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केएम जोसेफ की नियुक्ति पर जेटली ने कांग्रेस को दिलाई नेहरू-इंदिरा युग की याद

अरुण जेटली का यह बयान ऐसे समय में आया है जब सरकार ने उत्तराखंड हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति के एम जोसेफ को शीर्ष अदालत में पदोन्नत करने के सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिश को वापस लौटा दिया है

Bhasha Updated On: Jun 10, 2018 10:32 PM IST

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केएम जोसेफ की नियुक्ति पर जेटली ने कांग्रेस को दिलाई नेहरू-इंदिरा युग की याद

केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली ने न्यायिक नियुक्तियों की सिफारिश को विचारार्थ कॉलेजियम के पास वापस भेजे जाने के सरकार के निर्णय पर हाय तौबा मचाने के लिए कांग्रेस पार्टी की आलोचना की.

जेटली ने याद दिलाया कि किस प्रकार से अतीत में न्यायाधीशों की वरीयता क्रम का उल्लंघन किया गया और फैसलों को प्रभावित करने के प्रयास किए गए.

अरुण जेटली का यह बयान ऐसे समय में आया है जब सरकार ने उत्तराखंड हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति के एम जोसेफ को शीर्ष अदालत में पदोन्नत करने के सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिश को वापस लौटा दिया है. हालांकि कॉलेजियम ने उनका नाम सरकार को फिर से भेजने का फैसला किया है लेकिन अभी तक औपचारिक तौर पर सरकार से संपर्क नहीं किया है.

जेटली ने फेसबुक पोस्ट और ब्लॉग में लिखा कि समय के साथ अनेक न्यायिक फैसलों में अदालत ने न्यायिक नियुक्तियों में कार्यपालिका की भूमिका को कम किया है. संविधान ने कार्यपालिका के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निर्धारित की है.

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि यह न्यायिक जवाबदेही का हिस्सा है. पिछला अनुभव बताता है कि अदालत ने न्यायिक नियुक्ति में कार्यपालिका की भूमिका को कम किया है. इस स्थिति में कार्यपालिका अपनी बात कॉलेजियम के समक्ष रख सकती है और उपयुक्त सुझाव के साथ फिर से विचार के लिए उस सिफारिश को लौटा सकती है लेकिन सिफारिश से बंधी हैं. यह संविधान के कथ्य के विपरीत है.

जेटली ने लिखा, ‘सरकार के एक मामले को वापस लौटाने को लेकर कांग्रेस पार्टी में मेरे मित्रों ने हाय तौबा मचाना शुरू किया. यह एक निर्वाचित सरकार की काफी कम की गई भूमिका का हिस्सा है कि उपयुक्त बातें कॉलेजियम के संज्ञान में लाई जाएं.’

कांग्रेस को आईना दिखाने के लिए लिखा ब्लॉग

उन्होंने कहा कि यह लोकतांत्रिक जवाबदेही के अनुरूप है. सभी को यह पता होना चाहिए कि यह इतिहास का एक महत्वपूर्ण पाठ है. ‘मैंने यह ब्लॉग लिखा है ताकि कांग्रेस पार्टी के मेरे मित्रों को आईना देखने का मौका मिल सके.’

जेटली ने अपने ब्लॉग में अतीत के कई ऐसे उदाहरण पेश किए जब सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की वरीयता क्रम का उल्लंघन किया गया था और सुप्रीम कोर्ट की सिफारिशों को दरकिनार किया गया था.

इंदिरा गांधी के समय का जिक्र करते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा, ‘प्रधान न्यायाधीश हिदायतुल्ला ने बॉम्बे हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति एस पी कोटवाल, केरल हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एम एस मेनन के नाम की सिफारिश सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत करने के लिए की. कार्यपालिका ने इन दोनों नामों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और सिफारिश को दरकिनार कर दिया. प्रधान न्यायाधीश ने कार्यवाही नहीं किए जाने पर कभी प्रश्न नहीं उठाया.’

जेटली ने प्रसिद्ध केशवानंद भारती मामले का जिक्र करते हुए कहा कि किस प्रकार से तब की सरकार ने न्यायिक स्वतंत्रता का हनन करने का प्रयास किया और संसद की मदद से संविधान के बुनियादी स्वरूप से छेड़छाड़ करके सत्ता हासिल किया.

उन्होंने कहा कि इस बारे में सुप्रीम कोर्ट का फैसला मील का पत्थर था जिसमें यह कहा गया कि संविधान के बुनियादी स्वरूप के साथ छेड़छाड़ नहीं की जा सकती है.

नेहरू के काल का जिक्र करते हुए जेटली ने कहा कि जब न्यायमूर्ति एच जे कानिया ने हाई कोर्ट में नियुक्ति के लिए नामों की सिफारिश करनी शुरू की, इसके कारण विवाद की स्थिति पैदा हो गई थी.

उन्होंने कहा कि पंडित नेहरू ने उनके (कानिया) भारत के प्रथम प्रधान न्यायाधीश होने की उपयुक्तता पर सवाल खड़ा किया था. तब सरदार पटेल ने बड़ी कुशलता से न्यायमूर्ति कानिया से जुड़े विषय में स्थिति संभाली थी.

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