़े कि दोनों नेताओं ने अलग-अलग पार्टी का दामन थाम लिया. माधवराव सिंधिया ने कांग्रेस में राजनीति की. कांग्रेस में उनके विरोधियों ने कई बार मां-बेटे को एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव मैदान में लाने की कोशिश की, जो सफल नहीं हो पाई. विजयराजे सिंधिया ने अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी यशोधरा राजे सिंधिया को चुना. ज्योतिरादित्य सिंधिया के राजनीति में आने के बाद विरोधी आज भी बुआ-भतीजे को आमने-सामने चुनाव लड़ाने की कोशिश करते रहते हैं.

ज्योतिरादित्य सिंधिया मध्यप्रदेश कांग्रेस की राजनीति का चमकदार और बेदाग चेहरा माना जाता है. अगले साल राज्य में विधानसभा के आम चुनाव होने हैं. संभावना यह प्रकट की जा रही है कि कांग्रेस इस चुनाव में सिंधिया के चेहरे को आगे रखकर चुनाव लड़ेगी. इसी संभावना के चलते मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सिंधिया परिवार की संपत्ति के दस्तावेज खंगालना शुरू कर दिए हैं. राज्यसभा सदस्य प्रभात झा लगातार संपत्ति को लेकर सिंधिया पर जुबानी हमले कर रहे हैं. राज्य की लगभग पचास विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां आज भी सिंधिया परिवार का दबदबा है.

सिंधिया की घेराबंदी के लिए अमित शाह भी सक्रिय

सिंधिया परिवार का कोई भी सदस्य आज तक लोकसभा, विधानसभा का कोई भी चुनाव नहीं हारा है. भले ही वह किसी राजनीतिक दल से चुनाव लड़े अथवा निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मैदान में हो. जनता पार्टी लहर में भी यही स्थिति रही थी. वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में जब पूरे देश में नरेंद्र मोदी का जादू चल रहा था, उस वक्त भी ज्योतिरादित्य सिंधिया चुनाव जीत गए थे. नरेंद्र मोदी ने खुद इस सीट पर चुनावी सभा की थी. चुनावी सभा में यशोधरा राजे सिंधिया ने कांग्रेस के खिलाफ भाषण दिया. ज्योतिरादित्य सिंधिया पर कोई हमला नहीं किया था.

भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में सिंधिया को शिकस्त देने की रणनीति पर काम करना अभी से शुरू कर दिया है. उन्होंने उत्तरप्रदेश के परिवहन मंत्री स्वतंत्र देव सिंह को इसकी जिम्मेदारी सौंपी है. पार्टी का मानना यह है कि बुआ-भतीजे में अबोलापन होने के बाद भी चुनाव के वक्त प्रतिबद्ध वोट ट्रांसफर हो जाता है. बुआ-भतीजे ने भी कभी आमने-सामने चुनाव नहीं लड़ा है. परिवार के यदि दोनों सदस्यों को चुनाव लड़ना होता है तो एक गुना और दूसरा ग्वालियर संसदीय सीट को चुन लेता है. विजयराजे सिंधिया और माधवराव सिंधिया के दौर से ही यह परंपरा है.

अलग-थलग पड़ रहीं हैं यशोधरा राजे

शाही परिवार के व्यापक असर के बाद भी मध्यप्रदेश में यशोधरा राजे सिंधिया भारतीय जनता पार्टी की राजनीति में अलग-थलग पड़ती जा रही हैं. कांग्रेस में जिस तरह का महत्व ज्योतिरादित्य सिंधिया को मिल रहा है, उस तरह का महत्व भाजपा में यशोधरा राजे सिंधिया को नहीं मिल रहा है. वसुंधरा राजे सिंधिया राजस्थान की मुख्यमंत्री हैं. यशोधरा राजे को शिवराज सिंह चौहान के मंत्रिमंडल में कम महत्व वाले खेल विभाग की जिम्मेदारी दी गई है. पहले उनके पास वाणिज्य एवं उद्योग जैसा मंत्रालय था. पिछले साल मंत्रिमंडल के फेरबदल में उनसे उद्योग विभाग छिन लिया गया. उनके निर्वाचन क्षेत्र में भी विकास कार्यों की गति धीमी कर दी गई है. शिवपुरी शहर पेयजल के गंभीर संकट से जुझ रहा है. यशोधरा राजे के सड़क पर उतरने के बाद भी इसमें गति नहीं आ पाई है. ज्योतिरादित्य सिंधिया के प्रयासों से शिवपुरी में केंद्र सरकार ने मेडिकल कॉलेज मंजूर किया था. शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने उस पर भी अमल नहीं किया है.

शिवपुरी के मंच पर जब बुआ-भतीजे एक साथ आए तो संबोधन में विकास की बात भी हुई. दोनों नेताओं ने विकास पर एक साथ काम करने की बात कही. सिंधिया ने अपनी बुआ को मराठी में आत्या कह कर संबोधित किया. यशोधरा राजे सिंधिया ने सांसद को भतीजे का संबोधन दिया. दोनों के एक मंच पर आने के बाद कांग्रेस और भाजपा के कार्यकर्ता एक रंग में रंगे दिखाई दे रहे थे. इससे पहले दोनों नेताओं के बीच मुख्य अतिथि को लेकर जमकर विवाद चला. अलग-अलग कार्ड भी छपे. एक कार्ड में ज्योतिरादित्य सिंधिया मुख्य अतिथि थे, तो दूसरे में यशोधरा राजे सिंधिया. कार्यक्रम नगर पालिक शिवपुरी द्वारा आयोजित किया गया था. दोनों नेता इस बात पर भी एक मत हो गए कि अगली प्रतिमा विजयराजे सिंधिया की लगेगी.

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