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कांग्रेस को ‘जय राम’ करने का मन तो नहीं बना रहे हैं जयराम रमेश?

कांग्रेस ने खुद को नहीं बदला तो क्या जयराम रमेश पार्टी बदल सकते हैं?

Kinshuk Praval Kinshuk Praval Updated On: Aug 09, 2017 09:30 AM IST

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कांग्रेस को ‘जय राम’ करने का मन तो नहीं बना रहे हैं जयराम रमेश?

कांग्रेस नेता जयराम रमेश को पार्टी का थिंक टैंक माना जाता है. वो अपनी सोच और बयानों की वजह से हमेशा सुर्खियों में रहते आए हैं. कभी देवालय-शौचालय पर बयान देकर विवादों में रहे तो कभी नेहरू-गांधी-जिन्ना को भारत के निर्माण के ब्रम्हा-विष्णु-महेश बता कर उन्होंने बवाल खड़ा किया है. लेकिन इस बार उनका आहत अंतर्मन फूट कर यूं बाहर निकला कि कांग्रेस के भीतर भूचाल ही आ गया. जयराम रमेश किसी ज्योतिषी की तरह कांग्रेस पर मंडराते गंभीर संकट को देख रहे हैं. उनका दर्द-ए-कांग्रेस कराह रहा है कि अब सत्ता या चुनाव का संकट नहीं बल्कि अस्तित्व का ही संकट सामने आ खड़ा हुआ है.

जयराम को कांग्रेस का ये संकट सरकार से बाहर होने के 3 साल बाद दिखाई दे रहा है. लोकसभा चुनाव के नतीजों के बावजूद शायद किसी कोने में उनकी उम्मीद बची हुई थी लेकिन विधानसभा चुनावों ने वो उम्मीद भी तोड़ दी.

कभी चार सौ सीटें जीतने वाली कांग्रेस आज राज्यसभा की एक-एक सीट के लिए संघर्ष करने को मजबूर है. अहमद पटेल जैसे वरिष्ठ और गांधी परिवार के निष्ठावान नेता की जीत के लिए कांग्रेस को कर्नाटक तक कुर्सी दौड़ करनी पड़ी है. ऐसे में जयराम रमेश का चिंतन सिर्फ उनकी अपनी विचारधारा नही हो सकता है. कांग्रेस के भीतर भी ऐसे ही कुछ सुर कुलबुला रहे होंगे. लेकिन गांधी परिवार के प्रति ओढ़ी हुई निष्ठा उन्हें अभिव्यक्ति की आजादी नहीं दे रही होगी.

तभी रणदीप सुरजेवाला ने जयराम रमेश के बयान को निजी बता कर खारिज करने की कोशिश की. राजनीति में ये आम बात है कि जो बयान पार्टी की छवि पर असर डाले उसे तूल देने की बजाए भूल जाओ.

जयराम के दर्द-ए-कांग्रेस की दवा क्या?

लेकिन जयराम रमेश के मर्म को समझने की जरूरत है. उनका मानना है कि कांग्रेस के लिए ये संकटकाल अबतक का सबसे अलग दौर है. उनका कहना है कि साल 1996 से साल 2004 तक कांग्रेस ने चुनावी संकट का सामना किया क्योंकि वो सत्ता से बाहर थी. इससे पहले इमरजेंसी लगाने की वजह से साल 1977 का चुनाव हारी थी. वो भी चुनावी संकट था. लेकिन इस बार कांग्रेस पर अस्तित्व का ही संकट मंडरा रहा है.

उनकी शिकायत है कि मोदी विरोधी लहर का इंतजार करना ही पार्टी की रणनीति का गलत फैसला रहा. अब इतनी देर हो चुकी है कि अगर नजरिया नहीं बदला तो अप्रासंगिक हो जाएंगे और कांग्रेस पार्टी को यह भी मानना होगा कि भारत बदल चुका है. ऐसे में कांग्रेस को बदलना होगा क्योंकि पुराने नारों, फॉर्मूलों और मंत्रों का वक्त जा चुका है.

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सवाल ये है कि जयराम रमेश कांग्रेस के थिंक टैंक भी माने जाते हैं. वो दस साल तक कांग्रेस के सलाहकार भी रहे हैं. पांच साल कैबिनेट मंत्री भी रहे. आखिर उनकी सलाहों में कहां चूक रह गई कि सौ साल पुरानी कांग्रेस एक झटके के साथ धरातल पर आ गिरी? क्या इसकी जिम्मेदारी सिर्फ कांग्रेस आलाकमान तक की है या फिर उस सल्तनत के जितने सुल्तान रहे हैं उनको भी कांग्रेस के हाशिए पर आने की जिम्मेदारी कबूल करनी चाहिए?

जयराम रमेश 13 साल से राज्यसभा के सांसद रहे हैं. आम जनता के वोटों से चुनाव जीतना और विधायकों के बूते सांसद बनना अलग अलग होता है. राजनीतिक के दांवपेंच के अलावा जनता की नव्ज टटोलना भी सियासतदां के लिए जरूरी होता है. जयराम चुनावी रणनीतिकार भी रहे लेकिन कांग्रेस के पुराने फॉर्मूलों पर ही चलते रहे.

कांग्रेस हमेशा नेहरू और इंदिरा के वक्त बनाए गए सियासी फॉर्मूलों को सिद्धांत के तौर पर आगे बढ़ाने का काम करती आई. कांग्रेस पर मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति अपनाने के आरोप लगे तो सेकुलरिज्म की परिभाषा बदलने के भी आरोप लगे. कांग्रेस की सत्ता के दौर में जाति की राजनीति इस कदर फली फूली जिससे कांग्रेस के दौर में धीरे धीरे एक खास वर्ग खुद को अपेक्षित समझने लगा. कांग्रेस मुस्लिम-दलित वोटों के गणित में सर्वजन हिताय से भटकी और आरक्षण जैसे मुद्दे सवर्णों को उसके खिलाफ लामबंद होने का मौका देते गए तो तुष्टीकरण के चलते राम मंदिर का मुद्दा एक राष्ट्रीय आंदोलन तक बन गया जिसने बीजेपी को उस शून्य को भरने का मौका दे दिया जो कांग्रेस के एजेंडे में नहीं था.

New Delhi: In this file photo BJP leaders L K Advani, Murli Manohar Joshi, Kalyan Singh and Uma Bharti wave at the crowd at a public meeting after appearing in a special court in connection with the demolition of Ayodhya's Babri Masjid, in Raebareli, July 28, 2005. The Supreme Court on Wednesday restored criminal conspiracy charges against Advani, Joshi and Bharti and some others in the case. PTI Photo (PTI4_19_2017_000104B)

बीजेपी पर हमेशा कांग्रेस ने सांप्रदायिक होने का आरोप लगा कर एक खास वर्ग में डर भरने का काम किया. वही डर कांग्रेस के लिए वोट बैंक का काम करता रहा. लेकिन ये फॉर्मूला भी क्षेत्रीय दलों ने ऐसे बांट लिया जैसे लूटा हुआ कोई खजाना रहा हो.

कांग्रेस के ही फॉर्मूले को बाद में जब क्षेत्रीय दलों ने अपनाना शुरू किया तो कांग्रेस के लिए अपनी ही जमीन बचाना भी मुश्किल हो गया. उत्तर प्रदेश का सियासी समीकरण कांग्रेस के खत्म होते जनाधार का ज्वलंत उदाहरण है. इसमे कोई दो राय नहीं है कि कांग्रेस की एकतरफा नीतियों ने राज्यों में क्षेत्रीय दलों को क्षत्रप बनने का मौका दिया.

सिर्फ मनरेगा से ही नहीं जीता जा सकता है चुनाव

हालांकि गांवों-कस्बों में बसी कांग्रेस के प्रति आस्था इतनी जल्दी नहीं बदल सकती थी. मनरेगा जैसी योजनाएं कांग्रेस को मजबूत करने का काम करती रहीं. लेकिन परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है. नई पीढ़ी के लिए अतीत का इतिहास उतना आकर्षक नहीं रहा जितना सवाल आज के रोजगार से जुड़ा हुआ था. नई पीढ़ी को हाथ के पंजे में अपने भविष्य की लकीरें धुंधली सी दिखने लगीं क्योंकि यूपीए के दस साल के शासन में घोटालों की गूंज ने कान के पर्दे तक फाड़ दिये. कांग्रेस पर बरसों पुराना भरोसा डिगने लगा. विकल्प के तौर पर दूसरी बड़ी राष्ट्रीय पार्टी नया भरोसा जगाने लगी. बदलाव की बयार ऐसी चली कि कांग्रेस अपनी उपलब्धियों को भी आम जनता तक ठीक से नहीं पहुंचा सकीं. जो बातें कांग्रेस के खिलाफ आम जनता के दिल में घर कर गई वो सिर्फ भ्रष्टाचार और कालेधन की रहीं. कांग्रेस ने अपने चुनाव प्रचार में मोदी विरोध की रणनीति अपनाकर खुद ही ‘घर-घर मोदी’ पहुंचा दिया. पहले मोदी विरोध की राजनीति का दांव कांग्रेस को उल्टा पड़ा तो अब ‘मोदी विरोधी लहर’ का इंतजार भी भारी पड़ता जा रहा है.

मोदी सरकार की उपलब्धियों में सबसे बड़ी बात ये है कि तीन साल के कार्यकाल में सरकार पर भ्रष्टाचार का कोई दाग नहीं लगा है. ये कामयाबी उस आम भारतीय मन में भरोसा जगाने के लिए काफी है जिसने टू जी, थ्री जी, कोयला घोटाला से लेकर भ्रष्टाचार के कई मामले देखे.

ऐसे में कांग्रेस कौन सा चिराग़ लेकर मोदी विरोध की लहर ढूंढ रही है ये जयराम रमेश जान चुके हैं. कांग्रेस के लिए चुनावी रणनीतिकार रहे जयराम रमेश ये समझ चुके हैं कि कांग्रेस को संकट से निकलना है तो उसे सोच बदलनी होगी और खुद को बदलना होगा. लेकिन वो ये नहीं बता सके कि किस तरह कांग्रेस बदली जा सकती है. कहीं ऐसा तो नहीं कि जयराम पार्टी बदलने के बारे में सोच रहे हों क्योंकि उन्हें भी कांग्रेस के बदलने में संशय हो.

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