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अपने आप में एक अचंभा थीं जयललिता जयरामन

दक्षिण की पुरुष-प्रधान राजनीति में जयललिता का होना भी अचंभा है.

Updated On: Dec 06, 2016 08:31 AM IST

Pramod Joshi

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अपने आप में एक अचंभा थीं जयललिता जयरामन

जयललिता जयरामन को आधुनिक लोकतंत्र के जबर्दस्त अंतर्विरोधी व्यक्तित्व और भारतीय राजनीति की विस्मयकारी बातों के रूप में लंबे समय तक याद किया जाएगा. इसमे दो राय नहीं कि वे जीवट नेता रहीं हैं. यह भी सच है कि तमिलनाडु देश के सबसे प्रगतिशील राज्यों में शामिल है. कार्य, संस्कृति और उत्पादकता के मामले में दक्षिण के इस राज्य का जवाब नहीं.

अचंभित करने वाला रहा जया का सफर

मुंबई और कलकत्ता के साथ मद्रास भी भारत में आधुनिकता का संदेश वाहक है. तमिलनाडु की विलक्षण व्यक्ति-पूजा इस आधुनिकता का विलोम है. इस राज्य में समकालीन नेताओं, फिल्मी सितारों और खिलाड़ियों के मंदिर बने हैं. दक्षिण की पुरुष-प्रधान राजनीति में जयललिता का होना भी अचंभा है. उन्होंने साधारण परिवार में जन्म लिया, कठिन परिस्थितियों का सामना किया और एक बार सत्ता की सीढ़ियों पर चढ़ीं तो चढ़ती चली गईं.

जयललिता

तमिलनाडु की द्रविड़ राजनीति के केन्द्र में ब्राह्मणवादी व्यवस्था का कठोर विरोध बैठा है. और यह ब्राह्मण-स्त्री उस ब्राह्मण-विरोधी राजनीति के शिखर पर बैठी. खुद उनका मूल कर्नाटक में था, पर लंबे अरसे से दोनों राज्यों के बीच पानी को लेकर चले आ रहे टकराव में वह कर्नाटक-विरोधी राजनीति का नेतृत्व भी करती रहीं. उनका पूरा जीवन अंतर्विरोधों और विडंबनाओं से भरा रहा.

तकरीबन तीन दशक तक जयललिता ने लोहे के दस्ताने पहनकर अपनी पार्टी पर एकछत्र राज किया. अपने विरोधियों के साथ जैसा व्यवहार उन्होंने किया उसकी मिसाल भी नहीं मिलती. वे ऐसी नेता थीं, जिसके अगले कदम का अनुमान लगाना मुश्किल था. वे देश के सबसे अप्रत्याशित नेताओं में से एक थीं. उनका परिवार था और नहीं भी था. दो साल की थीं, जब पिता की मृत्यु हो गई. मां के अलावा परिवार में एक भाई था. मां ही इन्हें फिल्मों में लाईं, पर ज्यादा देर वे भी नहीं रहीं. भाई के साथ इनका संपर्क नहीं रहा.

कौन होगा जया का वारिस?

मित्रों और वफादारों को चुनने में वे हमेशा अप्रत्याशित रहीं. कब किसके साथ क्या कर दें, इसका अंदाज लगाना कठिन था. अपने सबसे नजदीकी व्यक्ति को भी दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंकने में उनका जवाब नहीं था. फिर भी उनके और शशिकला नटराजन के बीच रिश्ते रहस्य की चादर में ही रहे. इस रहस्य को कोई समझ नहीं पाया कि यह मैत्री कैसी थी. केवल शशिकला ही ऐसी थीं, जो उनके ‘कृपा-मंडल’ से बाहर जाने के बाद फिर से वापस आईं, अपने परिवार को छोड़ने के बाद.

सवाल यह है कि ऐसे चमत्कारी नेता के बाद, जिसने लोकप्रियता की अतुलित ऊंंचाइयों को छुआ, पार्टी का नेतृत्व क्या कोई दूसरा नेता कर सकेगा? पिछले दो महीने से ओ पन्‍नीरसेल्‍वम सरकार का काम देख रहे हैं, पर उन्होंने मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने की हिमाकत नहीं की. वे अपने सामने जयललिता की तस्वीर रखकर बैठते हैं.

इससे पहले जब  भ्रष्टाचार के मामले में जयललिता के जेल जाने पर भी उन्होंने सत्ता संभाली थी. तब भी वे आठ महीने तक मुख्यमंत्री कार्यालय और विधानसभा में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नहीं बैठे. उन्होंने जो परंपरा शुरू की है, क्या वही चलेगी? क्या यह पार्टी बिखर नहीं जाएगी?

जया को मिला एमजीआर का साथ

तस्वीर सौजन्य: शशिधरण-एमजीआर ब्लॉग्स्पॉट

तस्वीर सौजन्य: शशिधरण-एमजीआर ब्लॉग्स्पॉट

जयललिता को पुरातची थलाइवी (क्रांतिकारिणी) बनाने में एमजी रामचंद्रन के राजनीतिक संरक्षण का हाथ था. सिनेमा के दर्शकों के लिए वे मामूली अभिनेत्री थीं. यह संयोग है कि उन्होंने तीन ऐसे अभिनेताओं के साथ काम किया जो बड़े राजनेता भी बने. अपने राजनीतिक गुरु एमजीआर के साथ उनकी 28 फिल्में थीं और 22 फिल्में शिवाजी गणेशन के साथ. इसके अलावा 10-15 फिल्में एनटी रामाराव के साथ भी थी.

अस्सी के दशक में जब वे पहली बार राज्यसभा की सदस्य बनकर उत्तर भारत में आईं तब उनकी सौम्यता और नख-शिख ने मीडिया का ध्यान खींचा. सन 1982 में जयललिता ने एमजीआर  की सहायता से राजनीति में प्रवेश किया और अन्ना-द्रमुक की सदस्य बनीं. 1983 में उन्हें पार्टी के प्रचार सचिव के रूप में नियुक्त किया गया. सन 1984 में वे राज्यसभा की सदस्य बनीं.

एमजीआर के निधन के बाद उन्होंने पार्टी के भीतर ही अपमान और अभद्रता का एक दौर देखा. एमजीआर की पत्नी जानकी के समर्थकों ने उनके साथ काफी खराब व्यवहार किया. अभिनेता दीपन ने उनसे जो बदसलूकी की उसके कारण जनता के मन में उनके प्रति हमदर्दी पैदा हुई.

ताउम्र चापलूसों से घिरी रहीं जया 

जयललिता के समर्थक

इतने अपमान और दुर्व्यवहार से शायद जयललिता के मन में काफी कड़वाहट थी. यह कड़वाहट जून 1991 में उनके पहली बार मुख्यमंत्री बनने के बाद दूसरे तरीके से व्यक्त हुई. उनके व्यक्तित्व में अजब असहिष्णुता पैदा हो गई. वे किसी प्रकार का विरोध सहन नहीं कर पाती थीं. दूसरी ओर उनके इर्द-गिर्द के लोगों ने चाटुकारिता का जो मंजर पेश किया वह अनोखा था.

इस सरकार का पहला साल पूरा होने पर सन 1992 में तमिलनाडु के शिक्षामंत्री ने घोषणा की कि हर जिले में श्रेष्ठ शिक्षा देने वाले आदर्श विद्यालय खोले जाएंगे, जिनका नाम जयललिता विद्यालय होगा. कृषिमंत्री ने बताया कि राज्य के कृषि वैज्ञानिकों ने सुगंधित धान की नई किस्म तैयार की है, इसका नाम ‘जया-जया-92’ रखा गया है. आवासमंत्री ने हर जिले में ‘जया नगर’ बसाने की घोषणा की. शहरों में जया के नाम से स्टेडियम, विवाह मंडप और न जाने क्या-क्या बनाने की घोषणाएं होने लगीं.

वॉयलिन वादक कुण्णाकुडी वैद्यनाथन ने नया ‘राग जयललिता’ बनाया. फिल्म निर्माता जी वेंकटेश्वरन ने सुझाव दिया जैसे गांधी जयंती या कृष्ण जयंती मनाते हैं वैसे ही ‘जया जयंती’ मनाई जानी चाहिए. और उस साल 25 जून को जया जयंती मनी. दूसरी तरफ विरोधियों के लिए जयललिता कड़वा संदेश लेकर आईं थीं. विरोधियों का दमन करना उन्होंने एमजीआर से सीखा था. सन 1987 में एमजीआर की सरकार ने सिर्फ एक कार्टून को लेकर आनंद विकटन के संपादक एस बालसुब्रह्मण्यम को गिरफ्तार करवा दिया था.

जया का कठोर शासन

jayalalithaa

जयललिता के शासन में पत्रकारों की अच्छी खबर ली गई. विधानसभा अध्यक्ष ने तीन पत्रकारों केपी सुनील, एस सेल्वम और एसकेआई सुंदर, के नाम गिरफ्तारी वॉरंट जारी कर दिए. इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट ने स्थगित किया तो विधानसभा अध्यक्ष ने राज्य की पुलिस को निर्देश दिया कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना करके गिरफ्तारी करें.अंततः यह मामला सांवैधानिक बेंच तक गया और पांच साल बाद अगली विधानसभा के अध्यक्ष ने इस मामले को खत्म किया. साप्ताहिक ‘कुमुदम’ में मामूली टिप्पणी पर पार्टी के कार्यकर्ताओं ने प्रेस को तहस-नहस कर डाला.

जयललिता के प्रतिशोध की अनेक कहानियां हैं. उनसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं उनके फैसले. आईएएस अधिकारी चंद्रलेखा कभी उनकी पसंदीदा अफसर थीं, पर जब उनसे नाराज हुईं तो किसी ने चंद्रलेखा पर तेजाब डाल दिया. चंद्रलेखा प्रकरण को लेकर सुब्रह्मण्यम स्वामी ने चेन्नई में प्रेस कांफ्रेंस की तो राज्य के मुख्य सचिव ने बयान जारी किया कि किसी अखबार ने बयान छापा तो उसपर कार्रवाई की जाएगी. इंडियन एक्सप्रेस और दिनमणि पर मुकदमे दायर भी किए गए.

सन 1991 से 1996 तक चली जयललिता की पहली सरकार 1996 के विधानसभा चुनाव में जीतकर नहीं आई. पर 1998 के लोकसभा चुनाव में पार्टी एनडीए के साथ गठजोड़ करके केंद्र सरकार में शामिल हुई. इस सरकार को गिराने में भी जयललिता की भूमिका थी. सन 1999 की सोनिया-जयललिता चाय पार्टी मशहूर है, जिसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार लोकसभा में एक वोट से हार गई थी. जयललिता के साथ इस किस्म के तमाम किस्से जुड़े हैं, जिनके कारण उन्हें लंबे समय तक याद किया जाएगा.

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