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जयललिता कैसे कन्नड़ 'अम्मू' से तमिलनाडु की अम्मा बन गईं?

अम्मा की नई जीवनी में मूवी क्वीन से निडर राजनीतिक आइकन बनने की कहानी

Updated On: Dec 06, 2016 12:24 PM IST

Apoorva Sripathi

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जयललिता कैसे कन्नड़ 'अम्मू' से तमिलनाडु की अम्मा बन गईं?

जयललिता जैसी शानदार और जबरदस्त विषय की कहानी को केवल 200 पन्नों में दर्शाना शर्मनाक है. वासंती की अम्मा: जयललिताज जर्नी फ्रॉम मूवी स्टार टू पॉलीटिकल क्वीन’ लगता है कि, शुरु होने से पहले ही खत्म हो जाती है.

इसके बावजूद, हम पूर्व अभिनेत्री की जीवन के बारे में काफी कुछ जान सकते हैं. कैसे जयललिता बचपन में अम्मू का नाम से जानी जाती थीं. वो अपने पिता जयरामन की मौत से काफी टूट गई थींऔर वो कभी उबर नहीं सकीं.

वो कैसे बेंगलुरु और फिर चेन्नई गईं इस दौरान वो किस तरह वो अपनी मां वेदा के प्यार के लिए तरसती रहीं. जिनके पास अभिनेत्री बनने के बाद छोटी अम्मू के लिए  वक्त नहीं होता था.

किस  तरह अम्मू के आंखों में डॉक्टर या वकील बनने का सपना पूरा न हो सका और वो सिनेमा की कटु दुनिया के संपर्क में आ गईं ये सब इस किताब में बताया गया है.

इस किताब में इस बात का भी जिक्र है कि  कैसे वो गुजरे जमाने के मशहूर तमिल अभिनेता एमजीआर और उनकी पार्टी ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कडगम की काफी करीबी होती गईं.

एमजीआर के निधन के बाद पार्टी की बागडोर संभालने से लेकर राज्य की सही मायनों में पहली महिला मुख्यमंत्री बनी और टर्म पूरा किया. वैसे तो एमजीआर की पत्नी जानकी रामचंद्रन पहली महिला सीएम थीं जो केवल 24 दिन तक सत्ता में रह सकीं. उसके बाद जयललिता आईं और उन्हें पांच बार जनता ने सरकार बनाने के लिए चुना.

साधारण जिंदगी न जी पाने का अफसोस

Jayalalitha

सौजन्य: सोलारिस

जयललिता के बड़े होने पर, ये साफ होता गया कि वो अपनी दोस्तों की तरह पहले जैसी फिर कभी आम जिंदगी नहीं जी पाएंगी. वासंती यहां दो दोस्तों के बीच की बातचीत का एक उदाहरण देती हैं.

जयललिता अक्सर श्रीमथी से कहती थीं कि, उन्हें फिल्मी दुनिया का माहौल पसंद नहीं, यहां काम करने वाले पुरुष गंदी नीयत और गलत निगाहों से उन्हें देखते हैं. जया कहती थीं, जब मैं घर लौटती थी कई मर्द अक्सर वहां बैठे मिलते थे. उन्हें देखकर मैं काफी घबरा जाती थी. हर तरह के मर्द , लंबे, छोटे, काले, गोरे, पतले और मोटे और तेल से पुते हुए!

मां मुझे उनके साथ बैठकर बात करने को कहती थी. मुझे चिढ़ होती थी. ये साफ था कि जयललिता को लगता था उनके स्वभाव के विपरीत कामों को उन्हें करने को कहा जाता था. शायद वो अपने बाकी के सहपाठियों की ही तरह आम पारिवारिक जिंदगी जीना चाहती थीं.

किताब में घटनाओं को शुरुआत से लिखा गया है. किताब कहीं भी भटकती तो नहीं है, पर इसे बीच बीच में पढ़ना बोर बन जाता है.

अगर कोई चेन्नई में पला-बढ़ा है, या जयललिता के जीवन पर करीब से नजर रखने वालों (या काफी पढ़ने और लिखने वाले) के लिए ये किताब हैरान करने वाला नहीं है- बल्कि सीधी और गंभीर है, जयललिता की जिंदगी की कई घटनाओं को पढ़ने से लोगों को फायदा होता लेकिन उसे बहुत छोटा बना दिया गया.

शायद उत्तर में रहने वाले लोग, जो दक्षिण की राजनीति से वाकिफ नहीं हैं उनके लिए ये किताब अच्छी शुरुआत है.

वैसे ये आधिकारिक जीवनी नहीं है

हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि ये आधिकारिक जीवनी नहीं है. जयललिता की ज़िंदगी के कई मुख्य बिंदु गायब है जैसे उनकी मां और उनके भाई, शशिकला, शोभन बाबू.

वासंती ने एमजीआर के करीबी आरएम वीरप्पन से बात की, जिन्होंने ‘जयललिता को मायावी की संज्ञा दी’.  एमजीआर को जयललिता नाम की शैतान से बचाने के लिए अपने संबंध तक तोड़ लेने को राजी थे’.

हालांकि, किताब पढने पर ये साफ दिखता है कि वासंती  की सहानुभूति जयललिता के साथ है.  ये सबसे ज्यादा तब दिखता है जब वो आरएम वीरप्पन के नजरिए को लिखती थीं कि जयललिता का एमजीआर को प्रभावित करना ‘हकीकत’ से दूर है.

कन्नड़ को नकार बनीं तमिल

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फोटो: पीटीआई

वासंती ने लिखा है कि जब स्पेशल कोर्ट ने जब जयललिता को होटल मामले में दोषी करार दिया तो उनके पार्टी समर्थकों ने लड़कियों से भरी एक बस को आग लगा दी. इस घटना में तीन लड़कियों की जलकर मौत हो गई थी. वासंती लिखती हैं कि ‘जयललिता की प्रतिक्रिया एक लूजर की तरह की थी.’

बैंगलोर में श्रीरंगम तमिल ब्राह्मण परिवार में जन्मीं, जयललिता वेनिरा आडई (1965) से तमिल सिनेमा में आईं. तब से 1978 तक उनकी तूती बोलती रही.

अपने हीरो, एमजीआर से एक बार मिलने के बाद जयललिता का ईमेज मेकओवर हुआ. इसके बाद उनके जीवन में  काफी उतार-चढ़ाव आया.

वासंती की मानें तो जयललिता ने जब एक्टिंग शुरु की, तो वो एक हिम्मती और निडर महिला थीं, जिसने अगर एक बार मन बना लिया तो वह बड़ी हिम्मत के साथ अडिग रहती थीं.

जयललिता अड़ी तो फिर चाहे जो हो

वासंती की किताब में एक चैप्टर है ‘ए स्टार इज बोर्न’ चैप्टर, इसमें वो जय ललिता के हवाले से एक किस्सा बताती हैं.

जयललिता दरअसल  कर्नाटक से ताल्लुक रखने वाले मंडियम अय्यंगर समुदाय से ताल्लुक रखती हैं.

एक मैगजीन में छपे लेख में उन्होंने कहा, ‘मैं तमिल हूं, मेरी मां श्रीरंगम से संबंध रखती हैं.’इसने कर्नाटक में रहने वाले कन्नड़ों को गुस्से से भर दिया जो ये मानते थे कि वो कन्नड़ हैं. लगातार मिलती धमकियों को देखते हुए जयललिता ने मैसूर में होने वाले दसारा आर्ट फेस्टिवल में पहले से तय अपना डांस कार्यक्रम रद्द कर दिया.

दो महीने बाद, जब दसारा आर्ट फेस्टिवल के संचालकों को पता चला कि वो मैसूर के चामुंडी स्टूडियो में निर्देशक पंथुलु की फिल्म की शूटिंग कर रही हैं.

स्टूडियो के मैनेजर को खबर मिली कि जयललिता को मारने के लिए लगभग 100 प्रदर्शनकारी उस तरफ बढ़ रहे हैं. उन्होंने स्टूडियो का गेट बंद करने का आदेश दिया.

हाथों में लाठी लिए प्रदर्शनकारी गेट फांद कर अंदर आ गए और कन्नड़ में चिल्लाते हुए पूछा, ‘कहां है चुड़ैल’? दरवाजे पर खड़े गार्ड और पत्रकारों को धक्का देकर वह अंदर घुस आए. पंथुलु ने कन्नड़ में बात कर उनसे वहां से लौट जाने की विनती की. लेकिन वो जयललिता के खुद को कन्नड़ नहीं बताने के लिए माफी मांगने की मांग कर रहे थे.

जयललिता न तो उनसे डरी हुईं थीं न ही घबराईं थीं. उन्होंने प्रदर्शनकारियों की आंखों में आंख डालकर कन्नड़ में कहा, ‘मैंने कुछ गलत नहीं कहा है. मैं क्यों माफी मांगूं? मैं एक तमिल हूं, कन्नड़ नहीं!’

सोहन बाबू से हुई थी शादी

इस किताब में इस बात का जिक्र है कि कैसे जयललिता एक आत्मनिर्भर इंसान से एमजीआर के हाथों की कठपुतली बन गईं. उन्होंने उनपर और उनके पैसों को अपने नियंत्रण में ले लिया: कम शब्दों में कहें तो, वो चाहते थे कि जयललिता अंतिम समय तक उनके साथ रहें.

जो, 18 नवंबर 1972 में उनके एआईडीएमके शुरु करने तक हुआ, एमजीआर उन्हें राजनीति में व्यस्त रखते थे.

वासंती लिखती हैं कि, कुछ समय के लिए जब वो एमजीआर के संपर्क से दूर हुईं, तो तेलगू अभिनेता सोहन बाबू के साथ उनके प्रेम संबंध बने, बात शादी के बंधन तक पहुंच गई.

किताब का ज्यादातर हिस्सा अम्मा के राजनीतिक करियर पर आधारित है. जून 4 1982 को अम्मा पार्टी में शामिल हुईं, कडलूर में अपना पहला भाषण दिया, कैसे अपने और एमजीआर के बिगड़े संबंधों के साथ वो उनसे फिर जुड़ीं, आखिर में उन्होंने एमजीआर की पत्नी, जानकी रामचंद्रन को बाहर कर, उनकी राजनातिक विरासत को संभाला.

मुकुल केसवन  ने ‘द टेलीग्राफ’, में खुलासा करने वाले अपने लेख में लिखा,

प्रजातांत्रिक भारत में, व्यक्तियों की बनाई पार्टी – एमजी रामचंद्रन, एनटी रामा राव, कांशीराम, ममता बनर्जी – कभी किसी को अपनी बागडोर नहीं सौंप पातीं.

केसवन ने लिखा कि लीडर ही उत्तराधिकार की घोषणा करता है.  2001 में कांशीराम का मायावती को बनाना  एक मामला है. केसवान के अनुसार नेता की मानसिकता का पता उत्ताराधिकार की लड़ाई से चलता है.

इस लेख में केसवान ने आगे कहा कि जयललिता इसी का एक उदाहरण हैं: वो एमजीआर की विधवा से लड़कर और जीतकर उनकी निर्विवाद उत्तराधिकारी बनीं. इसका चयन पार्टी की अंदरुनी प्रक्रिया से नहीं हुई- बल्कि टूट और गुटबाजी से हुआ.

जयललिता का अकेलापन 

अपनी पूरी जिंदगी, जयललिता एक योद्धा रहीं हैं और ये किताब उसका ही सबूत है. चाहे वो पार्टी में खुद के खिलाफ लगातार फैलाए जाने वाली नफरत हो या एमजीआर की असमय मौत के बाद उन्होंने कभी हार नहीं मानी.

एक और थीम जो किताब में लगातार छाई रही, वो है अकेलापन- बिना इसे कहे पता चलता है कि ऊंचाई पर पहुंचने वाले अकेले होते हैं. महिला के मामले में तो यह और भी होता है.

इस तरह, जयललिता की कहानी हर महिला की कहानी है: मानने और स्वीकार कर लिए जाने की कोशिश करते रहने के संघर्षों से लगातार भरा हुआ. तानाशाह बने बिना कठोर निर्णय लेने की कोशिश करते रहना.

ये एक किताब है जिससे बहुत सी महिलाएं अपने को जोड़कर देखना चाहेंगी, आखिर महिला वोटरों ने ही उन्हें तमिलनाडु की सत्ता में वापस लाने में अहम भूमिका निभाई है.

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इसमें कोई शक नहीं कि वासंती ने जयललिता के जीवन का अच्छा वर्णन किया है.

एक ग्लैमरेस अदाकारा से किसी राज्य की चमक-दमक विहीन संरक्षक के रूप में परिवर्तन उनके जीवन का महत्त्वपूर्ण पल रहा है.

लेकिन वे राजनीति में क्यों आईं, एक नेता के रूप में कैसे बदली, कब उनकी लोकप्रियता एक ब्रांड के रूप में बदल गई, इन बातों पर इस किताब में और बात करने की जरूरत थी.

किताब को और ठीक से संपादित भी किया जाना चाहिए था: किताब में कई जगह तमिल के शब्द भी दिए गए हैं लेकिन उन्होंने अंग्रेजी के अनुवादित शब्दों को ही प्राथमिकता दी है.

इसकी जगह अगर वासंती ने इन तमिल शब्दों और मुहावरों को किताब के अंत में दिया होता तो यह पढ़ने में दिल के करीब आता. इसके साथ-साथ इस किताब में करुणानिधि और उनके बीच की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा पर भी और अधिक लिखने की जरूरत थी.

‘अम्मा: जयललिताज जर्नी फ्रॉम मूवी स्टार टू पॉलीटिकल क्वीन’ की किताब जयललिता के नेतृत्व और उनके द्वारा राज्य में किए गए बदलावों पर विस्तार से बताती है, लेकिन फिर भी इस किताब में और भी बहुत कुछ दिया जा सकता था.

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