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जय पांडा का निलंबन : बीजेपी के हौसले बुलंद, लेकिन मिशन 120+ की राह नहीं आसान

जय पांडा के निलंबन के पीछे बीजेपी के साथ उनकी करीबियों को भी जिम्मेदार ठहराया जा रहा है.

Updated On: Jan 26, 2018 04:33 PM IST

Amitabh Tiwari

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जय पांडा का निलंबन : बीजेपी के हौसले बुलंद, लेकिन मिशन 120+ की राह नहीं आसान

ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने केंद्रपाड़ा से लोकसभा सांसद बैजयंत जय पांडा को बीजेडी की प्राथमिक सदस्यता से तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जय पांडा को बीजेडी कार्यकर्ताओं के साथ दुर्व्यवहार, पार्टी विरोधी गतिविधियों और सांसद निधि (एमपीएलएडी फंड) के दुरुपयोग के आरोपों के चलते पार्टी से निलंबित किया गया है. पांडा को मुख्यमंत्री नवीन पटनायक का आलोचक माना जाता है.

वह कई मौकों पर पटनायक के खिलाफ मुखर हो चुके हैं. पिछले कुछ अरसे से बीजेडी की राज्य इकाई में खासी कलह चल रही थी. जिसके पीछे जय पांडा का हाथ माना जा रहा था. आरोप है कि जय पांडा की नजदीकियां बीजेपी से बढ़ गईं थीं. और बीजेपी के इशारे पर ही वह पार्टी विरोधी काम कर रहे थे.

जय पांडा के निलंबन से ओडिशा में बीजेपी के हौसले बुलंद हो गए हैं और उसके मिशन 120+ को खासा बल मिला है. हालांकि आलोचक बीजेपी के दावों का यह कह कर मजाक उड़ा सकते हैं कि ओडिशा की 147 सदस्यीय विधानसभा में महज 10 विधायकों वाली पार्टी अगले चुनाव में बहुमत मिलने के ख्वाब कैसे देख सकती है? आलोचकों का तर्क किसी हद तक ठीक भी है. लेकिन बीजेपी के दावे भी यूं ही खोखले नहीं हैं. कोई भी राय बनाने से पहले हमें अन्य राज्यों में बीजेपी के इतिहास पर भी नजर डालनी चाहिए.

साल 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी ने कई राज्यों में अप्रत्याशित उपलब्धि हासिल की है. इसलिए ओडिशा में भी बीजेपी का करिश्मा असंभव नहीं है. पिछले चुनाव की तुलना में अब असम, हरियाणा और मणिपुर में बीजेपी की सीटों की संख्या में 10 गुना से ज्यादा का इजाफा हो चुका है. खास बात यह है कि, बीजेपी ने चौंकाने वाली यह कामयाबी उन स्थायी सरकारों के खिलाफ हासिल की जो 10-15 साल से जमी हुई थीं. ओडिशा के साथ भी यह संयोग जुड़ा हुआ है, वहां नवीन पटनायक लंबे अरसे से सत्ता पर कब्जा जमाए बैठे हैं.

नवीन पटनायक पिछले 17 साल से ओडिशा के मुख्यमंत्री के पद पर काबिज हैं. अगले विधानसभा चुनाव तक उन्हें राज्य में शासन करते हुए 20 साल हो जाएंगे. नवीन पटनायक और उनकी पार्टी के खिलाफ एंटी इंकंबेंसी के लिए यह काफी लंबा और पर्याप्त समय माना जाएगा. अभी तक ओडिशा में टीना फैक्टर बीजेडी की खासी मदद करता आ रहा था. यानी कोई और विकल्प न होने की वजह से राज्य के वोटरों ने बार-बार बीजेडी पर ही भरोसा जताया.

दरअसल ओडिशा में गुटबंदी की शिकार होकर कांग्रेस लंबे अरसे से पस्त पड़ी है, जबकि बीजेपी साल 2009 तक बीजेडी के साथ गठबंधन में बंधी हुई थी. लिहाजा विश्वसनीय और स्थाई विकल्प के अभाव का फायदा बीजेडी ने जमकर उठाया.

ओडिशा में अगले विधानसभा चुनाव 2019 में लोकसभा चुनाव के साथ होंगे. प्यू सर्वे पर भरोसा किया जाए तो मौजूदा वक्त में प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता अपने चरम पर है. लिहाजा मोदी फैक्टर ओडिशा चुनाव में बीजेपी के पक्ष में पलड़ा झुका सकता है. साल 2014 के लोकसभा चुनाव में राज्य की जनता ने केंद्र की कांग्रेस सरकार के खिलाफ वोट दिया था.

अब 2019 के चुनाव में बीजेपी नारा बुलंद कर सकती है कि केंद्र और राज्य में एक ही पार्टी की सरकार होने से बेहतर विकास होता है. ओडिशा की गद्दी पर निगाहें टिकाए बैठी बीजेपी के लिए यह फॉर्मूला बेहद कारगर साबित हो सकता है.

नवीन पटनायक के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि पार्टी में कोई सेकंड इन कमांड नहीं है. यानी बीजेडी के पास ऐसा कोई नेता नहीं है, जो जरूरत पड़ने पर नवीन पटनायक का उत्तराधिकारी बन सके और उनकी जगह संभाल सके. नवीन पटनायक के परिवार के किसी सदस्य को राजनीति में रुचि नहीं है. एक वंशवादी (परिवारवादी) पार्टी के लिए यह कोई अच्छा शगुन नहीं है. ऐसा माना जाता है कि नवीन पटनायक अपने आला अफसरों (ब्यूरोक्रेट्स) पर बहुत भरोसा करते हैं. लेकिन नौकरशाहों पर पटनायक की यह निर्भरता पार्टी के ज्यादातर नेताओं को रास नहीं आती है.

बीजेपी भले ही ओडिशा में 2019 के विधानसभा चुनाव जीतने की मजबूत दावेदार हो, लेकिन सत्ता तक पहुंचने की राह में उसके सामने कई गंभीर चुनौतियां मुंह बाए खड़ीं हैं.

1. मजबूत स्थानीय नेतृत्व की कमी

बीजेपी ने ओडिशा में ज्यादातर कामयाबी नवीन पटनायक की पीठ पर सवार होकर (गठबंधन में) हासिल की है जिससे स्पष्ट हो जाता है कि राज्य में बीजेपी के पास संगठन नहीं है. ओडिशा में बीजेपी के पास ऐसा कोई चेहरा भी नहीं है जिसके नाम पर चुनाव लड़कर नवीन पटनायक को कड़ी चुनौती दी जा सके.

राज्य से संबंध रखने वाले बीजेपी के दो बड़े नेता डॉ. धर्मेंद्र प्रधान और गिरिधर गमांग जनता में ज्यादा लोकप्रिय नहीं हैं. इसके अलावा पार्टी साल 2009 तक बीजेडी के साथ गठबंधन में थी. जिससे यह बात साफ हो जाती है कि बीजेपी ने ओडिशा में अच्छे नेतृत्व के लिए खास कोशिशें नहीं कीं.

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गठबंधन के चलते बीजेपी काफी समय तक पटनायक परिवार की लोकप्रियता पर निर्भर रही है, लिहाजा राज्य में पार्टी संगठन का ढांचा हमेशा से काफी कमजोर रहा है. हालांकि आरएसएस ने ओडिशा के आदिवासी क्षेत्रों में अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज करा रखी है. आरएसएस वहां विभिन्न स्कूल और कल्याणकारी योजनाएं चला रहा है. लेकिन इसके बावजूद आरएसएस कार्यकर्ता दूसरे राज्यों की तरह ओडिशा में बीजेपी के लिए प्रचार करने में कामयाब नहीं हो पा रहे हैं.

2. बीजेपी की पहचान अब भी हिंदी भाषी पार्टी के रूप में है

बीजेपी भले ही पूरे भारत में फैलती जा रही हो, लेकिन ओडिशा में उसे एक हिंदी भाषी उत्तर भारतीय पार्टी के रूप में जाना जाता है. लिहाजा अभी भी बीजेपी को दक्षिण और पूर्वी भारत के राज्यों की बड़ी जनसंख्या की स्वीकार्यता की दरकार है. देश में 14 ऐसे राज्य हैं, जहां हिंदी भाषी लोगों की तादाद पांच फीसदी से भी कम है. इनमें से सिर्फ मणिपुर और गुजरात ही दो ऐसे राज्य हैं जहां बीजेपी सरकार बनाने में कामयाब हो पाई है.

3. सुपर मोदी बनाम मिनी मोदी के बीच मुकाबला

JAY PANDA

नवीन पटनायक की छवि भी मोदी की तरह साफ-सुथरी है. वह कुंवारे हैं लिहाजा लोगों को लगता है कि भ्रष्टाचार में लिप्त होने के लिए उनके पास कोई लालच या अन्य वजह नहीं है. लोगों का कहना है कि, नवीन भ्रष्टाचार करेगा तो 'किसके लिए कमाएगा.' नवीन पटनायक की लोकप्रियता का ग्राफ बहुत ऊंचा है. सीएसडीएस के एक सर्वे के मुताबिक, 2014 के विधानसभा चुनाव में ओडिशा के 64 फीसदी मतदाताओं ने नवीन पटनायक को मुख्यमंत्री के तौर पर अपनी पहली पसंद माना था. जबकि उस वक्त नवीन पटनायक के मुकाबले कोई अन्य नेता 10 फीसदी लोगों की पसंद भी नहीं बना पाया था.

4. ओडिशा के पश्चिमी हिस्से तक ही बीजेपी की उपस्थिति

बीजेपी ने 2014 के विधानसभा चुनाव में पश्चिमी ओडिशा में काफी अच्छा प्रदर्शन किया था, जहां पार्टी ने 30 फीसदी वोट हासिल किए थे. जबकि पूरे राज्य में बीजेपी का वोट शेयर 21.5 फीसदी रहा था. दरअसल पश्चिमी ओडिशा में कई जिले ऐसे हैं, जिनकी सीमाएं बीजेपी शासित छत्तीसगढ़ से मिलती हैं. जबकि उत्तरी ओडिशा और तटीय इलाको में बीजेपी का खास प्रभाव नहीं है. जबकि दूसरी तरफ बीजेडी का पूरे राज्य में दबदबा है.

5. नवीन पटनायक खेल सकते हैं 'उड़िया स्वाभिमान' कार्ड

यह 'गुजराती अस्मिता' कार्ड की तरह है, जिसे मोदी-शाह की जोड़ी ने गुजरात में खेला था. नवीन पटनायक अपने पिता का नाम लेकर भावनात्मक कार्ड खेल सकते हैं. चुनाव के दौरान वह राज्य के लोगों को याद दिला सकते हैं कि उनके पिता का जनता के साथ कितना गहरा रिश्ता था. इसके अलावा पटनायक परिवार को ओडिशा की राजनीति में स्थिरता लाने का श्रेय भी दिया जाता है.

6. सख्ती, दमन और विवादों से हो सकता है नुकसान

जय पांडा का नाम ओडिशा के शीर्ष उद्योगपतियों में शामिल है. स्थानीय मीडिया में भी जय पांडा की हिस्सेदारी है. राष्ट्रीय मीडिया में वह बीजेडी का सबसे ज्यादा जाना-पहचाना चेहरा रहे हैं. इसके अलावा जय पांडा उस लोकसभा सीट से सांसद हैं, जिसका प्रतिनिधित्व कई साल तक नवीन पटनायक के पिता ने किया. ऐसे में चुनावी साल में जय पांडा की कुशलता और साधन-संपन्नता बीजेपी की काफी मदद कर सकती है.

पिछले एक साल में बीजेडी के कई नेता और पूर्व विधायक बीजेपी में शामिल हो चुके हैं. जिनमें सुनील कुमार सिंह देव, गिरीश साहू, अलेखा जेना जैसे नाम भी शामिल हैं. बीजेपी नेता और केंद्रीय मंत्री जुआल ओराम का दावा है कि बीजेडी के कई पूर्व सांसद और विधायक बीजेपी के संपर्क में हैं. यह सभी नेता कभी भी बीजेडी छोड़कर बीजेपी का दामन थाम सकते हैं.

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पिछले 4 सालों के दौरान हुए विधानसभा चुनावों में अक्सर ऐसा देखा गया है कि, अन्य पार्टियों के कई विधायक बीजेपी में शामिल हुए हैं. हालांकि, बीजेपी को यह तथ्य समझने की जरूरत है कि, बाहरी विधायक पार्टी से अपनी सुविधा के मुताबिक जुड़ते हैं. लेकिन बीजेपी में बाहरी विधायकों के आने से पार्टी केडरों में असुविधा और नाराजगी पैदा हो जाती है.

ऐसा भी देखा गया है कि बीजेपी में शामिल होने और टिकट मिलने के बाद भी बाहरी विधायक चुनाव में जीत हासिल नहीं कर पाते हैं. यह तथ्य गुजरात के हालिया चुनाव में साबित भी हो चुका है, जहां बीजेपी में शामिल हुए कांग्रेस के ज्यादातर विधायक चुनाव हार गए. यह एक सबसे मुख्य वजह थी, जिसके चलते बीजेपी गुजरात में 100 सीटों का आंकड़ा पार नहीं कर पाई.

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निष्कर्ष यह है कि, बीजेपी के पास 2019 में ओडिशा में सरकार बनाने का अच्छा मौका है. हालांकि, इसके लिए बीजेपी को मोदी पर निर्भर होने के बजाए कड़ी मेहनत करना होगी. स्थानीय नेताओं को बढ़ावा देकर और उन्हें चमकाकर बीजेपी को फायदा मिल सकता है. हर चुनाव अलग होता. हर चुनाव की परिस्थितियां भी अलग होती हैं. बीजेपी के लिए जो बात यूपी में कारगर रही, जरूरी नहीं वह बात ओडिशा में भी कारगर हो.

दूसरी तरफ नवीन पटनायक को यह स्वीकार करना होगा कि, बीजेपी उनके लिए गंभीर खतरा बन चुकी है. लिहाजा नवीन पटनायक को राज्य में अपनी कल्याणकारी योजनाओं के कार्यान्वयन पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है. इसके अलावा पटनायक को अपनी पार्टी में अनुशासन लाने पर भी काम करना होगा. बहरहाल, ओडिशा में एक रोमांचक प्रतियोगिता का आगाज हो चुका है.

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