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'राजस्थान में वसुंधरा ही हैं बीजेपी और BJP ही है वसुंधरा'

पहले 120 सीटों फिर 163 सीटों के साथ सत्ता में लौटी वसुंधरा राजे के दोबारा सत्ता में आने के साथ ही यूं तो उनके विरोधी घेरने के बहाने तलाश रहे थे, लेकिन बीते महीनों तीन उप चुनावों में हुई बीजेपी की करारी हार के बाद हालात ऐसे बने हैं कि राजे के समर्थक एक बार फिर उसी मुद्रा में मुट्ठी ताने नारेबाजी के अंदाज में हैं

FP Staff Updated On: May 05, 2018 07:53 PM IST

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'राजस्थान में वसुंधरा ही हैं बीजेपी और BJP ही है वसुंधरा'

'राजस्थान में वसुंधरा ही बीजेपी है और बीजेपी ही वसुंधरा है' राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के लिए ये बात उनके खेमे के सबसे बड़े संकट मोचक माने जाने वाले बीजेपी नेता राजेंद्र राठौड़ ने तब कही थी, जब सीएम राजे विपक्ष में थी. उस वक्त धड़ेबंदी कर बीजेपी के कई नेता वसुंधरा राजे को राजस्थान बीजेपी की राजनीति में अलग-थलग करने के उपाय में लगे थे. मामला आर पार का था, लिहाजा राजे समर्थकों ने अपनी ताकत दिखाई और पार्टी में राजे विरोधी नेताओं को अपने कदम वापस लेने पड़े.

पांच साल बाद कमोबेश वही स्थिति एक बार फिर है. पहले 120 सीटों फिर 163 सीटों के साथ सत्ता में लौटी वसुंधरा राजे के दोबारा सत्ता में आने के साथ ही यूं तो उनके विरोधी घेरने के बहाने तलाश रहे थे, लेकिन बीते महीनों तीन उप चुनावों में हुई बीजेपी की करारी हार के बाद हालात ऐसे बने हैं कि राजे के समर्थक एक बार फिर उसी मुद्रा में मुट्ठी ताने नारेबाजी के अंदाज में हैं.

वजह है बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष के पद से राजे के समर्थक अशोक परनामी की विदाई और संघ दीक्षित गजेंद्र सिंह शेखावत को प्रदेश अध्यक्ष के पद पर बैठाने की दिल्ली दरबार की मंशा. केंद्र की मोदी सरकार में कृषि राज्य मंत्री के साथ -साथ संगठन में किसान मोर्चा के राष्ट्रीय महामंत्री का जिम्मा देख रहे गजेंद्र सिंह शेखावत यूं तो संसद में राजे की पसंद पर ही गए थे, लेकिन हालात ऐसे बने कि राजे और शेखावत बीजेपी की अंदरूनी राजनीति में आमने-सामने हैं. राजे समर्थकों को लगता है कि हर विपरीत हालात में राजस्थान में बीजेपी की कोई नैय्या पार लगा सकता है तो वह सिर्फ और सिर्फ वसुंधरा राजे है, बाकी सब बेमानी हैं.

बीजेपी का राष्ट्रीय नेतृत्व स्वदेशी जागरण मंच के सह संयोजक और सीमा जन कल्याण समिति के महामंत्री रहे केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत को राजस्थान बीजेपी का अध्यक्ष बनाना चाहता है. शेखावत के जरिए बिगड़े हुए जातीय समीकरणों को दुरुस्त करने की दलील भी दी जा रही है, तो वहीं पाकिस्तान से सटी 1070 किमी भारतीय सीमा पर बतौर संघ कार्यकर्ता शेखावत द्वारा किए गए काम को भी याद दिलाया जा रहा है. लेकिन राजस्थान में बीजेपी अध्यक्ष का मामला कुछ इस तरह उलझा है कि न सीएम राजे केंद्र के इस फैसले को स्वीकार करने को तैयार है और न केंद्र सीएम राजे के सुझाये नामों पर गौर करने के मूड में है.

परनामी का इस्तीफा और बीजेपी का संकट

वसुंधरा राजे के करीबी और कृपा पात्र रहे अशोक परनामी ने बीती 18 अप्रैल को पद से इस्तीफा दे दिया था. विरोधियों की भाषा में कहें तो उससे चार दिन पहले ही परनामी का इस्तीफा ले लिया गया था. तब से अब तक राजस्थान में बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष का मसला उलझा है. लेकिन ना तो केंद्र यानि प्रधानमंत्री मोदी और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह चुनावी वेला में वसुंधरा के पसंदीदा किसी चेहरे को पार्टी प्रदेश अध्यक्ष पर देखने को तैयार हैं और ना ही वसुंधरा राजे दिल्ली दरबार की पसंद को मंजूरी देने के मूड में है. केंद्र गजेंद्र सिंह के नाम पर राजस्थान बीजेपी की मुहर चाहता है तो राजस्थान बीजेपी का सीएम राजे खेमा शेखावत के खिलाफ मोर्चा बांधे है.

अब खटक रहे हैं शेखावत

बाड़मेर में जसवंत सिंह जैसे दिग्गज का टिकिट काट बीजेपी ने जोधपुर में गजेंद्र सिंह शेखावत को लोकसभा टिकट दिया तब मकसद पश्चिमी राजस्थान के जातीय समीकरण को साधना था. गजेंद्र सिंह के जरिए बीजेपी राजस्थान की राजनीति में प्रभावी वोट बैंक कहे जाने वाले राजपूतों में संघ दीक्षित एक चेहरे को भी स्थापित करना चाहती थी. इस रणनीति में शेखावत सीएम वसुंधरा राजे की निजी पसंद भी थे. वजह थी शेखावत का करीब तीस साल पुराना आरएसएस बैक ग्राउंड और राजपूतों के सबसे बड़े संगठन क्षत्रिय युवक संघ से पुराना जुड़ाव. क्षत्रिय युवक संघ का आरएसएस की ही तरह देश के अलग-अलग हिस्सों में प्रभाव है और शेखावत आरएसएस के साथ ही क्षत्रिय युवक संघ के स्वयंसेवक रहे हैं.

शेखावत के बढ़ते कद से कई हैं हैरान-परेशान

सवाल उठता है कि गजेंद्र सिंह शेखावत जब खुद सीएम वसुंधरा राजे की पसंद रहे हैं तो अब क्यों और किस वजह से खटक रहे हैं. जवाब है जैसलमेर के चर्चित चुतर सिंह एनकाउंटर मामले में शेखावत द्वारा की गई सीबीआई जांच की मांग. सूत्र बताते हैं कि शेखावत ने जैसलमेर पुलिस द्वारा किए गए एनकाउंटर पर सवाल करते हुए सीबीआई जांच के पक्ष में 'ट्वीट' किया तभी से समीकरण बदलने शुरू हो गए. जो अलग-अलग फीडबैक के चलते फिर ठीक होने की स्थिति में नहीं रहे .

इस बीच शेखावत द्वारा बतौर संघ कार्यकर्ता कोई तीन दशक तक की गई सेवाओं और संसद में परफॉर्मेंस के मद्देनजर प्रधानमंत्री मोदी ने शेखावत को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया तो इलाके के जनप्रतिनिधियों को भी उनका बढ़ता राजनीतिक कद खटकने लगा. नतीजा यह है कि सीएम राजे का खेमा तो आगामी चुनावों के मद्देनजर किसी "अपने" को अध्यक्ष बनाने की पैरवी में जुटा ही है.

गजेंद्र सिंह शेखावत के एकाएक बढ़ते कद से कई राजपूत क्षत्रप भी हैरान-परेशान हैं. परेशानी का आलम ऐसा कि चंद दिनों पहले चुनावी राजनीति से संन्यास की बात कहने वाले जनता दल छोड़ बीजेपी में आए देवी सिंह भाटी को भी बीजेपी के जातीय समीकरणों को चिंता सताने लगी है.

दलील यह है कि शेखावत राजपूत समुदाय से है और प्रतिस्पर्धी जाट समुदाय इस फैसले से चुनाव की इस घड़ी में अलग हो सकता है. हालांकि, दूसरी दलील यह भी है कि तीन दशक तक संघ के कार्यकर्त्ता के रूप में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और सीमा जन कल्याण परिषद जैसे संगठनों में काम करने के बाद भी शेखावत में कोई जातीय सोच तलाश रहा है, तो यह संघ की शिक्षा-दीक्षा पर सवाल है.

राजी नहीं हैं राजे के समर्थक

पार्टी प्रदेश अध्यक्ष के लिए शेखावत के नाम पर ही नहीं, केंद्र द्वारा सुझाए गए किसी भी नाम पर राजे समर्थकों की मुहर आसान नहीं है. कारण है आगामी विधानसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों के चयन में प्रदेशाध्यक्ष की भूमिका. सीएम राजे एक तरफ बड़ी जातियों के खिलाफ चुनावों में होने वाली गोलबंदी से बचाना चाहती है, दूसरी ओर ये भी चाहती हैं कि अध्यक्ष जो भी बने वह सरकार के साथ सुर मिलाकर काम करने वाला हो. सीएम राजे ने चुनाव के मद्देनज़र श्रीचंद कृपलानी और लक्ष्मी नारायण दवे जैसे कम जातीय आधार वाले नेताओं के नाम सुझाए हैं, वहीं केंद्र की ओर से सुझाया गया एक ही नाम है गजेंद्र सिंह शेखावत.

सत्ता की सलीब पर चढ़ा पार्टी का अनुशासन

मसला पार्टी के अंदरूनी गणित और आंतरिक लोकतंत्र से जुड़ा है, लिहाजा कोई भी खुलकर बोलने को तैयार नहीं. लेकिन पहली बार राजस्थान बीजेपी में पेच ऐसा फंसा है कि पार्टी का अनुशासन सत्ता की सलीब पर चढ़ गया है. इस अनुशासन कि बहाली के लिए पार्टी क्या समीकरण बिठाएगी, सबकी निगाह इसी बात पर टिकी है. सबकी निगाह कर्नाटक के विधानसभा चुनावों के नतीजों पर है. जहां बीजेपी जीती तो राजस्थान में मोदी-शाह की पसंद पर मुहर की संभावना है ना जीते तो राजस्थान बीजेपी के समीकरण बिगाड़ मोदी-शाह शायद ही सीएम राजे से पंगा लें. हालांकि ,राजनीति के जानकारों को लगता है कि प्रदेश अध्यक्ष के बहाने पार्टी के अंदर वसुंधरा राजे जैसी कद्दावर नेता से मिली चुनौती को मोदी-शाह की जोड़ी शायद ही हल्के में ले.

(न्यूज़18 के लिए श्रीपाल शक्तावत की रिपोर्ट)

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