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जयललिता: तकदीर और वक्त जिसकी जिद से हारे

उनके सामने जो भी आया उसे या तो झुकना पड़ा या फिर वो टूट गया.

Updated On: Dec 08, 2016 08:36 AM IST

Balakumar Kuppuswamy

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जयललिता: तकदीर और वक्त जिसकी जिद से हारे

जयललिता पर किस्मत मेहरबान थी. इतनी मेहरबान कि उन्हें 'भाग्य की बेटी' कहा जा सकता है.

उनकी पूरी जिंदगी देखी जाय. पैदा होने से लेकर मौत तक. ऐसा लगता है कि सबकुछ भाग्य ने पहले से तय कर रखा था. अगर जयललिता के बचपन में कोई उनकी आने वाली जिंदगी की भविष्वाणी करता तो यह कल्पना लग सकता था. शायद कल्पना से भी परे.

अब उनके जाने के बाद आप इस बात पर हैरान हो सकते हैं कि कैसे एक महिला ने द्रविड़ राजनीति के सभी पैमानों को धता बताया. जयललिता न केवल अपनी पार्टी में सर्वशक्तिमान नेता बनीं बल्कि दक्षिण की राजनीति में भी उन्होंने सर्वोच्च मुकाम हासिल किया.

एक पुरुष प्रधान समाज मेें जिस तरह यह महिला शिखर तक पहुंची इसमें उसकी किस्मत का भी अहम योगदान था. उनकी पृष्ठभूमि, उनकी जाति और उनका नजरिया सबकुछ द्रविड़ राजनीति के तय मानदंडों से अलग था.

इन सबके बावजूद जयललिता चार चुनाव जीतीं. पिछले चुनाव में तो उन्होंने सत्ता विरोधी लहर को पछाड़ा. सत्ताधारी मुख्यमंत्री का दोबारा चुना जाना तमिलनाडु में इससे पहले कभी नहीं हुआ था.

उनकी बहुमुखी प्रतिभा का एक पहलू और भी था. जनता के बीच लोकप्रियता, प्रशासन पर नजर, सरकार चलाने की क्षमता के अलावा पार्टी पॉलिटिक्स पर भी उनकी पकड़ कभी ढिली नहीं पड़ी.

जयललिता के करीब बहुत लोग नहीं थे

जयललिता के करीब बहुत लोग नहीं थे

जयललिता ने जो हासिल किया उसके आधार पर उन्हें महान शख्सियत कहा जा सकता है. इस मुकाम को हासिल करने के लिए जया ने धारा के खिलाफ जाकर अपने मुफीद हालात तैयार किए.

इसमें कोई शक नहीं कि तमिलनाडु के इतिहास में वो एक अध्याय की तरह शामिल हो गईं हैं. आज राज्य की राजनीति के जो हालात हैं, उसे देखकर यह पूरे यकीन के साथ कहा जा सकता है कि जयललिता की बराबरी करने का माद्दा किसी राजनेता में नहीं है.

जिस तरह से पिछले विधानसभा चुनाव में जयललिता ने डीएमके को ध्वस्त किया, वह अप्रत्याशित था. जयललिता में दूर की सोच थी.

उनकी यात्रा को समझने के लिए वापस फ्लैशबैक में जाना पड़ेगा, ठीक उनकी फिल्मों की तरह.

उतार-चढ़ाव भरा सफर

जया की जिंदगी में कुछ भी पहले से तय नहीं था. न तो उनका बचपन, न फिल्मों में आना और न ही उनका बेहतरीन राजनीतिक सफर. इन सबके लिए जया ने पहले से सोच-समझकर कोई तैयारी नहीं की थी.

ऐसा भी नहीं था कि वो भविष्य देख सकती थीं. दरअसल, उनके तेज दिमाग ने हालात का सही आकलन जल्दी कर लेने की काबिलियत पैदा कर दी थी. इसी वजह से वो तमिल राजनीति में इतने दिनों तक राज करने में कामयाब रहीं.

स्कूल में जया की गिनती मेधावी छात्राओं में होती थी. अंग्रेजी साहित्य से उनका लगाव था और विश्व घटनाक्रम पर वह पैनी निगाह रखती थी. लेकिन ऊपरवाले को शायद कुछ और ही मंजूर था. किस्मत उन्हें पढ़ाई लिखाई से दूर तमिल सिनेमा की जटिल दुनिया में ले गई.

जयललिता की मां फिल्मों में थीं. उन्हें लगता था कि तमिल सिनेमा के गढ़ कोडमबक्कम की गलियों में अम्मू का भविष्य ज्यादा सुरक्षित है. जैसे ही सिनेमा की रोशनी जया पर पड़ी उनके व्यक्तित्व के कुछ पहलू बेरंग हो गए. जो उनकी आखिरी सांस तक बेजार ही रहे.

किताबों के साथ वक्त बिताए जाने वाली उम्र में अम्मू अपने पिता से भी बड़े उम्र के पुरुषों के साथ नाच रहीं थीं.

जयललिता के पिता के बारे में कोई साफ जानकारी नहीं है. बताया जाता है कि जब वो केवल दो साल की थीं तभी उनकी मौत हो गई थी. उनकी परवरिश मां की देखरेख मे हुई. जया अपनी मां की बात कभी टालती नहीं थी.

तमिल सिनेमा को अच्छे से जानने वाले शख्स ने बताया कि अपने बचपन के हालातों का जया की शख्सियत पर गहरा असर पड़ा. इसके प्रभाव में वो तुनकमिजाज और अहंकारी हो गईं.

सांचे में ढालने वाला गुरु

तस्वीर सौजन्य: शशिधरण-एमजीआर ब्लॉग्स्पॉट

तस्वीर सौजन्य: शशिधरण-एमजीआर ब्लॉग्स्पॉट

जयललिता काफी प्रतिभाशाली एक्ट्रेस थीं. फिल्मों में अपने शुरुआती दिनों में उन्होंने काफी उदार और ग्लैमरस किरदार निभाए. दक्षिण भारत की फिल्मों में पर्दे पर स्कर्ट पहनने वाली जया पहली एक्ट्रेस थीं.

आमतौर पर भारतीय फिल्मों में ग्लैमरस किरदार निभाने वाली हिरोइन बाद में बड़ी उम्र की भूमिकाएं निभाती हैं, फिर दादी या बूढ़ी अम्मा का किरदार निभाते हुए गुमनामी में कहीं खो जाती हैं. लेकिन जयललिता के लिए किस्मत ने कुछ और तय कर रखा था.

फिल्मों में काम करने के दौरान एमजी रामचंद्रन की पारखी नजर जयललिता पर पड़ी. उसके बाद जो हुआ वह सबके सामने है.

1987 की सर्दियों में जब एमजीआर की मौत हुई, तब वे तमिलनाडु के मुख्यमंत्री थे. दुनिया को अलविदा कहने से पहले एमजीआर ने अपने आखिरी 22 सालों में जयललिता के साथ 25 फिल्में की.

फिल्म इंडस्ट्री में उनका उतार-चढ़ाव देख चुके एक निर्देशक बताते हैं कि एमजीआर और जया के रिश्ते में प्यार भी था और सम्मान भी. हैरानी की बात ये है कि इस रिश्ते में प्यार और सम्मान से उलट भी बहुत कुछ था.

आमतौर पर दोनों के रिश्ते के बारे में संभल कर बोला जाता है लेकिन इसमें चटखारेदार गॉसिप का भरपूर मसाला है. पर्दे पर जयललिता ने एमजीआर के साथ मशहूर हुईं. बाद में वो उनकी राजनीतिक विरासत की उत्तराधिकारी भी बनीं. इस दौरान जयललिता के जीवन में कई ऐसी घटनाएं घटी जो कल्पना से परे थीं.

राजनीतिक छलांग 

एआईएडीएमके या अन्नाद्रमुक को करीब से जानने वाले एक टिप्पणीकार बताते हैं कि डीएमके को टक्कर देने के लिए एमजीआर को ऐसी शख्सियत की तलाश थी, जो पार्टी को और मजबूत कर सके और एकजुट रख सके.

एमजीआर ने तय किया कि पार्टी को जिताने की काबिलियत रखने वाले आकर्षक छवि के नेता ही प्रचार सचिव बनाएंगे. उनकी इस सोच के खांचे में कोई एक्ट्रेस फिट नहीं बैठ रही थी.

तमिल, अंग्रेजी और हिंदी भाषाओं की जानकार जयललिता की तुनकमिजाजी से भी एमजीआर वाकिफ थे. कई बार उन्हें खुद इसका सामना करना पड़ा था. प्रचार सचिव पद के लिए एमजीआर किसी और हीरोइन के नाम की घोषणा करने वाले थे.

लेकिन ऐसा कुछ हुआ कि उन्होंने जयललिता का नाम घोषित कर दिया. ऐसा क्या हुआ कि जयललिता यह पद हासिल करने में सफल रहीं इसके बारे में किसी को कोई सही जानकारी नहीं है.

AIADMK

आखिरकार जयललिता को ही वह पद मिला और एक चर्चित राजनीतिक यात्रा की शुरुआत हो गई. उनका यह सफर तमाम नाटकीयताओं से भरा रहा.

जया इस दौरान कभी शिखर पर पहुंची तो कभी औंधेमुंह गिरीं. हालांकि इन उतार-चढ़ाव का पहले से अनुमान लगाना मुश्किल था. यह बस एकाएक होता रहा.

शुरुआत में तो जया पार्टी बैठकों तक ही सिमटी रहीं, लेकिन राज्यसभा में आने के बाद उन्होंने अपना राजनैतिक जौहर दिखाना शुरु कर दिया. वक्त के साथ जयललिता की भाषण शैली और भीड़ से संवाद करने की कला में निखार आता चला गया.

राज्यसभा में अपने कार्यकाल के दौरान ही वो राजीव गांधी के करीब आईं. राजीव के साथ उनके रिश्ते ने आने वाले वक्त की कुछ घटनाओं में अहम भूमिका निभाई थी.

एमजीआर की राजनीतिक विरासत संभाली  

PTI

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एमजीआर की मौत के बाद उनकी पत्नी जानकी कुछ दिनों के लिए मुख्यमंत्री रहीं. स्वाभाविक तौर पर पार्टी उनके साथ जा सकती थी, जयललिता इन सबसे बेजार होकर राजनीतिक फलक से दूर जा सकती थीं. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. इसका श्रेय आप जयललिता की 'वक्र-दृष्टि' को दे सकते हैं.

1989 में चुनाव हारने से पहले अन्नाद्रमुक के अंदर काफी उठापटक चल रही थी.

यहां जयललिता की राजनीतिक सूझबूझ के आगे एमजीआर की पत्नी जानकी को किसी सूखे पत्ते की तरह अन्नाद्रमुक से अलग होना पड़ा. पार्टी को आगे बढ़ाने के लिए जयललिता के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं था. यहां से उन्होंने पार्टी को दिशा दी.

जया को किस्मत का साथ भी मिला

डीएमके के नेता करुणानिधि मुख्यमंत्री बन चुके थे. उन्हें दो साल भी नहीं हुआ था. करुणानिधि पर लिट्टे से सांठगांठ का आरोप लगाया गया. धारा 356 को लागू कर उन्हें सत्ता से बेदखल कर दिया गया.

धारा 356 पर बोम्मई और भारत सरकार के बीच सुप्रीम कोर्ट के फैसले के पहले का दौर था. ( बोम्मई केस पर सुप्रीम कोर्ट का पूरा फैसला पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें) तब राज्य सरकारों को बर्खास्त करना आम बात हुआ करती थी.

राज्य में एक बार फिर चुनाव की घोषणा हुई. अन्नाद्रमुक पर पूरी तरह से कब्जा कर चुकी जयललिता ने कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला किया. डीएमके और अन्नादमुक के बीच कांटे की टक्कर देखने को मिल रही थी. लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान लिट्टे के आत्मघाती हमले में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के बाद माहौल बदल गया.

किस्मत की करवट

जून 1991 में जयललिता पहली बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनीं. जब तक उनका कार्यकाल पूरा हुआ तब तक ऐसा माहौल बन गया था जैसे वो दोबारा कभी लौटकर नहीं आएंगी.

जयललिता सरकार पर लगे हर किस्म के भ्रष्टाचार के आरोप लगे. उनकी सरकार के मंत्रियों पर शमशान घाट के शेड बनाने में घोटाले से लेकर हर काम में पैसे लेने के आरोप लगे.

भ्रष्टाचार के आरोपों से जयललिता भी नहीं बच पाईं. शशिकला के साथ उनके संबंध भी रहस्य बने रहे. कोई दोनों को बहन कहता तो कोई दोनों को सहेली बताता. शशिकला पर समानांतर सरकार चलाने के आरोप लगे. इसे तमिल बोलचाल की भाषा में मन्नारगुड़ी माफिया कहा गया.

इन सबके बीच जया ने अपने गोद लिए बेटे सुधाकरण की शादी के लिए गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड वाली जो पार्टी दी, उससे उनके खिलाफ माहौल और खराब हो गया.

जया के समय बड़े-बड़े कटआउट लगाए गए. नेता पैरों पर गिर कर आशीर्वाद लेते थे. उनको खुश करने के चक्कर में लगे पार्टी नेताओं को जोकर कहा जाने लगा. जयललिता की छवि एक तुनकमिजाज और अहंकारी नेता की बन गई. यह सब उनकी सरकार की छवि के लिए बोझ बन गया.

जाहिर है, चुनाव में उनकी हार से किसी को हैरानी नहीं हुई. सरकार जाने के बाद भी भ्रष्टाचार के आरोप उनका पीछा नहीं छोड़ने वाले थे. उनके खिलाफ मुकदमा भी दर्ज किया गया और उनकी गिरफ्तारी भी हुई.

यह वही समय था जब उनके घर रखे फैंसी साड़ियों, सैंडलों और सोने जवाहरात बरामद किए गए.

90 के दशक का अंत होते-होते जयललिता का केंद्र की राजनीति में दखल बढ़ गया. केंद्रीय मंत्रीमंडल में अन्नाद्रमुक शामिल हुई. 1999 में उनकी सोनिया गांधी से साथ चाय पार्टी भी काफी चर्चित रही, जिसके बाद जयललिता ने वाजपेयी सरकार ने समर्थन वापस ले लिया. इसकी वजह से बीजेपी की 13 महीने पुरानी सरकार गिर गई.

ताज की वापसी

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नई सदी की शुरुआत होते-होते जयललिता और ज्यादा चिड़चिड़ी हो चुकी थी. उन पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप साबित हो चुके थे. वो जेल भी जा चुकी थीं. जिसका मतलब यह था कि वो दोबारा मुख्यमंत्री नहीं बन सकती थीं.

जयललिता के राजनीतिक सफर का मर्सिया लिखे जाने का यह सही समय था. लेकिन उनकी किस्मत ने एक बार फिर पलटी मारी. 2001 के आखिर तक जयललिता एक बार फिर फोर्ट सेंट जार्ज में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठीं थी.

बतौर मुख्यमंत्री उनकी दूसरी पारी भी बेहद नाटकीय रही. आधी रात को करुणानिधि की गिरफ्तारी, सरकारी कर्मचारियों के साथ सख्ती, कांची मठ के संतों की गिरफ्तारी और पत्रकारों के साथ ज्यादती जैसी घटनाएं चर्चा में रहीं.

लेकिन इस बार उन्होंने पहले वाली गलती नहीं की. 2001 से 2006 के बीच अपने दूसरे कार्यकाल में जयललिता ने प्रशासनिक कुशलता दिखाई. अपराध पर रोक लगाई. इस बार उनकी छवि एक सख्त मुख्यमंत्री की बनी.

इस दौरान 2004 में कुख्यात चंदन तस्कर वीरप्पन को मार गिराया गया.

इसके बावजूद वो 2006 का चुनाव  हार गईं. केंद्र में यूपीए के साथ गठबंधन करने के बाद डीएमके की राजनीतिक ताकत बढ़ चुकी थी. उन्हें वोट जुटाने में महारथ हासिल हो चुकी थी.

कुल मिलाकर जयललिता के पास वापसी का कोई मौका नहीं था.

किस्मत फिर मुस्कुराई

अन्नाद्रमुक को आखिरी दो चुनावों में मिली सफलता जयललिता के लिए जबरदस्त उपलब्धि मानी जाएगी. 2011 के बाद से वो सही मायने में तमिलनाडु की 'अम्मा' बनीं.

2016 के विधानसभा चुनाव में लगातार दूसरी बार अम्मा ने चमत्कारिक जीत दर्ज की. अम्मा की जीत से ज्यादा यह डीएमके की हार थी लेकिन चुनावी विश्वलेषण में पड़ना अभी ठीक नहीं.

सच्चाई यही है कि जनता ने डीएमके को नकार दिया. यह जया का प्रचार था और जीत भी उन्हीं की थी.

अपने आखिरी दो कार्यकाल में जया ने अपने भरोसेमंद नौकरशाहों को अहम जिम्मेदारी सौंपी. खुद को भ्रष्टाचार से दूर रखा.

जनता के लिए कल्याणकारी योजनाओं की झड़ी लगाकर जयललिता 'अम्मा' की शक्ल में जनता के दिलों में बस गईं. अम्मा कैंटीन से लेकर लैपटॉप और बच्चों के लिए साइकिल जैसी योजनाओं की नकल तो अब दूसरे राज्यों में भी हो रही है.

वो ऐसी सरकार चला रही थी जिसमें नंबर एक पर वह खुद थीं, दूसरे पर कोई नहीं. जया ही सर्वेसर्वा थीं.

अस्पताल में उनके ढाई महीने समेत उनकी जिंदगी के पिछले छह महीने भी काफी नाटकीय रहे. कई तमिल चैनलों ने पहले भी उनकी मौत की खबर चला दी.

जिंदगी के साथ भी और उसके बाद भी जया को लेकर ड्रामा और भावनाओं का प्रदर्शन दिखा. जया एक शेरनी की तरह थी और उनका दिल फौलादी था.

जिस तरह से उन्होंने सिस्टम को हिला कर रख दिया उससे नारीवादियों को वो हमेशा प्रेरणा देती रहेंगी. वो महिला सशक्तिकरण की प्रतीक थीं. ये उनकी बड़ी विरासत है.

जया के बिना तमिलनाडु की राजनीति की कल्पना करना नामुमकिन है. 35 साल से वह इसका अटूट हिस्सा रहीं.

उनका निधन न सिर्फ राज्य के लिए बल्कि पूरे देश की राजनीति के लिए बड़ी क्षति है. देश ने संघीय ताकत के चैंपियन को खो दिया.

फिल्म से लेकर राजनीति तक उनकी जिंदगी सिनेमा के पर्दे की तरह रंगीन और नाटकीय विवादों से भरी तो थी लेकिन प्रेरणादायक भी रही.

जया के सामने कोई चुनौती बड़ी नहीं थी. उनके सामने जो भी आया उसे या तो झुकना  पड़ा या फिर वो टूट गया.

यह उनकी खासियत भी थी और कमजोरी भी.

(लेखक न्यूजटुडे के संपादक हैं. यह लेख newstodaynet.com से साभार.)  

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