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कश्मीर समस्या का समाधान वाजपेयी फार्मूला से ही संभव: मीर वाइज

हमें पाकिस्तान को दोष देने के बजाए इसकी वजह का पता लगाना होगा

Updated On: Sep 25, 2017 09:58 PM IST

Bhasha

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कश्मीर समस्या का समाधान वाजपेयी फार्मूला से ही संभव: मीर वाइज

उदारवादी कश्मीरी अलगाववादी नेता मीरवाइज उमर फारूक ने आज कहा कि वह केन्द्र के साथ बिना शर्त बातचीत के हक में हैं. यह बातचीत अगर वाजपेयी सरकार के फार्मूले के अनुसार होगी तो इसकी सफलता की गुंजाइश सबसे ज्यादा होगी.

कश्मीरियों के ‘मीरवाइज’ अर्थात धार्मिक नेता फारूक ने कहा कि ‘वाजपेयी फार्मूला’ में सभी पक्षों को शामिल किया गया था. उन्होंने इस संदर्भ में कश्मीरी पृथकतावादी नेताओं को नई दिल्ली के साथ-साथ इस्लामाबाद और पाक अधिकृत कश्मीर में उनके समकक्षों से एक साथ संवाद की इजाजत दिए जाने की बात कही.

उन्होंने कहा, ‘हम बातचीत के लिए एक ऐसी व्यवस्था चाहते हैं, जिसमें महज तस्वीरें खिंचवाने का मौका ही नहीं बन जाने देना चाहते.’ नतीजे की फिक्र किए बिना बातचीत शुरू करनी चाहिए. बस यह प्रक्रिया संजीदा हो.’ मीरवाइज (44) ने हाल ही में केन्द्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह की ओर से बातचीत के प्रस्ताव का स्वागत किया था.

पाकिस्तान के शामिल होने की सूरत में संभावना कम हो सकती है 

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हालांकि उनके इस प्रस्ताव पर सरकार से समर्थन मिलने की संभावना कम ही है. क्योंकि वह इसके तहत बातचीत में पाकिस्तान को भी शामिल करने की बात कर रहे हैं. 1990 में हिज्बुल मुजाहिदीन के हाथों अपने पिता मीरवाइज फारूक की हत्या के बाद 16 बरस की उम्र में मीरवाइज बने उमर फारूक कहते हैं, ‘सरकार को सिर्फ इतना करने की जरूरत है कि वह उस समय :वाजपेयी सरकार: की पुरानी फाइलों का अध्ययन करे. आप इसे कोई भी नाम दे सकते हैं: त्रिपक्षीय, त्रिकोणीय या फिर तीन तरफा बातचीत. मगर रास्ता यही है.’

उन्होंने याद दिलाया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पिछले माह स्वतंत्रता दिवस पर अपनी तकरीर में कहा था कि कश्मीर मसले को गालियों या गोलियों से नहीं बल्कि कश्मीरियों को गले लगाकर ही हल किया जा सकता है.

उन्होंने कहा, ‘यह स्वागत योग्य बयान था और हमने सोचा कि सरकार अपनी कश्मीर नीति पर फिर से विचार कर रही है. हालांकि इसमें कोई बदलाव नहीं आया है. दरअसल यह और ज्यादा कट्टर हो गई है. अलगाववादी नेताओं को बदनाम करने का अभियान जारी है.’

कश्मीर की समस्या को कश्मीरियों के नजर से देखना होगा 

उन्होंने कहा कि उदारवादी अलगाववादियों की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि भारत कश्मीर समस्या को पूरी तरह पाकिस्तान की देन मानता है और इसे सीमापार आतंकवाद के नजरिए से देखता है. ऐसे में बाकी पूरे देश को कश्मीर समस्या को कश्मीरियों के नजरिए से दिखा पाना बहुत मुश्किल है, जिनकी अपनी आकांक्षाएं हैं.

फारूक कहते हैं, ‘भारत के लोगों के साथ संपर्क की कोई गुंजाइश नहीं हैं. दिल्ली में बैठे उदारवादी भी हमसे बात करने से डरते हैं. हमें पत्थरबाज कश्मीरी कहा जाता है. लड़के पाकिस्तान गए बिना बंदूकें उठा रहे हैं. हमें पाकिस्तान को दोष देने के बजाए इसकी वजह का पता लगाना होगा.’

उन्होंने कहा, ‘इतना दर्द, गुस्सा और नाखुशी है, जिसे दूर करना होगा, वरना कश्मीर एक बार फिर 1990 के दशक में चला जाएगा, जब उग्रवाद अपने चरम पर था.’

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