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सीएनटी एसपीटी मामले में सीएम रघुवर फेल, कहीं गिरने तो नहीं लगा है ग्राफ?

बहुमत की सरकार होने के बाद भी रघुबर दास की राज्य में उद्योग के लिए जमीन की मुहिम फेल हो गई

Brajesh Roy Updated On: Aug 11, 2017 05:22 PM IST

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सीएनटी एसपीटी मामले में सीएम रघुवर फेल, कहीं गिरने तो नहीं लगा है ग्राफ?

तमाम विरोध को पार करते हुए और परंपरा की बंदिशों को तोड़ते हुए पहली दफा झारखंड की कुर्सी पर बतौर मुख्यमंत्री गैर आदिवासी रघुवर दास की ताजपोशी हुई थी. पूर्ण बहुमत के साथ एनडीए की सरकार चला रहे रघुवर दास जल्द ही अपने एक हजार दिन पूरे करने वाले हैं. किसी सरकार की स्थिरता के लिहाज से यह भी झारखंड के लिए एक इतिहास बनाने की बात होगी.

यही वजह है कि अपनी उपलब्धियों से उत्साहित मुख्यमंत्री रघुवर दास ने झारखंड की राजनीति में एक ऐसे मुद्दे को छेड़ दिया जिसमें उनकी खूब किरकिरी हुई. सीएनटी एसपीटी एक्ट में संशोधन का प्रस्ताव लाकर रघुवर दास ने न केवल विपक्ष को गला फाड़ने का मौका दिया बल्कि अपनी बीजेपी में भी कई बड़े नेता और विधायकों की दुश्मनी मोल ले ली. रघुवर के इस स्टैंड का बाहर और घर के भीतर पुरजोर विरोध हुआ.

परिणाम, आखिरकार राज्यपाल महामहिम श्रीमति द्रौपदी मुरमु ने सीएनटी एसपीटी एक्ट में सरकार के संशोधन प्रस्ताव को बैरंग वापस लौटा दिया. मुंह की खाए मुख्यमंत्री रघुवर दास ने आखिरकार गुरुवार को विधानसभा में बुझे मन से अपनी हार स्वीकारते हुए कहा, 'बिल ही मर गया तो इस मुद्दे को लेकर इतना हंगामा क्यों है बरपा?'

उधर दूसरी तरफ विपक्ष ने इसे शानदार जीत मानते हुए अपने नेता प्रतिपक्ष और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के 42 वें जन्म दिन पर पूरे 42 पॉण्ड का केक काटा. झारखंड मुक्ति मोर्चा में जीत की खुशी देर रात तक दिखती रही.

वहीं राज्य के पहले मुख्यमंत्री रहे जेवीएम सुप्रीमो बाबूलाल मरांडी ने राज्यपाल महोदया का अभिनंदन करते हुए उन्हे साधुवाद कहा. कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और विधायक सुखदेव भगत ने प्रेस कांफ्रेंस कर राज्यपाल श्रीमति द्रौपदी मुरमु के प्रति आभार जताया. सरकार में शामिल बीजेपी के सहयोगी दल एजेएसयू ने भी दबी जुबान में कहा कि राज्यपाल ने राज्य हित में फैसला लिया है.

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इतना ही नहीं राज्य में बीजेपी सरकार के तीन दफा मुख्यमंत्री रहे अर्जुन मुंडा ने भी मुस्कान के साथ आदिवासी हित में इस फैसले को बताया. मुंडा के साथ बीजेपी के ज्यादातर आदिवासी विधायकों ने भी इसपर खुशी अपने अपने तरीके से जाहिर की. यानी कुल मिलाकर मुख्यमंत्री रघुवर दास को छोड़ दिया जाए तो पूरे झारखंड ने राज्यपाल के इस फैसले का एक प्रकार से स्वागत किया.

क्या है सीएनटी एसपीटी एक्ट और क्यों हुआ रघुवर का विरोध ?

सीएनटी यानि ‘छोटनागपुर टेनेन्सी एक्ट’ और एसपीटी अर्थात ‘संथाल परगना टेनेन्सी एक्ट’. अंग्रेजी हुकूमत और फिर बाद में अविभाजित बिहार के समय वर्तमान झारखंड का भौगोलिक क्षेत्र छोटनागपुर और संथाल परगना के नाम से ही जाना जाता था.

इस क्षेत्र में रहने वाले आदिवासियों के जमीन की सुरक्षा के लिए ब्रिटिश सरकार ने 1908 में ही सीएनटी एसपीटी कानून को मंजूरी दी थी. संक्षेप में कहा जाए तो इस कानून के तहत आदिवासी जमीन को कोई भी गैर आदिवासी नहीं खरीद सकता.

विशेष परिस्थिति में यदि आदिवासी अपनी जमीन को बेचना चाहते हैं तो जिला के उपायुक्त की अनुमति से उसी पंचायत का कोई आदिवासी ही खरीदार होगा. इतना ही नहीं कानून के अनुसार आदिवासी जमीन किसी गैर आदिवासी को गिफ्ट में भी नहीं दिया जा सकता है.

यानि कानून की सख्ती ऐसी कि आदिवासी जमीन का हस्तांतरण गैर-आदिवासी को संभव ही नहीं है. दरअसल अंग्रेजी सरकार के समय ही इस क्षेत्र के आदिवासियों की जमीन हड़पने के कई मामले सामने आये थे.

आजादी के बाद भी आदिवासी जमीन विवाद के लगभग 55 हजार से ज्यादा मामले अदालत में लंबित हैं. यही वजह है कि कई संशोधनों के बाद भी सीएनटी और एसपीटी एक्ट में छेड़छाड़ की कोशिश को कभी स्वीकार नहीं किया गया.

वर्तमान सरकार से पहले झारखंड की सत्ता पर यूपीए का राज था. झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता हेमंत सोरेन के नेतृत्व में यहां लगभग डेढ़ साल वो सरकार भी चली थी. उस या उससे पहले किसी भी सरकार ने सीएनटी एसपीटी मुद्दे को छेडने का साहस नहीं दिखाया.

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वर्तमान में विकास की गति को पाने के लिए इस कानून को लचीला बनाये जाने की जरूरत भी महसूस की जाती रही. सख्त कानून होने की वजह से जंगल, पहाड़ और अकूत खनिज संपदा वाले झारखंड में संभावनाओं के बावजूद औद्योगिक विकास का रास्ता कभी तैयार नहीं हो पाया.

राजनीतिक अस्थिरता के दौर से उबरते हुए झारखंड में अब से तीन साल पहले रघुवर दास के नेतृत्व में पहली दफा पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनी. मुख्यमंत्री रघुवर दास ने राज्य में विकास की गति को एक नया आयाम देने की कोशिश के मद्देनजर सीएनटी एसपीटी एक्ट में संशोधन का प्रस्ताव लाया.

रघुवर ने राज्य में जमीन दिलाने का निवेशकों को किया था वायदा

साल भर पहले से ही रघुवर दास ने इस मुहिम पर गंभीरता पूर्वक काम करना शुरू कर दिया था. रघुवर ने उत्साह से लबरेज होकर इसी साल 16 और 17 फरवरी को ग्लोबल समिट बुलाया था. राजधानी रांची में आयोजित ‘मोमेंटम झारखंड ग्लोबल समिट’ में देश-विदेश के कई बड़े पूंजी निवेशकों का जमावड़ा भी हुआ था. लगभग साढ़े चार लाख के एमओयू पर हस्ताक्षर भी हुए.

इस दौरान सफल आयोजन के लिए प्रधानमंत्री मोदी समेत आला कमान से खूब वाहवाही भी लूटी थी. यही कारण है कि अपने भरोसे पर मुख्यमंत्री रघुवर दास ने पूंजी निवेशकों को इंडस्ट्री के लिए जमीन उपलब्ध करवाने का वायदा भी किया था.

मुख्यमंत्री ने इस कड़ी में कुछ एक परियोजनाओं को सरकारी और गैर मजरुआ जमीन भी इस दौरान मुहैया करवा दी. बावजूद इसके योजना और करार के मुताबिक बड़े कल कारखानो के लिए जमीन के बड़े हिस्से की जरूरत थी. इस बात को मुख्यमंत्री रघुवर दास ने भी भलीभांति जाना.

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मुख्यमंत्री रघुवर दास ने योजना के तहत काम शुरू किया. आला कमान का विश्वास जीत चुके रघुवर दास ने कानून के जानकारों से सलाह मशवरा कर ‘सीएनटी एसपीटी एक्ट’ में संशोधन का प्रस्ताव लाया. सदन में बहुमत का लाभ मिला और प्रस्ताव पारित भी हुआ था. फिर मंतव्य के लिए इस प्रस्ताव को राज्यपाल के पास सरकार ने भेजा.

इस दौरान मुख्यमंत्री जनता के बीच लगातार यह बताने की कोशिश करते रहे कि इस संशोधन से राज्य के विकास को गति मिलेगी. सीधे और सरल भाषा का प्रयोग करते हुए रघुवर दास ने राज्य को भरोसा दिलाया कि आदिवासियों की जमीन कोई छीन नहीं सकता. विकास के लिए आपकी जमीन को लीज पर दिए जाने का प्रावधान सरकार ने तय किया है जिसका मुआवजा सामान्य से चार गुना ज्यादा आपको मिलेगा.

जमीन मालिक और कंपनी मालिक के बीच जो लीज करार होगा यदि वह चार साल के अंदर कार्य रूप में नहीं आता है तो वह स्वतः समाप्त हो जायेगा. इसके साथ ही जमीन पर मालिकाना हक सिर्फ जमीन मालिक का रहेगा और परिवार के एक सदस्य को कंपनी में नौकरी भी दी जाएगी. राज्य के मुख्यमंत्री ने लगभग हर मंच पर संशोधन के फायदे लोगों को बताने की कोशिश की.

इधर मुख्यमंत्री अपने तरीके से राज्य के जनता को भरोसे में लेने का प्रयास कर रहे थे तो दूसरी तरफ विपक्ष ने आंदोलन का रास्ता पकड़ लिया था. इसके साथ ही विपक्ष ने राज्यपाल से लेकर देश के राष्ट्रपति तक से मिलकर गुहार लगाने का काम किया.

परिणाम सामने आया 24 मई को आखिरकार राज्यपाल श्रीमति द्रौपदी मुरमु ने आपत्तियों के साथ सीएनटी एसपीटी एक्ट में राज्य सरकार के प्रस्ताव को वापस लौटा दिया.

मुख्यमंत्री के जिद की हुई हार

राज्यपाल ने साफ कहा, 'इस प्रस्ताव का उद्देश्य व लक्ष्य स्पष्ट नहीं है. सीएनटी की धारा 21, धारा 49(1) व 49(2) में किये संशोधन स्पष्ट नहीं हैं. धारा 71 में संशोधन का प्रस्ताव तार्किक नहीं लगता. वहीं एसपीटी की धारा 13 में संशोधन प्रस्ताव राज्य हित में प्रतीत नहीं होता. यह आंशिक संशोधन है इसे पूरे राज्य में लागू नहीं किया जा सकता.' राज्यपाल महोदया ने यह भी कहा,'इस संशोधन प्रस्ताव के खिलाफ बड़ी संख्या में आवेदन मिले हैं.'

फिर झारखंड विधानसभा के शीतकालीन सत्र के दौरान स्पीकर दिनेश उरांव ने गुरुवार को सीएनटी एसपीटी एक्ट में संशोधन के प्रस्ताव को राज्यपाल द्वारा खारिज किये जाने की घोषणा की. फिलहाल एक जिद की हार हुई. झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास की यह मुहिम फेल हो गयी. मुख्यमंत्री ने कहा भी, 'इस मुद्दे पर वो अब कोई दूसरा कदम नहीं उठाने वाले राज्यपाल महोदया का पूरा सम्मान है.'

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