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जैन से सहारा तक डायरियों का नतीजा सिफर ही रहा है

बीते बीस सालों में कई डायरियां आईं लेकिन आरोपियों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई

Updated On: Dec 23, 2016 12:50 PM IST

Surendra Kishore Surendra Kishore
वरिष्ठ पत्रकार

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जैन से सहारा तक डायरियों का नतीजा सिफर ही रहा है

सहारा समूह पर छापे के दौरान मिली एक डायरी इस समय देशभर में चर्चा का केंद्र है. लेकिन इस डायरी में दर्ज सूची का हाल भी वही होने वाला है जो पहले की सूचियों का हुआ. चंदे की एक ऐसी ही सूची जैन हवाला डायरी में भी मिली थी.

हवाला घोटाले की पहली सूची को आखिरकार दबा ही दिया गया. अब देखते हैं सहारा सूची का क्या होता है?

जब किसी सूची में अनेक दलों के बड़े-बड़े  नेताओं के नाम दर्ज होते हैं तो उसकी नीयति दब जाना ही होती है. भला सिस्टम से कोई कैसे लड़ सकता है. हालांकि पिछले बीस सालों में ऐसी कई सूचियां सामने आई हैं. बिहार का चारा घोटाला भी एक हद तक सर्वदलीय और बहुपक्षीय घोटाला ही था.

उसमें सजाएं होने लगी हैं, पर चारा घोटाला के मामलों को सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने में अभी वर्षों लगेंगे. इन सबके बीच व्हिसिल ब्लोअर  एक सूची से दूसरी सूची की ओर दौड़ रहा है.

क्या कर पाएंगे प्रशांत भूषण 

हवाला केस में व्हिसिल ब्लोअर विनीत नारायण लड़ाई नहीं सके थे और न  ही प्रशांत भूषण की सफलता की  उम्मीद  है. लेकिन इन लोगों को जोखिम उठाने के लिए दाद तो देनी ही पड़ेगी.

prashant bhusan

सहारा सूची का क्या हश्र होगा, यह तो बाद की बात है. पहले जैन हवाला कांड का हश्र देख लेना मौंजू होगा. उससे आगे का संकेत मिल सकता है.

1991 की बात है. उन दिनों भी देश में  आतंकी घटनाएं हो रही  थीं.

दिल्ली पुलिस ने जेएनयू के एक छात्र शहाबुद्दीन गोरी को जामा मस्जिद इलाके से पकड़ा. उस पर आरोप था कि वह कश्मीरी आतंकियों को पैसे पहुंचाता था.

मामला सीबीआई को सौंपा गया. सीबीआई ने साकेत में जैन बंधुओं के यहां  छापा मारा. वहां भारी रकम के अलावा सनसनीखेज डायरी भी मिली. उससे पता चला कि इन हवाला कारोबारियों ने देश के करीब 115 बड़े नेताओं और अफसरों को कुल मिलाकर 64 करोड़ रुपए दिए.

उन नेताओं में विभिन्न दलों से जुड़े पूर्व प्रधानमंत्री ,पूर्व व वर्तमान केंद्रीय मंत्री, पूर्व मुख्यमंत्री समेत दूसरे बड़े नेता शामिल थे.

शरद यादव ने किया स्वीकार 

उनमें से सिर्फ शरद यादव ने यह स्वीकार किया कि उन्हें जैन से 5 लाख रुपए मिले थे. क्या जैन बंधुओं के पैसे  सिर्फ शरद यादव के लिए थे  ? ऐसा नहीं था.

sharad yadav

 

पैसे लेने वाले अन्य नेताओं ने इसे साजिश बताया. ‘दान’ लेने वालों के नाम आखबारों में छपे. लोकलाज से मुख्यतः लाल कृष्ण आडवाणी और तीन केंद्रीय मंत्रियों ने अपने पदों से इस्तीफा भी दिया.

विदेश राज्य मंत्री सलमान खुर्शीद ने तब यह स्वीकार किया कि चुनाव फंड में पारदर्शिता न होने के कारण हवाला कांड होते हैं.

सवाल यह है कि खुर्शीद और उनकी पार्टी बाद  में अनेक वर्षों तक सत्ता में रहे. क्यों नहीं पारदर्शिता लाने की कोशिश की ?

जैन हवाला रिश्वत कांड का यह मामला जब अदालत में पहुंचने वाला था तो जांच एजेंसी सीबीआई पर भारी दबाव पड़ा. जब सत्ताधारी दल और मुख्य प्रतिपक्षी दलों के शीर्ष नेताओं पर आरोप हों तो ‘सरकारी तोता’ सीबीआई आखिर कर भी क्या सकता है?

आरोपियों को इतने से संतोष नहीं हुआ. उनमें से किसी ने सुप्रीम कोर्ट पर दबाव डलवाया. यह सब ऐसे कांड में हुआ जिस कांड में आतंकवाद भी जुड़ा हुआ था. जैन बंधुओं ने शायद इसलिए भी देश के लगभग सभी प्रभावशाली नेताओं और अफसरों को रिश्वत दी ताकि कश्मीरी आतंकवादियों को पैसे पहुंचाते रहने में उन्हें कोई बाधा न आए.

आतंकवाद के प्रति हमारे हुक्मरानों का ऐसा रवैया रहा है. हालांकि यह भी कहा गया कि कुछ नेताओं के पैसे उनकी काली कमाई के थे.

अब आते हैं सहारा डायरी मामले पर. सहारा डायरी के अनुसार लाभ पाने वालों की दमदार सूची देखकर यह अंदाज लगाया जा सकता है कि इनके साथ जांच एजेंसियां कैसा सलूक करेंगी?

जस्टिस जेएस वर्मा ने की थी कठोर टिप्पणी

आगे का अंदाजा जेएस वर्मा की टिप्पणी से लगाया जा सकता है. 14 जुलाई 1997 को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जेएस वर्मा ने अदालत में कहा था कि हवाला कांड को दबाने के लिए हम पर लगातार दबाव पड़ रहा है.

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हालांकि उन्हें यह काम नहीं करना पड़ा. सीबीआई ने ही इस कांड की ठीक से जांच ही नहीं की. वर्मा ने बाद में सीबीआई के प्रति अपनी शिकायत भी दर्ज कराई.

 

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