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झारखंडः 18 साल पुरानी सहयोगी AJSU छोड़ने जा रही है बीजेपी का साथ

झारखंड में बीजेपी की सबसे पुरानी सहयोगी आजसू (ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन) ने सभी 81 सीटों पर विधानसभा चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है

Updated On: Sep 08, 2018 05:46 PM IST

Anand Dutta
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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झारखंडः 18 साल पुरानी सहयोगी AJSU छोड़ने जा रही है बीजेपी का साथ

झारखंड में भारतीय जनता पार्टी की सबसे पुरानी सहयोगी आजसू (ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन) ने सभी 81 सीटों पर विधानसभा चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है. पार्टी के नेता जल्द से जल्द समर्थन वापसी पर गंभीरतापूर्वक विचार कर रहे हैं. राज्य में राजनीतिक कयासबाजी का दौर एक बार फिर जोर पकड़ चुका है.

साल 2014 में 21 नवंबर को लातेहार जिले के चंदवा में पीएम मोदी के साथ ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा लगानेवाले सुदेश महतो अब ‘अपना विकास, नहीं किसी का साथ’ राह पर चल पड़े हैं. चार विधायकों वाली पार्टी और बीजेपी की सबसे बड़ी सहयोगी पार्टी आजसू के प्रमुख ने आगामी विधानसभा अकेले दम पर लड़ने का ऐलान कर दिया है. लोकसभा चुनाव के साथ विधानसभा चुनाव की संभावनाओं के बीच पार्टी ने एक साल पहले ही यह फैसला ले लिया है.

लगातार तीन चुनावी हार झेल चुके सुदेश महतो का कहना है कि राष्ट्रीय पार्टियों को क्षेत्रीय मुद्दों-मसलों से कोई वास्ता नहीं होता. वह सिर्फ अपना ही एजेंडा थोपती हैं. बीते गुरुवार को रांची में हुए केंद्रीय कार्यसमिति की बैठक में पार्टी के नेताओं ने भी उनसे साफ कहा कि वह जल्दी ही सरकार से अपना समर्थन वापस ले, वरना इस घोषणा के बाद अगर सरकार में बने रहते हैं तो जनता को जवाब देना मुश्किल हो जाएगा.

क्या हो सकता है इसका राजनीतिक असर?

चार साल सत्ता में रहने के बाद सुदेश महतो को अब विस्थापन, पुनर्वास, रोजगार, विकास, खनिज संपदा का दोहन, स्थानीयता जैसे मुद्दों की याद आ रही है. हालांकि उनके इस फैसले से बीजेपी की चुनाव पूर्व राह आसान ही हो गई है. अब उसे सीटों के बंटवारे को लेकर खींचतान और अपने नेताओं की नाराजगी थोड़ी कम मोल लेनी पड़ेगी. जहां तक सीट का मसला है, आजसू अधिकतर जगहों पर वोटकटवा ही साबित होगी, बावजूद इसके 81 विधानसभा सीटों वाले चुनाव में 10-15 सीटों पर वह निर्णायक भूमिका में हो सकती है. ऐसा इसलिए माना जा सकता है कि राज्य में सुदेश अभी भी कुरमी जाति के सबसे बड़े नेता हैं. झारखंड में इसकी आबादी लगभग 27 प्रतिशत है. पाकुड़, साहेबगंज, दुमका को छोड़ दिया जाए तो लगभग सभी जिलों में इस जाति के लोग रहते हैं. ऐसे में अगर आजसू इसको गोलबंद करने में सफल रहती है तो आगामी चुनाव में काफी हलचल देखने को मिलेगी.

अगर समर्थन वापस लेते हैं तो?

बीते जून माह में सिल्ली विधानसभा उपचुनाव में सुदेश महतो की हार के बाद ही इसका मंच तैयार होने लगा था. नाराजगी को देखते हुए चर्चा ये चली कि उन्हें मनाने के लिए बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने उन्हें दिल्ली बुलाया है. इस बीच अमित शाह रांची आए, दो दिन रहे भी, मगर कोई बातचीत नहीं हुई. न ही उन्हें दिल्ली बुलाया गया. अब अगर आजसू अपने चार विधायकों का समर्थन वापस लेती है तो सरकार गिरेगी नहीं, हिलेगी जरूर. विधानसभा के 81 सीटों में बहुमत के लिए जरूरी 42 की संख्या में फिलवक्त बीजेपी के पास कुल 37 विधायक है. बाबूलाल मरांडी की पार्टी जेवीएम से टूटकर आए छह विधायक के अलावा मधु कोड़ा की पत्नी गीता कोड़ा और भानुप्रताप शाही का समर्थन मिलाकर संख्याबल 43 की संख्या हो जाती है. ऐसे में सरकार के गिरने की संभावना न के बराबर है.

आजसू प्रमुख सुदेश महतो से फ़र्स्टपोस्ट हिंदी ने कुछ सवालों के जवाब चाहे.

फ़र्स्टपोस्ट- सरकार से कब बाहर आएंगे?

सुदेश- फिलहाल कोई डेट फिक्स नहीं है. यह पार्टी ने 2019 चुनाव को ध्यान में रखते हुए फैसला लिया है कि उस वक्त किस रूप में जाएंगे. हम इसके लिए स्वतंत्र हैं. स्थायी सरकार के लिए हमने समर्थन दिया, अब इस सरकार का समय पूरा होने जा रहा है. क्षेत्रीय पार्टी के नाते हमारी भी अपनी प्राथमिकता है. हम दो अक्टूबर से स्वराज यात्रा राज्यभर में शुरू करने जा रहे हैं.

फ़र्स्टपोस्ट- सवाल ये था कि सत्ता से कब बाहर हो रहे हैं?

सुदेश- सरकार हमने पांच साल के लिए दिया था. जिन मुद्दों पर समर्थन दिया था, लोगों के बीच जाकर इसकी समीक्षा करने जा रहे हैं.

फ़र्स्टपोस्ट- ये समीक्षा तो सरकार के बाहर रहकर भी की जा सकती है न? सुदेश- ये तैयारी बिल्कुल उसी तरीके से चल रही है. (हंसते हुए) आप जो चाह रहे हैं, उस पर बहुत जल्द निर्णय लिया जाएगा.

फ़र्स्टपोस्ट- जिन मुद्दों पर अभी आप विरोध कर रहे हैं, सरकार में रहते हुए उसपर या तो समर्थन करते थे या चुप्पी साध लेते थे?

सुदेश- ऐसा नहीं है, हम सबसे अधिक मुखर रहे हैं. विशेष राज्य को लेकर हमने अभियान चलाया है. स्थानीयता के मुद्दे पर भी सरकार को घेरा था.

फ़र्स्टपोस्ट- आपको नहीं लगता कि उपचुनाव में बीजेपी ने आपके साथ दगाबाजी की?

सुदेश- राजनीति में जीत-हार के आधार पर किसी पार्टी या नेता मूल्यांकण नहीं किया जा सकता. जिन मुद्दों के साथ हम राजनीति करने आए थे, उसमें से कितना सफल रहा, यह मुख्य आधार है.

फ़र्स्टपोस्ट- बाबूलाल के साथ आएंगे क्या?

सुदेश- नहीं, अभी हम गठबंधन के बारे में नहीं सोच रहे हैं. ये तो लोग चुनाव जीतने के लिए करते हैं. जेएमएम-कांग्रेस कोई नया गठबंधन नहीं है. गठबंधन केवल इसको हटाओ, इसको बिठाओ के लिए होता है. इसमें पब्लिक की हार होती है.

फ़र्स्टपोस्ट- अमित शाह के साथ बैठक होनेवाली थी जिसमें आपकी नाराजगी दूर करने की चर्चा थी?

सुदेश- नहीं उनके साथ कोई बैठक नहीं हुई है. बीजेपी के केंद्रीय नेताओं से मुद्दों को लेकर समय-समय पर बातचीत होती रही है. जो भी मतभेद हुए, उनको इसकी जानकारी है.

फ़र्स्टपोस्ट- यानी विधानसभा चुनाव के वक्त ही अब सरकार से निकलेंगे?

सुदेश- देखिए यह राज्य जन आंदोलनों का रहा है, काफी समय से इसमें कमी देखी जा रही है.

फ़र्स्टपोस्ट- आप जैसे युवा नेता या तो सरकार में होते हैं या 20 लाख की गाड़ी में, भला आंदोलन होगा कैसे?

सुदेश- नहीं. अब सुदेश महतो गाड़ी से निकल सड़क पर उतरेगा. आंदोलनों को अपनी आवाज देगा.

अगर बाबूलाल साथ आ जाएं तो बदल सकती है स्थिति

यह तो तय है कि बीजेपी छोटी पार्टियों को छोड़ लगभग 90 प्रतिशत सीटों पर अकेले चुनाव लड़ेगी. जेएमएम-कांग्रेस के साथ चुनाव लड़ने जा रही है. सिंगल विधायकों वाली पार्टी को छोड़ केवल बाबूलाल मरांडी की पार्टी जेवीएम ही बचती है. हेमंत पहले ही कह चुके हैं कि बाबूलाल अब अभिभावक की भूमिका में आएं. यहां अगर सुदेश महतो और बाबूलाल एक साथ आ जाते हैं तो दोनों गठबंधनों के लिए मुश्किल खड़ी कर सकते हैं. इधर कांग्रेस राज्यसमिति में पूर्व आइपीएस और राष्ट्रीय प्रवक्ता अजय कुमार के अध्यक्ष बनने के बाद पूर्व केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय के नेतृत्व में एक गुट लगातार बगावत कर रहा है.

हाल के दिनों में सुबोधकांत और बाबूलाल मरांडी की कई बार लंबी बातचीत हो चुकी है. ऐसे में अलग खिचड़ी पकने की संभावना को किसी हाल में खारिज नहीं किया जा सकता है क्योंकि इस तिकड़ी में इतना माद्दा है कि कुरमी, आदिवासी और माइनॉरिटी वोट को काफी हद तक अपने तरफ मोड़ ले. हिंदुस्तान अखबार के राजनीतिक संपादक चंदन मिश्र कहते हैं कि अगर ऐसा हो जाता है तो यह गठबंधन कांग्रेस से कहीं मजबूत स्थिति में होगी.

सत्ता में बने रहना आजसू का एकमात्र मकसद

सुदेश महतो भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी के अच्छे दोस्त हैं. एक तरफ जहां धोनी हर हाल में जीत के लिए जाने जाते रहे हैं, वहीं सुदेश हर हार में सत्ता में बने रहने की पहचान बना चुके हैं. इसके पीछे उनका तर्क रहा है कि वह स्थाई सरकार के लिए अपना समर्थन देते हैं. ये बात भी सच है कि आज तक राज्य में किसी सरकार ने पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं किया है. राज्य बनने के बाद साल 2000, 2005 और 2009 में बीजेपी के साथ और बाद में गठबंधन कर सरकार में शामिल हो चुके हैं.

एक वक्त तो ऐसा भी आया जब साल 2006 में मधु कोड़ा सीएम बने तब आजसू के एक नेता उस सरकार में मंत्री भी थे और बाकी नेता विपक्ष में बैठते थे. हां, दोनों दोस्त में एक और समानता है धोनी मैच खत्म करने के बाद (हार हो या जीत) घर आना पसंद करते हैं, वहीं सुदेश चुनाव हारने के बाद विदेशों में छुट्टियां मनाना पसंद करते हैं.

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