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जानिए, एक मैसेज से कैसे तय हुआ कैराना लोकसभा सीट का नतीजा

अखिलेश यादव को एक मैसेज किया गया था. इससे न केवल दो पार्टियां साथ आईं, बल्कि 2019 के लोकसभा चुनाव में विपक्षी एकता की टोन भी सेट हुई

Updated On: May 31, 2018 02:04 PM IST

FP Staff

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जानिए, एक मैसेज से कैसे तय हुआ कैराना लोकसभा सीट का नतीजा

सिर्फ एक टेक्स्ट मैसेज ने सब कुछ बदल दिया. अखिलेश यादव को एक मैसेज किया गया था. इससे न केवल दो पार्टियां साथ आईं, बल्कि 2019 के लोकसभा चुनाव में विपक्षी एकता की टोन भी सेट हुई. राष्ट्रीय लोक दल यानी आरएलडी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जयंत चौधरी के मुताबिक उन्होंने अखिलेश यादव को सिर्फ एक मैसेज किया था. एक घंटे के भीतर ही उनका फोन आया और इस दौरान उन्होंने मीटिंग तय भी कर ली थी.

कैराना उप चुनाव से पहले कैसे समाजवादी पार्टी से बात हुई, इसे लेकर जयंत चौधरी विस्तार से बताते हैं. जयंत पार्टी नेता चौधरी अजित सिंह के बेटे हैं. जयंत और अखिलेश की करीब तीन घंटे लंबी मीटिंग हुई. दोनों एक खास किस्म की राजनीतिक विरासत अपने कंधों पर संभाले हुए हैं. उन्होंने तय किया कि दोनों साथ आएंगे, ताकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कैराना सीट पर बीजेपी को चुनौती दी जा सके. एक साथ आने से लेकर स्थानीय स्तर पर बगावती सुरों को खामोश करने और ग्राउंड वर्क करने तक जयंत चौधरी ने कहीं ढील नहीं दी.

जयंत ने की शुरुआत

आरएलडी के महासचिव त्रिलोक त्यागी कहते हैं, ‘जयंत ने आगे बढ़कर शुरुआत की. परिपक्वता के साथ मामले को अपने हाथ में लिया. उनकी कोशिश और अखिलेश यादव का बड़ा दिल था, जिसकी वजह से अलायंस संभव हो पाया. दोनों युवा नेता है. दोनों के सामने चमकदार भविष्य है.’

हालांकि बैठक काफी नहीं थी. जयंत के पिता अजित सिंह और अखिलेश के पिता मुलायम सिंह यादव एक समय जनता दल का हिस्सा थे. अजित सिंह के पिता पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह मुलायम सिंह यादव के मेंटॉर की तरह थे. उनकी मौत के बाद अजित सिंह और मुलायम सिंह के बीच कड़वाहट आई थी. 30 साल के बाद इनके बेटे एक साथ आए. वो भी ऐसे फॉर्मूले के साथ, जिसमें दोनों पार्टियों को नीचा न देखना पड़े.

समाजवादी पार्टी के एक सीनियर नेता कहते हैं, ‘यह जीनियस स्ट्रोक था. उन्होंने तबस्सुम हसन को चुना, जो समाजवादी पार्टी की नेता थीं. लेकिन आरएलडी के हैंडपंप वाले चिह्न के साथ चुनाव लड़ीं. दोनों पार्टियों ने अपना सिर ऊंचा रखा.’

राजनीतिक फायदे से ज्यादा कुछ

हालांकि जयंत जोर देकर कहते हैं कि राजनीतिक फायदे से ज्यादा कहीं कुछ है, जिससे दोनों पार्टियां साथ आईं. जयंत के मुताबिक, ‘हमें एहसास है कि समाज के तानेबाने के लिए बीजेपी खतरनाक है. यह सरकार एंटी फार्मर है, इसे हराया जाना चाहिए. अखिलेश और मैं काफी समय से बातचीत कर रहे थे. हमें महसूस हुआ कि यही वो लम्हा है, जो हालात को बदल सकता है.’

39 साल के चौधरी अपने 79 साल के पिता अजित सिंह की विरासत संभाल रहे हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में पूरी तरह भगवा लहर थी. 80 में 71 सीटें बीजेपी के पास हैं. बाकी पार्टियों को उसने झकझोर दिया. एक समय पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट वोटरों में लोकप्रिय रही आरएलडी भी इसमें शामिल थी. उसे एक भी सीट नहीं मिली. 2017 में भी आरएलडी की वापसी नहीं हो पाई.

आरएलडी की आखिरी लाइफलाइन

इस बार पूरी विपक्षी ताकत साथ थी. आरएलडी को आखिर लाइफलाइन मिली है. जयंत चौधरी ने मौके को दोनों हाथों से लपका है.

त्यागी कहते हैं, ‘जयंत चौधरी ने करीब दस दिन कैराना और आसपास बिताए हैं. करीब 125 गांव का दौरा किया. हर दिन 15-20 गांव में जाते थे. उन्हें वैसा ही प्यार मिला, जैसा उनके पिता को मिलता है.’ लेकिन सिर्फ मैदान पर कैंपेनिंग का ही भार जयंत के कंधों पर नहीं था. उन्हें स्थानीय स्तर पर हो रही बगावत और ईगो को भी देखना था. समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता के मुताबिक, ‘तबस्सुम के ब्रदर इन लॉ कनवर हुसैन ने भी पर्चा भरा. हमें शक था कि उन्हें बीजेपी से पैसा मिल रहा था, ताकि मुस्लिम वोट बंट जाएं. यहां पर जयंत ने स्टेट्समैन की तरह का रोल निभाया और विद्रोहियों को शांत किया.’

आरएलडी नेता के मुताबिक जयंत ने कनवर हुसैन से बात की और उन्हें नाम वापस लेने के लिए मनाया. जयंत की मौजूदगी में मीटिंग रखी गई. कनवर घर और आरएलडी में वापस आए. इसके बाद लड़ाई विपक्ष और बीजेपी के बीच थी. इस लड़ाई में विपक्षी एकता ने जीत हासिल करने में कामयाबी दर्ज की.

(न्यूज 18 के लिए उदय सिंह राणा की रिपोर्ट)

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