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इन वजहों से आप के 20 विधायक करार दिए गए 'अयोग्य'

संविधान की धारा 191 और जीएनसीटीडी एक्ट, 1991 की धारा 15 के मुताबिक अगर कोई विधायक लाभ का पद धारण करता है तो उसे अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा

FP Staff Updated On: Jan 19, 2018 05:02 PM IST

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इन वजहों से आप के 20 विधायक करार दिए गए 'अयोग्य'

चुनाव आयोग ने आम आदमी पार्टी के 21 विधायकों को अयोग्य घोषित करने के लिए राष्ट्रपति के पास सिफारिश भेज दी है. साल 2015 में केजरीवाल की दिल्ली सरकार ने एक आदेश पारित कर अपने 21 विधायकों को सात मंत्रालयों में सचिव बनाया था. इस आदेश को चुनौती देते हुए वकील प्रशांत पटेल तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के पास शिकायत लेकर गए थे. पटेल ने विधायकों पर आरोप लगाया था कि इन्होंने लाभ का पद हासिल किया है, इसलिए इन्हें अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए.

क्या है मुद्दा

13 मार्च 2015 को आप की सरकार ने एक आदेश पारित कर आपने 21 विधायकों को सचिव बनाया. वकील प्रशांत पटेल ने इनकी अयोग्यता को लेकर राष्ट्रपति के पास चुनौती दी. दिल्ली सरकार ने इसे रोकने के लिए 2015 में असेंबली में एक विधेयक पारित किया. मेंबर ऑफ लेजिसलेटिव असेंबली (रिमूवल ऑफ डिसक्वालिफिकेशन)(अमेंडमेंट बिल) के नाम से इस बिल में तत्काल प्रभाव से लाभ के पद से संसदीय सचिवों को बाहर कर दिया गया. हालांकि राष्ट्रपति ने इस अमेंडमेंट बिल को रोक लिया और आगे की कार्रवाई के लिए मामले को चुनाव आयोग को सौंप दिया.

ताज्जुब की बात यह रही कि उसी वक्त लाभ के पद मामले में दिल्ली हाई कोर्ट में एक याचिका दायर हुई जिसे उसने खारिज कर दिया. तब से चुनाव आयोग में यह मामला था कि क्या जीएनसीटीडी, 1991 के तहत संसदीय सचिवों का पद लाभ के पद में आता है. हालांकि संविधान की धारा 191 में 'लाभ का पद' का कोई जिक्र नहीं किया है, इसलिए इस पर कानून बनाने का रास्ता साफ हो गया.

फिलहाल क्या है स्थिति

आयोग के नोटिस पर आप के 21 विधायकों ने लिखित में जवाब भेजा. इसमें व्यक्तिगत सुनवाई की मांग की गई थी जिसे आयोग ने सिरे से खारिज कर दिया. आयोग ने जो सिफारिश की है, उस पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर की जरूरत होगी क्योंकि आयोग को अर्ध-न्यायिक निकाय के तौर पर देखा जाता है.

आप विधायकों के सामने विकल्प

राष्ट्रपति अगर सचिव के पद को 'लाभ का पद' मानते हुए सिफारिश को हरी झंडी दे देते हैं तो उसी वक्त से आप के 21 विधायक अयोग्य माने जाएंगे. आप के 21 विधायकों के पास अब दो विकल्प हैं-(1) आयोग के फैसले से खुद को अलग रखते हुए दुबारा चुनाव में उतरें. (2) कोर्ट में फैसले को चुनौती देते हुए आयोग के निर्णय पर स्टे लगवाएं.

प्रशांत पटेल ने क्या कहा याचिका में

संविधान की धारा 191 और जीएनसीटीडी एक्ट, 1991 की धारा 15 के मुताबिक अगर कोई विधायक लाभ का पद धारण करता है तो उसे अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा. दिल्ली असेंबली ने ऐसा कोई कानून पारित नहीं किया है जिसमें संसदीय सचिवों के पद को लाभ के पद से बाहर रखा जा सके. पटेल ने अपनी याचिका में कहा, इसलिए इन 21 विधायकों का सचिव का पद असंवैधानिक और अवैध है. इसके आधार पर इन्हें दिल्ली असेंबली की सदस्यता से अयोग्य करार दिया जाना चाहिए.

आप विधायकों का चुनाव आयोग को जवाब

आप विधायकों ने आयोग को लिखा कि शिकायतकर्ता ने इस तथ्य को छुपा लिया कि दिल्ली प्रदेश में सचिव का पद 'ऑनररी' है जिसके साथ कोई वित्तीय जुड़ा नहीं है. सचिव पद पर रहते विधायकों को किसी प्रकार की सुविधा नहीं मिलती. मसलन-दफ्तर के लिए जगह, गाड़ी, ऑफिस स्टाफ, आवास, टेक्नीकल सपोर्ट, ट्रेवेलिंग अलाउंस और अन्य किसी प्रकार का लाभ नहीं लेते.

दिल्ली सरकार का 13 मार्च 2015 का फैसला फिलहाल कोर्ट के अधीन है, इसलिए जबतक सुनवाई पूरी न हो जाए इस मामले में इंतजार किया जाना चाहिए.

डॉ. देवराव लक्ष्मण वर्सस केशव लक्ष्मण बोरकर एआईआर 1958 की धारा 1919(ए) के तहत निम्नलिखित पद लाभ के पद के दायरे में नहीं आएंगे-

(1) मंत्री पदों के विपरीत गैर-लाभकारी और बिना किसी तय वेतन के पद (2) पद/नियुक्ति के साथ कोई सुविधा न जुड़ी हो (3) कोई निश्चित दफ्तर या ऑफिस सपोर्ट सिस्टम नहीं (4) जिनके पास कोई खास काम या उत्तरदायित्व न हो. जो प्रभारी मंत्री को सरकारी कामकाज में सिर्फ मदद करते हों (5) सरकार के किसी मामले या मंत्री के काम से जुड़े प्राधिकार पर कोई ओपिनियन देने का काम नहीं होगा (6) सरकारी सूचना या कागजात तक इनकी कोई पहुंच नहीं होनी चाहिए

पटेल का क्या जवाब

13 मार्च 2015 को पारित दिल्ली सरकार के विधेयक में यह सुविधा दी गई है कि 21 संसदीय सचिव आधिकारिक कार्यों के लिए सरकारी गाड़ियों का इस्तेमाल कर सकते हैं और मंत्रियों के दफ्तर में इन्हें भी जगह दी जाएगी. विधायकों को विधानसभा में रूप आवंटित किया जाता है न कि मंत्रियों के दफ्तर में. पटेल ने अपने जवाब में कहा, दिल्ली में संसदीय सचिव का पद अपरिचित और पूरी तरह से गैर-मौजूद है. इन विधायकों ने सरकारी सुविधाओं का फायदा लिया है इसलिए ये लाभ के पद के दायरे में आते हैं.

याची के मुताबिक, गवर्मेंट ऑफ एनसीटी ऑफ दिल्ली एक्ट, 1991 के तहत संसदीय सचिवों की नियुक्ति धारा 15 का उल्लंघन है जो लाभ का पद धारण करने वाले को अयोग्य ठहराता है. पटेल ने सवाल उठाया कि अगर संसदीय सचिवों का पद लाभ का पद नहीं है तो मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इतनी जल्दी में इसे हटाने के लिए कानून क्यों बनाया.

पिछली सरकारों में संसदीय सचिव

हां पिछली सरकारों में भी संसदीय सचिव होते थे जो मुख्यमंत्री के लिए चुने जाते थे. साहिब सिंह वर्मा की सरकार में तत्कालीन बीजेपी विधायक नंद किशोर गर्ग को संसदीय सचिव नियुक्त किया गया था. शीला दीक्षित की सरकार में तत्कालीन कांग्रेस विधायक एम शर्मा, पीएस साहनी, अजय माकन संसदीय सचिव चुने गए थे.

क्या अन्य राज्यों में होते हैं संसदीय सचिव

अन्य राज्यों में भी संसदीय सचिव होते हैं जिनमें हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश, राजस्थान और कर्नाटक का नाम है. हिमाचल, पश्चिम बंगाल और गोवा में भी संसदीय सचिव नियुक्त किए गए थे लेकिन इसके खिलाफ याचिका दी गई. बाद में हाई कोर्ट ने इन नियुक्तियों को निरस्त कर दिया. पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में भी संसदीय सचिव की नियुक्ति को चुनौती दी गई है जिस पर फैसला आना बाकी है.

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