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हिमाचल में बीजेपी ने कहा जयराम, धूमल को गहरा धक्का

जयराम ठाकुर और प्रेम कुमार धूमल ने गले मिलकर दिखाया कि पार्टी में सबकुछ ठीक है, लेकिन ऐसा नहीं है

Updated On: Dec 24, 2017 07:38 PM IST

Amitesh Amitesh

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हिमाचल में बीजेपी ने कहा जयराम, धूमल को गहरा धक्का

शिमला की सर्द वादियों का एक खूबसूरत नजारा. बीजेपी विधायक दल के नेता चुने जाने के बाद जयराम ठाकुर ने प्रेम कुमार धूमल का पैर छुआ. धूमल ने तुरंत उन्हें गले लगा लिया.

27 दिसंबर को जयराम ठाकुर हिमाचल प्रदेश के नए मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने जा रहे हैं. जयराम ठाकुर के प्रति पूर्व मुख्यमंत्री के इस प्यार से सबको यह संदेश देने की कोशिश की गई कि हिमाचल में अब सबकुछ ठीक हो गया है.

लेकिन, जितना कैमरे के सामने सहज लग रहा था, अंदर खाने इतनी सहजता से जयराम ठाकुर का चुनाव नहीं हो पाया. हिमाचल में पांच साल बाद कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने के बाद बीजेपी ने लगभग दो-तिहाई बहुमत से वहां जीत दर्ज की. लेकिन, चुनाव जीतने से कहीं ज्यादा मशक्कत पार्टी को अपना मुख्यमंत्री चुनने में लग गया.

क्यों करना पड़ा इंतजार?

दरअसल, हिमाचल प्रदेश के चुनाव प्रचार के दौरान ही बीजेपी ने पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल को सीएम पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया था. पार्टी के भीतर धूमल समर्थकों का दबाव काम कर गया. नेता घोषित करने की पार्टी की रणनीति के तहत ही चुनाव के ठीक पहले एक चुनावी रैली में ही पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने प्रेम कुमार धूमल के नाम का ऐलान कर दिया.

लेकिन, जब चुनाव परिणाम आया तो फिर बीजेपी को बड़ी विजय हासिल हुई. लेकिन धूमल खुद चुनाव हार गए. बस फिर क्या था, धूमल विरोधी धड़े को मौका मिल गया. चुनाव हार चुके एक नेता को मुख्यमंत्री बनाने का भी विरोध होने लगा.

धूमल बनाम नड्डा की लड़ाई से हुई देरी !

हालांकि धूमल की हार को लेकर भी शिमला में चर्चाओं का बाजार गर्म रहा. अपनी परंपरागत हमीरपुर की सुरक्षित सीट को छोड़कर बगल की सुजानपुर की सीट से प्रेम कुमार धूमल को मैदान में उतारने की रणनीति के पीछे की मंशा को लेकर भी सवाल खड़े होते रहे.

बीजेपी सूत्रों के मुताबिक, पार्टी के भीतर खुसफुसाहट इस बात को लेकर भी थी कि इसके पीछे जे पी नड्डा की ही सोची-समझी चाल थी. शायद इसी चाल के तहत धूमल को कठिन सीट पर उतारा गया. हालांकि इसे पार्टी की सुजानपुर के अगल-बगल की सीटों पर बेहतर परिणाम पाने की रणनीति के तौर पर ही पेश किया गया था.

हिमाचल प्रदेश की राजनीति में प्रेम कुमार धूमल और शांता कुमार का अलग गुट काम करता है. लेकिन, बीजेपी की तरफ से पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार को राज्यसभा भेजकर प्रेम कुमार धूमल को आगे कर दिया गया था. तभी से शांता कुमार धूमल से खार खाए रहते हैं.

लेकिन, मौजूदा दौर में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा और प्रेम कुमार धूमल का भी गुट अलग-अलग है. लिहाजा जब बात धूमल को लेकर हुई तो धूमल विरोधी शांता कुमार और जे पी नड्डा दोनों के सुर एक हो गए.

बीजेपी के पर्यवेक्षक निर्मला सीतारमण, नरेंद्र सिंह तोमर और बीजेपी प्रभारी मंगल पांडे ने जब हिमाचल में पार्टी के नवनिर्वाचित विधायकों और अलग-अलग नेताओं से बात की तो उस दौरान भी धूमल के समर्थन और विरोध को लेकर हिमाचल की पूरी राजनीति सामने आ गई.

धूमल के चुनाव हारने के बाद भी उनके समर्थक उन्हें मुख्यमंत्री पद पर बैठाना चाहते थे. दूसरी तरफ, अमित शाह के करीबी माने जाने वाले जे पी नड्डा भी मुख्यमंत्री पद की रेस में बड़े दावेदार के तौर पर सामने थे. लेकिन, धूमल और    नड्डा के बीच की कश्मकश रोकने के लिए पार्टी आलाकमान ने चुने हुए विधायकों में से ही किसी को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला कर लिया.

जयराम का क्यों था विरोध ?

पार्टी आलाकमान के इस फैसले के बाद प्रेम कुमार धूमल और जे पी नड्डा दोनों ही मुख्यमंत्री पद की रेस से बाहर हो गए. लेकिन, मंडी के सिराज से 1998 से अबतक लगातार पांच बार विधायक रहे जयराम ठाकुर के नाम पर प्रेम कुमार धूमल गुट तैयार नहीं हो रहा था. बस यहीं से बवाल शुरू हो गया. यहां तक कि केंद्रीय पर्यवेक्षकों की मौजूदगी में शिमला में धूमल और जयराम ठाकुर के समर्थक एक-दूसरे के साथ उलझ भी गए थे.

दरअसल, जयराम ठाकुर जे पी नड्डा के बेहद करीबी हैं. ठाकुर जाति से आने वाले जयराम ठाकुर को राज्य की कमान सौंपे जाने के बाद अब प्रेम कुमार धूमल और उनके बेटे सांसद अनुराग ठाकुर के हिमाचल की राजनीति में दबदबे को लेकर भी सवाल खड़े होने लगेंगे.

हिमाचल में बीजेपी के भीतर अबतक सबसे बड़े ठाकुर चेहरे के तौर पर अपनी पहचान बना चुके प्रेम कुमार धूमल और उनके बेटे हमीरपुर से सांसद अनुराग ठाकुर के लिए बीजेपी के भीतर अपना कद छोटा होने का डर सता रहा था. लिहाजा वो जयराम ठाकुर के नाम पर हामी भरने को तैयार नहीं हो रहे थे.

हिमाचल में ठाकुर जाति की आबादी करीब 36 फीसदी है जबकि ब्राह्मण की तादाद लगभग 22 फीसदी है. पहले से ही हिमाचल में ठाकुरों का दबदबा रहा है. ऐसे में वीरभद्र सिंह के कुर्सी से बेदखल होने के बाद बीजेपी आलाकमान भी लोकसभा चुनाव से पहले जातीय संतुलन को अपने पाले में बनाए रखना चाहता था.

जमीन से जुड़े हैं बीजेपी के जयराम

जयराम ठाकुर हिमाचल प्रदेश की मंडी जिले की सिराज विधानसभा क्षेत्र से लगातार पांचवी बार विधायक हैं. इस बार मंडी जिले की 10 में से 9 सीटों पर बीजेपी को जीत हासिल हुई है. ठाकुर 2007 से 2009 के बीच बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुके हैं.

उनकी पहचान राज्य में सभी पार्टी कार्यकर्ताओं की बात सुनने वाले नेता के तौर पर रही है. ये अक्सर सर्द मौसम में भी लोगों के बीच जाकर उनकी समस्या सुनते रहे हैं. धूमल सरकार में ग्रामीण विकास और पंचायती राज मंत्री के तौर पर काम करने का अनुभव भी रहा है.

आखिरकार बीजेपी आलाकमान ने उनके नाम पर मुहर लगा दी है. जयराम ठाकुर को हिमाचल का ताज सौंपने का फैसला कर लिया गया. हालांकि, इस फैसले के बाद प्रेम कुमार धूमल को राज्यसभा भेजकर उन्हें बीजेपी संगठन में जगह दी जा सकती है. जबकि उनके बेटे अनुराग ठाकुर को मोदी सरकार में मंत्री पद से नवाजा जा सकता है.

लेकिन, हिमाचल प्रदेश की राजनीति को करीब से समझने वाले यही कह रहे हैं कि इस बार जे पी नड्डा ने बाजी मार ली है. मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री के साथ-साथ बीजेपी संसदीय बोर्ड के सदस्य और सचिव के नाते जे पी नड्डा का केंद्र की राजनीति में पहले से ही काफी दबदबा है. अब हिमाचल में भी अपने करीबी जयराम ठाकुर को मुख्यमंत्री के पद पर बैठाकर जे पी नड्डा ने राज्य की राजनीति में अपना दबदबा बढ़ा लिया है.

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