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‘जेएनयू की जंग’ में कूदे कन्हैया, हुआ इन नए नारों का ईजाद

जेएनयू छात्र संघ चुनाव में मशाल जुलूस एक तरह से शक्ति प्रदर्शन है जिसके जरिए हरेक पार्टी अपनी जीत का दावा पेश करती है

Jainendra Kumar, Ashima Kumari Updated On: Sep 05, 2017 09:34 PM IST

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‘जेएनयू की जंग’ में कूदे कन्हैया, हुआ इन नए नारों का ईजाद

जेएनयू छात्र संघ चुनाव में मशाल जुलूस एक तरह से शक्ति प्रदर्शन है जिसके जरिए हरेक पार्टी अपनी जीत का दावा पेश करती है. इस साल सबसे पहले रविवार को बापसा (बिरसा अंबेडकर फुले छात्र संगठन) ने मशाल जुलूस निकाला. यहां मशाल जुलूस का एक पारंपरिक रास्ता है जो गंगा ढाबा से शुरू होकर क्रम से गंगा, झेलम और सतलुज हॉस्टल सहित जेएनयू के लगभग सभी हॉस्टल से गुजरता है. अंत में चंद्रभागा हॉस्टल के अहाते में भाषणबाजी के साथ इसका समापन होता है.

इस बार बापसा के मशाल जुलूस में पिछले साल से कम भीड़ थी. गौरतलब है कि पिछले साल बापसा ने धमाकेदार प्रदर्शन किया था. उनके प्रेसिडेंसियल उम्मीदवार राहुल सोनपिंप्ले ने 1500 से ज्यादा वोट लाकर जेएनयू चुनाव में एक नया समीकरण पैदा कर दिया. बापसा ने पहली बार 2015 में चुनाव लड़ा था और इस साल उसका तीसरा चुनाव है.

‘नाम शबाना’

मशाल जुलूस को कवर करते हुए हमने एक बात नोटिस की कि बापसा के मशाल जुलूस में लोगों की संख्या भले पिछले साल से कम थी लेकिन उनके एक-एक सपोर्टर की आंखों में उत्साह दिख रहा था. बापसा जिस तरह की राजनीति कर रहा है उसको पसंद करने वालों की संख्या जेएनयू में लगातार बढ़ रही है. बापसा की तरफ से एक नारा लगातर लगता रहा:

नयी सदी नया जमाना नाम शबाना नाम शबाना

वैसे सिर्फ मशाल जुलूस में आए लोगों की संख्या से जेएनयू चुनाव का आकलन नहीं किया जा सकता.

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बापसा के मशाल जुलूस की एक झलकी

बिना जुलूस जीते थे कन्हैया कुमार

चर्चित छात्र नेता कन्हैया कुमार जिस साल चुनाव लड़े थे उस साल उनकी पार्टी एआईएसएफ ने मशाल जुलूस नहीं निकाला था. वैसे उनकी पार्टी के पास इतना बड़ा जनाधार भी नहीं था कि वे शक्ति का प्रदर्शन करते लेकिन इनके बावजूद कन्हैया जीते.

अगले दिन सोमवार को जेएनयू की दो बड़ी पार्टियों ने मशाल जुलूस के जरिए अपनी दावेदारी दी. एक तरफ यूनाइटेड लेफ्ट एलायंस थी तो दूसरी तरफ एबीवीपी. दोनों का समय रात के साढ़े नौ बजे था लेकिन जहां एबीवीपी का जुलूस गंगा ढाबा से शुरू होकर चंद्रभागा पर खत्म हुआ वहीं लेफ्ट यूनिटी का चंद्रभागा से शुरू होकर के गंगा ढाबा पर.

कन्हैया कुमार की पार्टी इस साल भी मशाल जुलूस नहीं निकालने जा रही. डी राजा की बेटी अपराजिता राजा उनकी पार्टी से अध्यक्ष पद की उम्मीदवार है. यह देखना दिलचस्प रहेगा कि क्या वो कन्हैया कुमार जैसा करिश्मा दुहरा पाती हैं. गौरतलब है कि कन्हैया कुमार ने प्रेजिडेंसियल डिबेट के दिन अच्छा भाषण देकर सारा खेल पलट दिया था.

‘भगवा झंडा संघी लाठी’

9 फरवरी की घटना के बाद एबीवीपी के मशाल जुलूस में लोगों की संख्या बढ़ने लगी है. जो लोग पहले खुल कर एबीवीपी का साथ देने से घबराते थे वे आज खुलकर सामने आ रहे हैं. हर साल की तरह एबीवीपी का जुलूस जोश से भरा रहा. उनके समर्थक बार बार हमारे पास आकर अपनी भारी संख्या का दावा करते रहे. एबीवीपी की अध्यक्षीय उम्मीदवार निधि त्रिपाठी बीमार चल रही है और सक्रिय कैंपेन से भी दूर है लेकिन जुलूस में वो नजर आईं और भाषण भी दिया.

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एबीवीपी का मशाल जुलूस

जेएनयू में हर हाल वक्त के हिसाब से नारे बदलते रहते हैं. एबीवीपी ने भी नया नारा ईजाद किया:

भगवा झंडा संघी लाठी निधि त्रिपाठी निधि त्रिपाठी

हम अगली रिपोर्ट में और भी पार्टियों के नए नारों से आपका परिचय कराते रहेंगे.

दौड़ में आगे लेफ्ट यूनिटी पर खतरा कायम है

लेफ्ट यूनिटी के मशाल जुलूस में सबसे ज्यादा भीड़ दिखी. इसकी एक वजह यह भी है कि तीन लेफ्ट पार्टी आइसा, एसएफआई और डीएसएफ इस यूनिटी में शामिल है. पिछली बार डीएसएफ इस यूनिटी में शामिल नहीं थी तब भी लेफ्ट यूनिटी ने चारों सीट जीती थी.

लेफ्ट यूनिटी इस चुनाव में भी सबसे आगे दिख रही है लेकिन आने वाले समय में उनके लिए राह आसान नहीं होगी. कभी इस कैंपस में लेफ्ट बनाम लेफ्ट की लड़ाई थी लेकिन अब गेम बदल रहा है. बापसा और एबीवीपी लगातार मजबूत हो रही है.

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लेफ्ट यूनिटी का मशाल जुलूस

जुलूसों के बीच कोयना मेस में एआईएसएफ की जीबीएम भी थी. पहली बार कन्हैया कुमार भी पार्टी के पक्ष में लोगों से मिलते-जुलते नजर आए. जैसा कि उनके ऊपर आरोप लगता रहा है कि वे अपनी पार्टी पर ध्यान नहीं दे रहे तो उनके कैंपेन पर भी लोगों की नजर रहेगी.

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हमारी उनसे बिहार की राजनीति और उनके ऊपर हुए हमले पर बात हुई लेकिन औपचारिक बातचीत के लिए उन्होंने मंगलवार का टाइम दिया है हम आगे वो इंटरव्यू भी साझा करेंगे.

मंगलवार को ही झेलम लॉन में यूजीबीएम है. जिसमें सभी पार्टी के उपाध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव पद के उम्मीदवार भाषण देंगे और एक-दूसरे से सवाल जवाब करेंगे. ठीक अगले दिन प्रेजिडेंसियल डिबेट होगा जो जेएनयू चुनाव का सबसे ज्यादा भीड़ जुटाऊ कार्यक्रम है.

चुनाव को मुश्किल से तीन दिन बचे हैं. प्रेसिडेंसियल डिबेट के अगले दिन ‘नो कैंपेन डे’ है. 8 सितंबर को चुनाव है. चुनाव के बाद 2-3 दिन मतगणना में लगते हैं क्योंकि आज भी जेएनयू में बेलेट पेपर पर मुहर लगा कर ही चुनाव होता है. मतगणना के दौरान एक उत्सव का माहौल होता है. फिर उसके बाद जीत का जुलूस. ये जेएनयू चुनाव के आगे की कहानी है. लेकिन कहानी अभी अधूरी है. हम हर रोज आपको ये कहानी सुनाते रहेंगे. ‘जेएनयू की जंग’ की पल-पल की जानकारी के लिए फ़र्स्टपोस्ट के साथ बने रहिए.

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