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जम्मू-कश्मीर: आखिर टूटना ही था उत्तर और दक्षिणी ध्रुव का मिलन

आखिर तीन साल तक विपरीत विचाराधारा वाली पीडीपी के साथ रहने के बाद बीजेपी को समर्थन वापसी का बड़ा फैसला क्यों लेना पड़ा?

Kinshuk Praval Kinshuk Praval Updated On: Jun 19, 2018 05:36 PM IST

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जम्मू-कश्मीर: आखिर टूटना ही था उत्तर और दक्षिणी ध्रुव का मिलन

आखिर तीन साल बाद जम्मू-कश्मीर में सत्ता का वो गठबंधन टूट ही गया जिसे उत्तरी-दक्षिणी ध्रुव का मिलन बताया गया था. विचारधाराओं में मतभेद की वजह से घाटी में सरकार बनने के साथ ही भविष्य पर सवालिया निशान लगने शुरू हो चुके थे. इसके बावजूद तीन साल तक रिश्तों की रेल कभी पटरी पर तो कभी जमीन पर हिचकोले खाते हुए आगे बढ़ती रही और अब ब्रेक फेल हो गए.

मार्च 2015 में पीडीपी के नेता मरहूम मुफ्ती मोहम्मद सईद ने बीजेपी के साथ गठबंधन को उत्तर और दक्षिण ध्रुव का मिलन बताया था. वो ये जानते थे कि घाटी में अलगाववादियों के प्रति नरम रुख रखने की वजह से ही उनकी पार्टी सत्ता के पायदान पर पहुंची है. तभी उन्होंने घाटी में शांतिपूर्ण चुनाव होने के लिए पाकिस्तान, हुर्रियत और आतंकी संगठनों का भी शुक्रिया कर दिया था. मुफ्ती का ये बयान बीजेपी को असहज कर देने वाला था. लेकिन तबतक बीजेपी देश के मुस्लिम बहुल राज्य में पहली दफे सरकार बनाने के लिए पीडीपी से गठबंधन का बड़ा राजनीतिक फैसला ले चुकी थी.

बीजेपी ने क्यों लिया ये फैसला?

अब बीजेपी ने उसी पीडीपी से समर्थन वापसी का भी ऐलान कर दिया. बीजेपी का कहना है कि दोनों के बीच एक कॉमन मिनिमम प्रोग्राम के तहत तीन साल तक आम सहमति रही लेकिन अब जम्मू-कश्मीर के हालातों की वजह से उसे समर्थन वापसी का फैसला लेना पड़ा है. आखिर तीन साल तक विपरीत विचाराधारा वाली पीडीपी के साथ रहने के बाद बीजेपी को समर्थन वापसी का बड़ा फैसला क्यों लेना पड़ा?  क्या जम्मू-कश्मीर में सीजफायर की मियाद न बढ़ाने की वजह से दोनों के बीच तनाव बढ़ा या फिर बीजेपी को ये लगने लगा कि कश्मीर में बेकाबू होते हालात के चलते सत्ता की कुर्बानी देने का सही वक्त आ गया है?

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दरअसल बीजपी और पीडीपी के बीच के बीच वैचारिक मतभेद कभी कम हो ही नहीं सकते थे. कश्मीर के बिगड़ते हालात के लिए भारत जिस तरह से पाकिस्तान के खिलाफ सबूत दर सबूत जुटा रहा था तो इसके उलट जम्मू-कश्मीर की सीएम महबूबा मुफ्ती विधानसभा में कश्मीर के समाधान के लिए पाकिस्तान से बातचीत की वकालत कर रही थीं. पीडीपी की पार्टी लाइन पर चलते हुए महबूबा मुफ्ती अलगाववादियों के सुरों से सुर मिलाने लगी थीं. उन्हें कश्मीर में सेना के ऑपरेशन ऑल आउट से अपनी सियासी जमीन के दरकने का डर सताने लगा था.

सीजफायर के लिए पीडीपी का दबाव

घाटी में सीजफायर के ऐलान के पीछे भी कहीं न कहीं पीडीपी के दबाव की झलक सामने थी. सीजफायर के बावजूद घाटी में आतंकियों के हमले में कोई कमी नहीं आई थीं. यहां तक कि ईद के दिन भी पत्थरबाजों की भीड़ सड़कों पर उतरी थी और घाटी में कई जगहों पर पाकिस्तान और आईएस के झंडे लहराए गए थे. इन हालातों में बीजेपी को सरकार और सेना की कार्रवाई में से किसी एक को चुनना था क्योंकि वो फैसला उसकी छवि के लिए जरूरी था. वैसे भी घाटी में  एक महीने का सीजफायर लागू करने पर सवाल उठ रहे थे.

एक तरफ गृहमंत्री घाटी में आतंकियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की बात कर रहे थे तो दूसरी तरफ रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण भी कश्मीर में आतंकी हमलों के लिये पाकिस्तान को गंभीर नतीजे भुगतने की चेतावनी दे रही थीं. लेकिन इनसे अलग महबूबा अपनी पार्टी को पत्थरबाजों और सेना की कार्रवाई के बीच असहज महसूस कर रही थीं. वो अलगाववादियों और पाकिस्तान से बातचीत की अपील कर रही थीं.

शोपियां फायरिंग के मामले में सेना पर एफआईआर दर्ज करवा कर महबूबा मुफ्ती ने अपनी राजनीतिक हताशा का ही परिचय दिया था. यहां तक कि उन्होंने जम्मू-कश्मीर विधानसभा में ये तक कहा था कि ‘घाटी में खूनी-खेल को रोकने के लिए पाकिस्तान से बातचीत की जरूरत है.’

जबकि सरकार बनाते समय बीजेपी के एजेंडे में ये बात साफ थी कि वो कश्मीर के मसले पर पाकिस्तान और अलगाववादी हुर्रियत नेताओं से बातचीत नहीं करेगी जिसे मरहूम मुफ्ती मोहम्मद सईद ने ठंडे बस्ते में डालने की बात की थी. लेकिन पीडीपी लगातार अलगाववादी नेताओं से बातचीत करने पर जोर दे रही थीं. पीडीपी की पाकिस्तान के प्रति घोषित नीति और अलगाववादियों के प्रति नरम रुख धीरे धीरे घाटी में  बीजेपी समर्थकों में हताशा की जमीन तैयार करने लगी थी.

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खुलकर सामने आ रहे थे मतभेद

तीन साल के बीजेपी-पीडीपी गठबंधन में दूसरे मुद्दों पर भी मतभेद खुलकर उभर चुके थे. बीजेपी धारा 370 और अनुच्छेद 35A के सख्त खिलाफ थी और इन्हें खत्म कराना चाहती थी. लेकिन सीएम महबूबा मुफ्ती ने सख्त ऐतराज जताते हुए कहा था कि अगर जम्मू-कश्मीर के ‘विशेष दर्जे’ से छेड़छाड़ की गई तो कश्मीर में तिरंगा उठाने वाला कोई नहीं बचेगा. जबकि बीजेपी मानती है कि देश के संविधान में अनुच्छेद 370 शामिल करना ही जम्मू-कश्मीर की समस्या की असली वजह है.

इसी तरह दोनों के बीच घाटी में सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम यानी अफ्सपा को लेकर विरोध था. पीडीपी ने तो चुनाव प्रचार में ही वादा कर दिया था कि वो अफ्सपा को धीरे-धीरे खत्म करने का काम शुरू करेगी. जबकि बीजेपी शुरू से ही इस कानून के बचाव में थी.

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बहरहाल ये सवाल उठ सकता है कि बीजेपी ने सीजफायर खत्म होने के बाद ही इतना बड़ा फैसला क्यों लिया? बीजेपी अब ये कह सकती है कि उसने घाटी में शांति के लिये सीजफायर जैसा फैसला लिया तो सत्ता की कुर्बानी भी दे दी. ईद के बाद इस सियासी कुर्बानी से जहां बीजेपी को साल 2019 में चुनावी मैदान में पीडीपी, कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के खिलाफ खुला मैदान मिलेगा तो वो ये भी ताल ठोककर कह सकेगी कि उसने देश और सेना के स्वाभिमान के लिए सत्ता से समझौता नहीं किया.

लेकिन इस गठबंधन के टूटने से पीडीपी के हाथ भी खाली नहीं हुए हैं. उसके पास स्थानीय लोगों की सहानुभूति भी रहेगी तो साथ ही वो भी ये दावा कर सकेगी कि उसने सत्ता में रहते हुए बीजेपी को धारा 370 को छूने नहीं दिया. बहरहाल घाटी में राजनीति जारी है. अब शासक बदल गए हैं और कश्मीर पर सियासत के अलग-अलग राग शोर सा सुनाई दे सकते हैं

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