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दास्तान-ए-सियासत: चुनावों में सबसे पहले नेहरू ने शुरू किया था वायुसेना विमान का इस्तेमाल

जवाहरलाल नेहरू ने चुनाव प्रचार में सरकारी विमानों के इस्तेमाल पर सीएजी की राय मांगी थी

Surendra Kishore Surendra Kishore Updated On: Dec 04, 2017 10:57 AM IST

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दास्तान-ए-सियासत: चुनावों में सबसे पहले नेहरू ने शुरू किया था वायुसेना विमान का इस्तेमाल

कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा चुनाव प्रचार में सरकारी विमान के इस्तेमाल पर सवाल उठाया है. यह आरोप लगाते समय वे भूल गए कि देश के पहले आम चुनाव में ही तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने प्रचार के लिए सरकारी विमान के इस्तेमाल की परंपरा शुरू कर दी थी. वह परंपरा बाद में भी कायम रही. नरेंद्र मोदी कोई नया काम नहीं कर रहे हैं.

प्रधानमंत्री द्वारा सरकारी विमान के इस्तेमाल को लेकर तब के सीएजी से राय मांगी गई थी. खुद जवाहर लाल ने इस संबंध में राय मांगी थी. हालांकि सीएजी ने कहा था कि विशेष परिस्थिति में सिर्फ जवाहर लाल नेहरू ही उचित भाड़ा देकर चुनाव प्रचार के लिए वायु सेना के विमान का इस्तेमाल कर सकते हैं. पर इसे पूर्व उदाहरण नहीं माना जाएगा और अगले किसी प्रधानमंत्री को इसकी छूट नहीं रहेगी. लेकिन अगले प्रधानमंत्रियों को यह छूट मिलती रही.

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सीएजी से नीति विषयक राय मांगने के पीछे जवाहर लाल नेहरू की यही मंशा थी कि सीएजी सरकार का सिर्फ मुनीम नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने भी 2012 में कहा कि सीएजी सरकारों का कोई मुनीम मात्र नहीं है.

सरकारी विमान के इस्तेमाल पर राजनीति 

देश के पहले आम चुनाव के काम 1951 के अक्टूबर से दिसंबर तथा फिर 1952 की फरवरी में हुए थे. यानी देश भर में चुनाव कराने में तब करीब छह महीने लगे थे. जवाहर लाल कांग्रेस के सबसे सर्वाधिक लोकप्रिय नेता थे और उन्हें पूरे देश में चुनाव प्रचार करना था. उनके लिए विमान जरूरी माना गया.

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर यह सवाल उठा कि चुनाव प्रचार के लिए नेहरू जी सरकारी विमान का इस्तेमाल करें या नहीं. इस सवाल पर सरकारी स्तर पर काफी माथापच्ची हुई थी. तब तक राजनीति में लोकलाज मरा नहीं था. इस संबंध में पहले से कोई नियम था ही नहीं.

आईबी के निदेशक ने चुनाव से कुछ महीने पहले प्रधानमंत्री के निजी सचिव एम.ओ.मथाई से कहा, 'अगले आम चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री की सुरक्षा को लेकर हम चिंतित हैं. जवाहर लाल जी की जान पर खतरा बरकरार है. याद रहे कि तीन ही साल पहले ही महात्मा गांधी की हत्या हो चुकी थी. निदेशक ने कहा कि हमें चिंता होगी, यदि प्रधानमंत्री नियमित कमर्शियल फ्लाइट से यात्रा करके चुनाव प्रचार करेंगे.'

क्या व्यवस्था चाहते थे निदेशक?

निदेशक चाहते थे कि सरकार ऐसी कोई व्यवस्था कर दे ताकि भुगतान के एवज में प्रधानमंत्री चुनाव प्रचार के लिए भारतीय वायु सेना के विमान का इस्तेमाल कर सकें. मथाई ने निदेशक से कहा कि वे इस संबंध में कैबिनेट सचिव एनआर पिल्लई से बातचीत करेंगे. पिल्लई को मथाई ने यह बात बताई.

पिल्लई के सामने समस्या यह थी कि सरकारी काम के अलावा किसी अन्य काम के लिए भारतीय वायु सेना के विमान का इस्तेमाल नियमतः नहीं हो सकता था. पर दूसरी ओर सवाल प्रधानमंत्री की सुरक्षा का भी था. पिल्लई ने सलाह दी कि इस मुद्दे पर विचार के लिए एक उच्चस्तरीय सरकारी कमेटी बना दी जाए जो हर पहलू पर विचार करके कोई सलाह दे.

क्यों बनाई गई खास समिति?

प्रधानमंत्री से कैबिनेट सचिव ने बातचीत की और तीन सदस्यीय समिति बना दी गई. कैबिनेट सचिव उसके अध्यक्ष बने. रक्षा सचिव को समिति का सदस्य और आईसीएस. अधिकारी तारलोक सिंह को सदस्य सचिव बनाया गया. इस समिति ने अपनी रपट दे दी.

रिपोर्ट में प्रधानमंत्री की निजी सुरक्षा के पहलू पर जोर देते हुए कहा गया कि प्रधानमंत्री यदि किसी गैर सरकारी काम से भी कहीं जाते हैं तो उस वक्त वे प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं होते! विमान में भी वे अनेक सरकारी काम कर सकते हैं. साथ ही वे रात में जहां रुकेंगे. वहां भी तो वे सरकारी काम करेंगे.

समिति ने यह राय प्रकट की कि प्रधानमंत्री जब गैर सरकारी दौरे पर जाएंगे तो वे वायु सेना के विमान का उपयोग कर सकते हैं. पर इसके लिए वे अपनी जेब से सरकार को भाड़े का भुगतान करेंगे. भाड़े की दर वही होगी जो व्यावसायिक विमानों की होती है.

साथ ही वे विमान के रात में रुकने का भी हाॅल्टिंग चार्ज देंगे. जो गैर सरकारी व्यक्ति प्रधानमंत्री के साथ उस विमान से यात्रा करेंगे, उन्हें भी भाड़ा देना होगा. पर जो सरकारी स्टाफ और निजी सेवक उनके साथ रहेंगे, उन्हें भाड़े का भुगतान नहीं करना पड़ेगा.

कैसे बनी बात?

प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने कैबिनेट सेक्रेटरी एनआर पिल्लई से कहा कि वे इस रिपोर्ट को मंत्रिमंडल के सदस्यों के बीच वितरित करा दें ताकि उस पर कैबिनेट की बैठक में विचार हो सके और इस बारे में कोई अंतिम निर्णय किया जा सके.

एन आर पिल्लई फोटो डिविजन

एन आर पिल्लई फोटो डिविजन

इसी बीच किसी समझदार व्यक्ति ने नेहरू को सलाह दी कि यदि कैबिनेट से भी इसे आप मंजूर भी करा लेंगे तो भी इस सरकारी खर्चे का सार्वजनिक रूप से औचित्य साबित करने में दिक्कत होगी. क्योंकि न सिर्फ उस कमेटी के सदस्य आपके मातहत हैं बल्कि कैबिनेट भी आपके प्रभाव में है.

इसलिए चुनाव प्रचार के लिए वायु सेना के विमान के इस्तेमाल की मंजूरी ऐसे किसी प्रतिष्ठान की तरफ से होनी चाहिए जिस पर दिन प्रतिदिन के कामों में सरकार का सीधा असर नहीं रहता हो.

किस बात पर सहमत हुए नेहरू?

नेहरू इससे सहमत हो गए. इस सलाह के बाद इस मामले को सीएजी यानी कैग को सौंप दिया गया. इस संबंध में तब तक तैयार सारे कागजात सीएजी नरहरि राव को सौंप दिए गए. उन्होंने उन कागजात पर गौर किया. उसके बाद उन्होंने प्रधान मंत्री सचिवालय को बताया कि अभी देश की स्थिति असामान्य है.

राव ने कहा, 'प्रधानमंत्री की सुरक्षा का ध्यान रखना जरूरी है. इस पृष्ठभूमि में मैं सुरक्षा के आधार पर अपना नोट तैयार करूंगा. मेरी नजर में इसी आधार पर उन्हें वायु सेना के विमान के उपयोग की सलाह दी जा सकती है.' नरहरि राव ने यही किया. नरहरि राव ने कैबिनेट सचिव की सिफारिश को मंजूर कर लिया. पर महालेखा परीक्षक ने एक शर्त लगा दी. उन्होंने फाइल में लिखा कि यह सहूलियत सिर्फ जवाहर लाल नेहरू के लिए ही दी जा रही है.

किसी अगले प्रधान मंत्री के लिए यह पूर्व उदाहरण नहीं बनेगा. सी.ए.जी.की इस रिपोर्ट को कैबिनेट के सदस्यों के बीच वितरित कर दिया गया. कैबिनेट ने इसे मंजूर भी कर लिया. आॅडिटर जनरल के नोट को बाद में प्रेस में भी वितरित कर दिया गया. 1951 में वायु सेना के पास सिर्फ कुछ डकोटा विमान ही थे. जवाहर लाल नेहरू ने तब उसी का इस्तेमाल किया.

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